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रोहन बोपन्ना का करियर: मेहनत और निरंतरता की कहानी

39 वर्षीय ये दिग्गज खिलाड़ी 2003 में प्रोफ़ेशनल बना था, और तब से भारतीय टेनिस की एक पहचान बन चुके हैं

लेखक सैयद हुसैन ·

भारतीय टेनिस में एक सबसे ज़्यादा परिचित नामों में से एक है रोहन बोपन्ना। 6 फ़िट और 4 इंच लंबे बेंगलुरु के रोहन बोपन्ना अपनी इस लंबाई का फ़ायदा टेनिस कोर्ट पर भी उठाते हैं, और उनकी तेज़ तर्रार सर्विस ही है उनकी पहचान।

उनकी तेज़ सर्विस पूरी दुनिया के टेनिस कोर्ट पर एक अलग छाप छोड़ती है, भारत के ये दिग्गज टेनिस स्टार जल्द ही 40 साल के हाने वाले हैं लेकिन बढ़ती उम्र के साथ साथ उनका फ़ॉर्म भी शानदार होता जा रहा है। रोहन अभी भी लगातार सभी ग्रैंड स्लैम और बड़ी प्रतियोगिताओं में खेल रहे हैं।

रोहन पहली बार भारत के लिए 2002 डेविस कप में खेलते हुए नज़र आए थे, और इसके अगले ही साल वह एक प्रोफ़ेशनल टेनिस खिलाड़ी बन गए थे। हालांकि उन्हें ख़ुद को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में चार साल और लग गए थे।

उन्हें जब ये लग गया था वह एकल के लिए शायद पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जलवा दिखाने में सक्षम नहीं हैं तो उन्होंने अपना ध्यान युगल की ओर लगा दिया था। जिसका नतीजा ये हुआ कि रोहन के नाम अब 19 एटीपी युगल ख़िताब हैं, जिसमें एक ग्रैंड स्लैम भी शामिल है।

2007 में रोहन बोपन्ना पाकिस्तानी खिलाड़ी ऐसम-उल-हक़ क़ुरैशी के साथ साझेदार बने थे और इस जोड़ी का नाम इंडो-पाक एक्सप्रेस पड़ गया था। इस जोड़ी को क़ामयाबी भी ख़ूब मिली थी और इन्होंने लगातार चार चैलेंजर ख़िताब अपने नाम किए थे।

हालांकि उन्हें अपने पहले एटीपी ख़िताब पर कब्ज़ा जमाने के लिए 2008 तक का इंतज़ार करना पड़ा था, जब एरिक ब्यूटोरैक के साथ उन्हें लॉस एंजिलस में ख़िताबी जीत मिली थी।

जब पहली बार टॉप-10 में हुए शुमार

साल 2010 रोहन बोपन्ना के लिए शानदार रहा था, जब उन्होंने अपना दूसरा एटीपी ख़िताब जीता था और ऐसम-उल-हक़ क़ुरैशी के साथ पहला। ये ख़िताब उन्हें जोहांसबर्ग में हासिल हुआ था, इसके बाद इंडो-पाक एक्स्प्रेस के नाम से मशहूर ये जोड़ी अगले पांच इवेंट के फ़ाइनल तक भी पहुंची थी, जिसमें यूएस ओपन भी शामिल है जो रोहन बोपन्ना का पहला ग्रैंड स्लैम फ़ाइनल था।

हालांकि उन्हें फ़ाइनल में दिग्गज ब्रायन ब्रदर्स की जोड़ी माइक ब्रायन और बॉब ब्रायन से हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन इसके बाद रोहन पहली बार टॉप-20 रैंकिंग में आ गए थे, आने वालों सालों में भी रोहन ने पाकिस्तानी खिलाड़ी के ही साथ अपनी जोड़ी बनाई थी। 2011 में इस जोड़ी ने तीन एटीपी ख़िताब जीते थे, जिसमें उनका पहला ग्रास कोर्ट ख़िताब भी था जो 2011 हाले ओपन था।

इतना ही नहीं जून 2011 में रोहन बोपन्ना पहली बार टॉप-10 में भी शामिल हो गए थे, तब उन्हें 9वीं रैंकिंग हासिल हुई थी और इसे उन्होंने 2013 तक कुछ ऊपर नीचे रहते हुए लगातार बनाए भी रखा था। रोहन बोपन्ना की पुरुष युगल में करियर की सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग 3 रही थी जो 2013 में उनके नाम थी।

जब ग्रैंड स्लैम का सपना हुआ साकार

रोहन बहोपन्ना 2011 से प्रत्येक वर्ष कम से कम एक एटीपी ख़िताब ज़रूर अपने नाम करते आए हैं, लेकिन बस 2016 ऐसा साल था जहां ये नहीं हो पाया था। 2015 में उन्होंने 4 ख़िताब जीते, स्टटगर्ट ओपन और मैड्रिड में हुए एटीपी मास्टर्स 1000 में उनके साथ फ़्लोरिन मर्गिया थे, जबकि सिडनी और दुबई टाइटल में उनके जोड़ीदार डैनियल नेस्टर थे।

सालों की मेहनत के बाद आख़िरकार इस भारतीय टेनिस दिग्गज को ग्रैंड स्लैम परिवार में शामिल होने का सम्मान 2017 में मिल ही गया, जब उन्होंने 2017 फ़्रेंच ओपन में मिश्रित युगल का ख़िताब अपने नाम किया था, उनकी जोड़ीदार थीं कनाडा की गैब्रिएला दबरोस्की। ग्रैंड स्लैम जीतने वाले बोपन्ना चौथे भारतीय बन गए, उनसे पहले लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्ज़ा के नाम ग्रैंड स्लैम था।

2017 फ़्रेंच ओपन ख़िताब जीतने के बाद रोहन बोपन्ना अपनी जोड़ीदार गैब्रिएला दबरोस्की के साथ

2018 में उनके पास एक मौक़ा आया था जब बोपन्ना एक और ग्रैंड स्लैम अपने नाम कर सकते थे, जब वह ऑस्ट्रेलियन ओपन 2018 के मिश्रित युगल फ़ाइनल में हंगरी की टिमिया बाबोस के साथ प्रवेश कर गए थे। लेकिन उन्हें अपने पुराने जोड़ीदार गैब्रिएला दबरोस्की और मेट पैविक के हाथों हारकर रनर अप रहे थे।

आगे की राह ?

2020 में रोहन बोपन्ना ने एक ख़िताब अपने नाम कर चुके हैं, जब उन्होंने डचमैन वेसले कूलहोफ़ के साथ मिलकर क़तर ओपन में पुरुष युगल की ट्रॉफ़ी अपने नाम कर ली थी। टाटा ओपन महाराष्ट्र में भी उन्हें वाइल्ड कार्ड एंट्री मिल चुकी है जहां उनके जोड़ीदार होंगे अर्जुन काढे, रोहन बोपन्ना की नज़र अपने इस ख़िताब की रक्षा करने पर होगी।

साथ ही साथ टोक्यो 2020 में वह अपनी पुरानी साथी सानिया मिर्ज़ा के साथ मिश्रित युगल में कोर्ट पर उतरेंगे। जहां उनकी नज़र एक पदक पर होगी ताकि संभवत: अपने आख़िरी ओलंपिक को यादगार बनाया जाए।