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बेस्ट ऑफ़ पीटी उषा: लॉस एंजिल्स से सियोल तक पीटी उषा ने लहराया भारतीय तिरंगा

भारतीय ट्रैक एंड फील्ड की क्वीन पीटी उषा ने भारत को समय-समय पर गौरवान्वित किया है। आइए एक नज़र डालते हैं उनके लुभावने करियर पर।

लेखक जतिन ऋषि राज ·

पिलावुळ्ळकण्टि तेक्केपरम्पिल उषा (Pilavullakandi Thekkeparambil Usha) या पीटी उषा को भारत की सबसे उम्दा धावक माना जाता है। 1984 लॉस एंजिल्स गेम्स में उन्होंने सबको बता दिया था कि भारतीय सरज़मीं से भी अब ट्रैक एंड फील्ड के सितारे निकलेंगे।

1/100 सेकंड से ओलंपिक मेडल चूकने वाली पीटी उषा को आज भी भरतीय खेल जगत में बहुत इज़्ज़त दी जाती है और वह इस इज़्ज़त की हक़दार भी हैं।

अपने करियर में गोल्डन गर्ल ने 100 से ज़्यादा इंटरनेशनल मेडल जीते हैं, बहुत से नेशनल रिकॉर्ड कायम किए हैं और साथ ही सबसे खतरनाक एशियन एथलीट में से एक हैं।

यहां हम पीटी उषा के करियर की कुछ अहम बातों पर ध्यान देंगे।

1982 एशियन गेम्स - पय्योली एक्सप्रेस ने पकड़ी रफ़्तार

नेशनल स्तर पर अपना दबदबा बनाने वाली पीटी उषा ने बहुत कम उम्र में अच्छी सफलता हासिल की और समर गेम्स 1980 मोस्को ओलंपिक में डेब्यू कर भारतीय खेल में चार चांद लगा दिए। गौरतलब है कि उस समय उषा केवल 16 साल की थी।

भारतीय स्प्रिंटर पीटी उषा ने एशियन मंच पर अपना दबदबा कायम रखा। फोटो: फेसबुक/पीटी उषा    

दो साल बाद 1982 एशियन गेम्स में उषा मिलियन भारतियों के सपनों के साथ दौड़ीं और उन्होंने व्यक्तिगत इवेंट (100 मीटर, 200 मीटर) में दो सिल्वर मेडल भी अपने नाम किए।

भारतीय स्प्रिंटर पीटी उषा ने उस समय 100 मीटर रेस में 11.95 की टाइमिंग दिखाई और वह लीडिया डी वेगा (Lydia de Vega) के पीछे यानी दूसरे स्थान पर रहीं।

200 मीटर में उषा ने 22.32 सेकंड की टाइमिंग हासिल कर एक और सिल्वर मेडल अपने नाम किया। गौरतलब है की इस रेस में जापान की हिरोमी इसोज़ाकी (Hiromi Isozaki) ने गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा जमाया था।

दूरदर्शन ने दिल्ली में हुए 1982 गेम्स के ज़रिए प्रसारण की शुरुआत की थी और उस समय हर भारतीय ने मुकाबलों को देख कर पीटी उषा को अपने दिलों में बसा लिया था।

इंटरनेशनल स्तर पर पहला मेडल जीतने के बाद पय्योली एक्सप्रेस ने कभी मुड़कर नहीं देखा।

1984 ओलंपिक – बिखर कर निखरे वही है खिलाड़ी

800 मीटर में शाइनी विल्सन (Shiny Wilson) को देखने के बाद अब पीटी उषा से भी कई ज़्यादा आस लग गई थी और उन्होंने भारतीय जनता को निराश भी नहीं किया।

एशियन गेम्स में सफलता लेकर उषा ने अपने कदम 1983 एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप की ओर बढ़ाए। इसके बाद 20 साल की उषा के कंधों पर 1984 लॉस एंजिल्स गेम्स में कुछ अलग कर दिखाने की उम्मीदें भी थी

“मैं एक इवेंट की एक चैंपियनशिप में एक मेडल के लिए नहीं दौड़ी। यह कोई कम समय में हासिल की गई सफलता नहीं है।"

लॉस एंजिल्स 1984 में पीटी उषा ओलंपिक मेडल जीतने से केवल 0.01 सेकंड से चूक गईं।

400 मीटर हर्डल रेस में भाग ले रही उषा ने 56.81 सेकंड की बेहतरीन टाइमिंग द्वारा फाइनल में अपनी जगह पुख्ता कर ली थी। मानों तिरंगा झंडा हवा में झूम रहा था और भारत में एक ही नाम का राग अल्पाया जा रहा था और वह था पीटी उषा।

में इवेंट में उषा ने पहले से बेहतर खेल दिखाया और 55.41 सेकंड की टाइमिंग हासिल की। यह टाइमिंग आज भी भारत का नेशनल रिकॉर्ड है। उस दिन भारत के हाथ मेडल तो नहीं आया लेकिन भारत को कभी न मिटने वाला एक सितारा मिल गया। गौरतलब है कि यह उषा केवल 1/100 सेकंड की कमी की वजह से मेडल जीतने से चूक गईं थी।

“20 की उम्र में, ओलंपिक मेडल से चूक जाना वो भी केवल सेकंड के 100वें हिस्से से, यह अकल्पनीय है।”

हालांकि चीज़ें कुछ और ही हो सकती थी। कई बार एक एथलीट को उन सभी वाक्यों का सामना करना पड़ता है जीमने उनका कोई कुसूर नहीं होता लेकिन होता है तो नुकसान। उस दौरान पीटी उषा के साथ भी वही हुआ जब ऑस्ट्रेलिया की डेबी फ़्लिंटफ़ (Debbie Flintoff) की गलती की वजह से रेस को दोबारा शुरू किया गया और वहीं भारतीय धावक अपनी लय खो बैठीं।

शुरुआत में भारतीय स्प्रिंटर को तेज़ी में देखा गया और उन्होंने पहले हर्डल को 6.33 सेकंड में पार कर लिया।

रेस दोबारा शुरू हुई और उषा को ब्लॉक्स के दौरान धीमा पाया गया। रेस बढ़ी, उषा के कदम भी मज़बूती से बढ़े और उन्होंने क्रिस्टियाना कोजोकारू (Cristieana Cojocaru) को पीछे कर तीसरे स्थान की पुष्टि कर ही ली थी लेकिन उस रेस में एक और बदलाव देखा गया जिस वजह से उषा के हाथ से मेडल निकल गया।

इतना ही नहीं, उषा के लाजवाब प्रदर्शन को देख कर उस समय की प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी (Indira Gandhi) ने उन्हें एक ख़त लिखा जिसमें उन्होंने इस युवा खिलाड़ी की जमकर तारीफ़ की थी।

“एक दिन में मैंने 3 रेसों में भाग लिया था। रेस के बाद में बाथरूम की ओर भागती, शावर लेती और अगली रेस के लिए तैयार होती। उस समय मैंने रूटीन के नाम पर कुछ ज़्यादा फॉलो नहीं किया बस रन, रेस्ट और शावर और दोबारा रन, यही मेरा रूटीन था।”

1985 एशियन चैंपियनशिप – गोल्डन ट्रैक पर दौड़ती उषा

उस स्पर्धा के बाद कुछ सालों तक मानों पीटी उषा ने जीतने की आदत सी डाल ली हो। एशियन ट्रैक पर उषा का दबदबा बढ़ता गया और वह अपना वर्चस्व कायम करतीं गईं। 1985 एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप, जकार्ता में उषा ने 4 गोल्ड मेडल जीते। इतना ही नहीं 4x100 मीटर में उनके हाथ ब्रॉन्ज़ मेडल आया।

उषा ने अपनी कड़ी प्रतिद्वंदी लीडिया डी वेगा को भी मात दी और 100 मीटर में गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा जमाया फाइनल मुकाबले में उषा ने 11.64 सेकंड की बदौलत इस रेस को अपने नाम किया। सेमी-फाइनल मुकाबले में भारतीय स्प्रिंटर ने 11.39 सेकंड की टाइमिंग हासिल की जो कि उनका निजी सर्वश्रेष्ठ है और साथ ही नेशनल रिकॉर्ड भी।

जकार्ता में उषा ने उम्दा खेल दिखाया और भारत में ही नहीं बल्कि अगर आज वहां भी उनका नाम लिया जाए तो भारतियों को डिस्काउंट और इज्ज़त दोनों बराबर मिलते हैं।

“यह एक अच्छा भाव है कि लोग आपको उस काम के लिए याद करते हैं और इज्ज़त देते हैं जो अपने 1985 में किया था।”

1986 एशियन गेम्स – सियोल में दबदबा

1986 एशियन गेम्स, सियोल में भी कहानी कुछ ऐसी ही रही जहां उषा के साथ सफलता ने कदम से कदम मिलाकर साथ दिया।

जाकार्ता में एक साल पहले जहां स्टेडियम में ‘उषा उषा’ के नाम के नारे लग रहे थे वहीं सियोल में भी मंज़र कुछ ऐसा ही था।

इस बार 100 मीटर में वेगा से पीछे रह कर भारतीय ने सिल्वर मेडल जीता लेकिन 200, 300, 400, 400 हर्डल और 4x400 मीटर रिले में उन्होंने सर्वश्रेष्ठ यानी भारत को गोल्ड मेडल से नवाज़ा।

यहां भी शेड्यूल कठिन था। एक के बाद एक रेस का होना उसका की शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक ताकत को भी परख रहा था। 110 मिनट में भारतीय ट्रैक अन द फील्ड की क्वीन ने 3 रेसों में भाग लिया और अपने जज़्बे का प्रदर्शन किया।

उषा ने आगे अलफ़ाज़ साझा करते हुए कहा “मुझे यह अपने देश और मेडल की संख्या के लिए करना था। यह बहुत ज़्यादा कड़ा नहीं था, हाँ बस मुझे वार्म अप के लिए पूरा समय नहीं मिल रहा था।”

उनके कोच ओम नाम्बियार (Om Nambiar) ने यह देखा कि एक के बाद एक रेस से उषा के प्रदर्शन पर फर्क पड़ रहा था लेकिन वह देश के लिए खेल रही थी और मना नहीं कर रही थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि इसी जज़्बे की वजह से एक एथलीट एक चैंपियन बनता है।

1989 एशियन चैंपियनशिप – समय का चरखा

1988 सियोल ओलंपिक गेम्स में निराश होने के बाद पीटी उषा पर सवाल खड़े हो रहे थे कि आज भी उनमे वह जज़्बा है या नहीं। गौरतलब है कि उस समय हील इंजरी के कारण उषा फाइनल में अपनी जगह नहीं बना पाईं थी और इसी वजह से उन्होंने कुछ आलोचंकों को जन्म दिया था।

इसके बाद नई दिल्ली में हुई 1989 एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में पीटी उषा पर दबाव कुछ ज़्यादा ही था और उन्हें अपने आलोचकों को कड़ा जवाब भी देना था।

एक खिलाड़ी वही है जो गिर कर खड़ा हो और पीटी उषा ने भी कुछ ऐसा ही किया।

“मैं 1989 एशियन ट्रैक एंड फील्ड के बाद रिटायर हो जाउंगी और कुछ मुंह बंद करने ले लिए मेडल जीत कर छोड़ जाउंगी।”

1983 अर्जुन अवार्ड विजेता ने अपने स्टाइल को दर्शाया और दिखा दिया कि क्यों इतने सालों तक उन्होंने फील्ड पर राज किया है।

व्यक्तिगत इवेंट में पीटी उषा ने 200, 400 और 400 मीटर हर्डल रेस में गोल्ड मेडल जीता और 100 मीटर में चीन की झांग काहुआ (Zhang Caihua) के पीछे रहकर सिल्वर मेडल पर अपने नाम की मुहर लगा दी।

इतना ही नहीं, इस स्प्रिंटर ने भारत को 4x400 मीटर में भी गोल्ड जितवाया और 4x100 मीटर में सिल्वर। पीटी उषा ने साबित कर दिया की खिलाड़ी वही है जो समय पर खुद के लक्ष्य हासिल कर सभी को प्रेरणा दे और उन्होंने ठीक वैसा ही किया। हालांकि इस मुक़ाम पर आने के बाद उन्होंने रिटायर होने के निर्णय को बदल दिया और आगे खेलने का मनन भी बनाया।

बढती उम्र और चोट के कारण वह कभी वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाईं जिसके लिए उन्हें जाना जाता था लेकिन फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि जब तक वह दौड़ीं हैं तब तक भारतीय झंडा गर्व से आसमान में लहराया है।