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जानिए कैसे साक्षी मलिक ने भारत को दिलाया था महिला रेसलिंग में पहला ओलंपिक पदक

विपरीत परिस्तिथियों में लाजवाब प्रदर्शन के साथ साक्षी मलिक ने अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए ओलंपिक का मंच चुना और रच डाला इतिहास।

लेखक सैयद हुसैन ·

अगर 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में गीता फ़ोगाट (Geeta Phogat) के स्वर्ण पदक ने भारतीय महिला कुश्ती में एक पहचान दिलाई, तो वह साक्षी मलिक (Sakshi Malik) थीं जिन्होंने इसे खेलों के महाकुंभ में एक अलग मुक़ाम पर पहुंचाया।

वह ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान हैं। लेकिन आप शायद ये नहीं जानते होंगे कि रियो 2016 में साक्षी ओलंपिक में जाने वाली भी नहीं थीं।

रियो 2016 में जाने से पहले किसी ने साक्षी मलिक से उम्मीद भी नहीं की होगी और इस भारतीय महिला पहलवान ने ही भारत को दिलाया था 2016 ओलंपिक का पहला पदक। तस्वीर साभार: UWW

उस समय गीता फ़ोगाट के साथ 58 किग्रा वर्ग में प्रतिस्पर्धा करने वाली साक्षी मलिक रियो के लिए बैकअप पहलवान थीं।

क़रीब क़रीब ये तय हो चुका था कि रियो 2016 में 58 किग्रा भारवर्ग में भारत का प्रतिनिधित्व गीता करेंगी। लेकिन ओलंपिक के ठीक पहले कुछ ऐसा हुआ कि गीता की जगह साक्षी को रियो के लिए क्वालिफ़ाई करने का अवसर मिल गया।

वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में एक ख़राब दिन होने की वजह से गीता के पास अब रियो 2016 का टिकट हासिल करने के लिए मंगोलिया में आयोजित ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स से ही उम्मीद रह गई थी।

अचानक आया बुलावा

मंगोलिया में भी गीता के लिए कहानी नहीं बदली और शुरुआती दौर में ही वह हार कर बाहर हो गईं थीं। इस तरह से उनके हाथ से ओलंपिक कोटा फिसल गया। गीता की परेशानी यहीं ख़त्म नहीं हुई थी।

मंगोलिया में रेपचेज बाउट को फ़ॉरफ़िट करने का गीता का फ़ैसला रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) को रास नहीं आया, और उन्होंने तुर्की में आयोजित आख़िरी ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स के लिए गीता को निलंबित कर दिया और उनकी जगह साक्षी मलिक को भेज दिया।

अचानक आए इस बुलावे को साक्षी ने दोनों हाथों से लपका और ओलंपिक के लिए पहली बार क्वालिफ़ाई करते हुए अपने सालों के सपने को उन्होंने पूरा कर लिया था।

रोहतक की इस पहलवान के ऊपर कहीं से भी दबाव नहीं झलक रहा था, इस्तानबुल में हुए क्वालिफ़ायर्स में उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया और चीन की झैंग लैन (Zhang Lan) को हराते हुए सेमीफ़ाइनल में प्रवेश किया और ऐसा करते ही उन्हें रियो 2016 का टिकट मिल गया था।

यहीं से साक्षी के पदक जीतने का सपना आकार लेने लगा था।

''ये मेरा वह सपना था जो मैं 12-13 साल की उम्र से ही रेसलिंग खेलते हुए देख रही थी। मैंने इसके लिए दिन रात परिश्रम किया था।''

साक्षी मलिक ने जब जीता ओलंपिक पदक

हालांकि साक्षी ने रियो के लिए क्वालिफ़ाई तो कर लिया था लेकिन उनसे पदक की उम्मीदें नहीं की जा रहीं थीं।

अभिनव बिंद्रा (Abhinav Bindra), जीतू राय (Jitu Rai), सानिया मिर्जा (Sania Mirza), विनेश फोगाट (Vinesh Phogat) और साइना नेहवाल (Saina Nehwal) जैसे बड़े नामों पर देश की निगाहें टिकी हुई थीं, जबकि एक युवा साक्षी मलिक से उम्मीद की जा रही थी कि वह अपने करियर में आगे बढ़ने का अनुभव हासिल करेंगी।

लेकिन निशानेबाजों और टेनिस सितारों के असफल रहने के बाद देश एक बार फिर उस खेल पर उम्मीदों के साथ नज़र बनाए हुए था जिसने पिछले दो संस्करणों में पदक दिलाए थे। इससे पहले सुशील कुमार (Sushil Kumar) और योगेश्वर दत्त (Yogeshwar Dutt) ने भारत के लिए रेसलिंग में पदक हासिल किए थे।

जहां अपने साथी विनेश फोगाट को बाहर निकलते हुए देखने के बाद, अब साक्षी मलिक पर दबाव आ गया था। साक्षी ने बाद में तब के बारे में डेकन हेराल्ड के साथ बातचीत में कहा था:

’थोड़ा दबाव भी था और मूड भी थोड़ा डाउन था, लेकिन मैंने सोच लिया था कि अपनी बाउट के अलावा मैं किसी बात पर ध्यान नहीं दूंगी।‘’

जिस तरह से इस भारतीय पहलवान ने 58 किग्रा भारवर्ग में कैरीओका एरिना में अपने क़दम रखे थे, उससे उनपर दवाब साफ़ झलक रहा था। लेकिन शुरुआती दौर में जीत के बाद क्वार्टरफाइनल में उन्हें रूसी वेलेरिया कोब्लोवा (Valeria Koblova) के हाथों 2-9 से हार का सामना करना पड़ा था।

लेकिन कोब्लोवा ने इसके बाद फ़ाइनल में जगह बना ली और साक्षी को रेपेचाज राउंड के ज़रिए पजक जीतने का एक और मौक़ा मिल गया था। इस बार साक्षी ने निराश नहीं किया और इतिहास रच डाला।

साक्षी की शानदार वापसी

साक्षी मलिक का कांस्य पदक का मुक़ाबला तब की एशियन चैंपियन किर्गरिस्तानी पहलवान एसुलु टाइनिबेकोवा (Aisuluu Tynybekova) के ख़िलाफ़ था।

साक्षी ने राष्ट्रीय ध्वज का बढ़ाया मान

तकनीकी रूप से एक प्रतिभाशाली पहलवान के ख़िलाफ़ साक्षी मलिक को पता था कि अगर उन्हें इस करो या मरो के मुक़ाबले में जीत हासिल करनी है तो अपने खेल के पहले मिनट से ही शीर्ष पर रहना होगा।

लेकिन भारतीय पहलवान का रक्षात्मक दृष्टिकोण उनके लिए महंगा साबित हुआ क्योंकि टाइनिबेकोवा ने शुरुआती दौर में ही 5-0 की आरामदायक बढ़त हासिल करते हुए मैच एकतरफ़ा बना डाला था।

लेकिन जब ऐसा लग रहा था कि रियो में ओलंपिक पदक के लिए भारत की प्रतीक्षा और आगे बढ़ेगी, तभी साक्षी ने करिश्माई प्रदर्शन किया और भारतीय कुश्ती इतिहास में सबसे बेहतरीन वापसी की।

साक्षी मलिक ने टाइनिबेकोवा के ख़िलाफ़ कुछ बेहतरीन दांव लगाते हुए स्कोर को 5-5 पर ले आईं थीं। लेकिन साक्षी ये जानती थीं कि अगर मुक़ाबला बराबरी पर समाप्त हुआ तो जीत किर्गीस्तानी पहलवान को मिलेगी क्योंकि शुरुआत में उन्होंने साक्षी पर 4 अंकों वाला दांव खेला था।

बाउट के आख़िरी लम्हों में साक्षी ने बेहतरीन अंदाज़ में प्वाइंट हासिल किया जिसने उन्हें कांस्य पदक विजेता बना दिया था। साक्षी ख़ुशी से मैट पर झूम रहीं थीं और उनके कोच ने उन्हें अपने कंधों पर उठा लिया था, और साक्षी के हाथों में भारतीय तिरंगा लहरा रहा था।

तुरंत ही वह अपने कोच कुलदीप मलिक (Kuldeep Malik) के कंधों पर थीं, और ख़ुद को भारतीय तिरंगे में लपेट रखा था।

''किसी भी एथलीट का यह सबसे अच्छा एहसास है। मुझे भारतीय ध्वज को इतने बड़े स्तर पर लहराना था - यह मेरा सबसे गौरवपूर्ण क्षण था।''

सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में इस जीत का जश्न ऐसा था मानो दीवाली मन रही हो। साक्षी मलिक ने सही मायनों में रियो में भारत का तिरंगा लहरा रहीं थीं और देश का मान बढ़ा रहीं थीं।

साक्षी मलिक ने भले ही रियो गेम्स में कांस्य पदक जीतने वाली उपलब्धि के बाद से थोड़ा मायूस किया हो , लेकिन 2016 के राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित ये पहलवान टोक्यो ओलंपिक के लिए भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं।