जानिए पहलवान सुनील कुमार कैसे बने भारतीय कुश्ती के बादशाह

हरियाणा के इस पहलवान ने न केवल कुश्ती में अपनी रुचि को पुनर्जीवित किया है, बल्कि उनसे ओलंपिक 2020 में स्वर्ण पदक हासिल करने की भी उम्मीद है।

‘’ग्रीको क्या’’? सुनील कुमार की यही प्रतिक्रिया थी जब उनके कोच ने पहली बार उनके ओलंपिक सपने को पूरा करने के लिए कुश्ती के 'अलग' प्रारूप में भाग लेने के बारे में बताया था।

छह साल बाद, डबरपुर में जन्मे इस पहलवान ने एशियाई चैम्पियनशिप के पुरुषों के 87 किलोग्राम के फाइनल में किर्गिस्तान के अज़ात सालिडिनोव को हराया। और ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत के 27 वर्षीय स्वर्ण पदक के सूखे को समाप्त कर दिया।

एक छोटे गांव से अपना सपना लिए यह शख्स आज पूरी दुनिया में अपना और भारत का नाम रोशन कर रहा है। दरअसल हम बात कर रहे हैं पहलवान सुनील कुमार की। सुनील ने हरियाणा के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। सुनील ने अपनी जिंदगी और खेल करियर के दौरान हुए संघर्ष और जिंदगी की जुनूनी कहानी ओलंपिक चैनल के साथ साझा की। अब पहलवान सुनील का लक्ष्य 2020 में टोक्यो में होने वाले ओलंपिक में देश के लिए स्वर्ण पदक हासिल करना है।

छह साल बाद इस पहलवान ने जो किया, उसने सबको अंचभित कर दिया। दरअसल सुनील कुमार (Sunil Kumar) ने एशियाई चैंपियनशिप के 87 किग्रा भारवर्ग के फाइनल में किर्गिस्तान के अज़ात सालिडिनोल (Azat Salidinov) को शिकस्त दी। यही नहीं उन्होंने ग्रीक रोमन कुश्ती में भारत के 27 साल के लंबे इंतजार को भी खत्म किया और स्वर्ण पदक हासिल किया और एक नया इतिहास रच दिया।

इस शानदार जीत के बाद सुनील यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग (UWW) में चौथे पायदान पर पहुंच गए। वहीं, पहलवान सुनील कुमार ने ओलंपिक चैनल से बात की और कहा, "मैंने वास्तव में इस वर्ष अपने आत्मविश्वास पर कड़ी मेहनत की है और मुकाबले में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए मैं एक मनोवैज्ञानिक के साथ काम कर रहा हूं।"

आपको बता दें कि पिछले वर्ष सुनील कुमार फाइनल मुकाबले में ईरान के होसेन नूरी (Hossein Nouri) से हार का सामना करना पड़ा था और वह स्वर्ण पदक हासिल करने में चूक गए थे।

रेसलिंग का सपना ऐसे हुआ साकार

सुनील कुमार पूर्वी हरियाणा के सोनीपत जिले के एक छोटे से गांव से आते हैं। इस पहलवान का यहां तक पहुंचने का सफर इतना आसान नहीं रहा है। दरअसल, सुनील कुमार के पिता का सपना था कि उनका बेटा कुश्ती में देश का नाम रोशन करे, जिसकी वजह से वह कुश्ती में आए।

सुनील कुमार ने अपने जीवन के उन पड़ाव के बारे में जिक्र करते हुए कहा, "मेरे पिता हमेशा से मानते थे कि उन्हें अपने देश भारत की बेहतरी के लिए कुछ योगदान देने की ज़रूरत है। एक दिन वह मेरे पास आए और अपने पसंदीदा खेल कुश्ती के बारे में जिक्र किया, लेकिन हमारे शहर सोनीपत में कोई ट्रेनिंग कैंप नहीं था। इसलिए पिताजी ने उन्हें एक खेल अकादमी में दाखिला दिलाया।"

दरअसल पिता अश्विनी कुमार अपने बड़े बेटे को पहलवान बनाना चाहते थे, लेकिन बाद में उनके मना करने पर सुनील कुमार ने कुश्ती में अपना करियर बनाया और पिता का सपना पूरा किया। अश्विनी कुमार अपने चार बच्चों की पूरी पढ़ाई और स्वास्थ्य पर बारीकी से ध्यान रखते थे। पिता अश्विनी ने घर से 70 किमी दूर जींद के निडानी स्पोर्ट्स अकादमी में सुनील को भेजा। जहां सुनील ने कुश्ती सीखना शुरू किय, लेकिन साल 2010 में सुनील के पिता अश्विनी कुमार का सड़क दुर्घटना में निधन हो गया।

अपने पिता की देशभक्ति ने सुनील कुमार को रेसलिंग में लाया
अपने पिता की देशभक्ति ने सुनील कुमार को रेसलिंग में लायाअपने पिता की देशभक्ति ने सुनील कुमार को रेसलिंग में लाया

पिता के निधन के बाद सुनील ने कुश्ती छोड़ने का मन बना लिया, लेकिन माता अनीता और बड़े भाई सुमित कुमार ने उनके सपने को पूरा करने के लिए सुनील को प्रोत्साहित किया। सुनील उस दौरान अदाकमी में सब-जूनियर में कई मैच भी हार गए थे। सुनील ने अपने उस पल को याद करते हुए ओलंपिक चैनल से कहा, "जब पिता ने कुश्ती के लिए उनको 70 किमी दूर अकादमी में प्रवेश दिलाया तो उन्हें कई चीजों की आवश्यकता थी, लेकिन पिता जी ने कभी मुझे कुछ करने के लिए नहीं कहा और उन्होंने मुझे सिर्फ एक बेहतर पहलवान बनने पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए कहा।" 

इस तरह कुश्ती में हासिल की सफलता

सभी भारतीय पहलवानों की तरह सुनील कुमार को पहली बार निडानी में फ्रीस्टाइल कुश्ती के लिए पेश किया गया। हालांकि वह कुश्ती में अपने औसत दर्जे के कारण ज्यादा सफलता हासिल नहीं कर सके। उन्होंने अपने सब-जूनियर दिनों के दौरान कुश्ती में हिस्सा लिया, जहां ग्रीको-रोमन फॉर्मेट (Greco-Roman wrestling) नहीं था। वह हरियाणा के रोहतक के मेहर सिंह अखाड़ा में सुबह-शाम कड़ी मेहनत कर रहे थे। इसके साथ ही उन्हें ग्रीको रोमन कुश्ती में पेश किया गया।

सुनील ने अपने संघर्ष के बारे में जिक्र करते हुए कहा, "मेरे एक दोस्त ने अखाड़े में कम भारवर्ग में एक राष्ट्रीय टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक हासिल किया। इस बारे में मैंने अपने कोच से जानकारी हासिल की और मैंने इसे आजमाने का फैसला लिया।" वहीं, इसके छह महीने के अंदर ही सुनील ने 2015 में सब-जूनियर में स्वर्ण पदक हासिल किया और अगले वर्ष वह उत्तर प्रदेश के गोंडा में राष्ट्रीय चैम्पियनशिप जीत कर जूनियर कैटेगरी में नंबर एक के पायदान पर काबिज हो गए।  

सुनील कुमार ने 2016 के आखिरी में मनीला में एशियन जूनियर रेसलिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल हासिल किया। इसके साथ ही वह 2018 के आखिरी में सीनियर वर्ग में भी सफलता हासिल की। सुनील कुमार ने अपना शानदार प्रदर्शन करते हुए एक साल के अंदर जूनियर और सीनियर दोनों राष्ट्रीय चैंपियनशिप अपने नाम किया। महज 21 साल की उम्र में उन्होंने अपनी कैटेगरी में सब-जूनियर, जूनियर, नेशनल और कॉन्टिनेंटल चैंपियन हासिल की।          

उन्होंने कहा, "रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) और लक्ष्य स्पोर्ट्स का मुझ पर ग्रीको-रोमन रेसलिंग में विश्वास किया, उसके लिए मैं उनका आभारी हूं। मैंने अपने विपक्षी साथी को 8-1 से मात देकर सेमीफाइनल में पहुंचा।" 

2018 एशियाई खेलों के कांस्य पदक विजेता कज़ाक़िस्तान के कुस्ताबायेव के खिलाफ सेमीफाइनल में सुनील 8-1 से से पीछे चल रहे थे। कुस्ताबायेव को मुकाबले में जीत के लिए केवल एक अंक की आवश्यकता थी, क्योंकि ग्रीको रोमन में मुकाबला सुरक्षित करने के लिए 8 अंक का अंतर होना जरूरी रहता है।

2020 ओलंपिक में क्वालिफ़ाई करने के एक बड़े दावेदार हैं पहलवान सुनील कुमार
2020 ओलंपिक में क्वालिफ़ाई करने के एक बड़े दावेदार हैं पहलवान सुनील कुमार2020 ओलंपिक में क्वालिफ़ाई करने के एक बड़े दावेदार हैं पहलवान सुनील कुमार

सुनील ने इस बारे में जिक्र करते हुए कहा, "मैं राउंड ब्रेक पर हमेशा स्कोर-बोर्ड देखता था। जिसको लेकर मनोवैज्ञानिक ने मुझे बताया कि उन्हें मुकाबले के दौरान स्कोर-बोर्ड से अपनी नजर को दूर रखनी चाहिए। इसलिए मेरी नजर केवल अपने विरोधी सहयोगी पर थी, और मुझे यह भी नहीं पता था कि यह मुकाबला 8-1 से चल रहा था। मुकाबले के दौरान मैंने सिर्फ अपने मूव्स पर ध्यान दिया।"

इस तरह सुनील ने शानदार वापसी करते हुए मुकाबला 12-8 से अपने नाम कर लिया और फाइनल में अपनी जगह बनाने में सफल हुए। सुनील ने अभी हाल ही में UWW  रैंकिंग में अज़मात को पीछे छोड़ा है, और एशियन चैंपियनशिप में शानदार जीत हासिल करने के बाद वह 12 पायदान ऊपर पहुंच गए।

2020 ओलंपिक क्वालिफायर को लेकर तैयारी

सुनील कुमार नेशनल ग्रीको-रोमन कोच हरिगोबिंद सिंह और विदेशी प्रमुख कोच टेमो कसारशिविली के नेतृत्व में उन्होंने कज़ाक़िस्तान जैसे देशों में इंटरनेशनल कैंप में हिस्सा लिया। सुनील कुमार, मुकेश खत्री (Mukesh Khatri) (2004), रविंदर खत्री (Ravinder Khatri) (2016) और हरदीप सिंह (Hardeep Singh) (2016) के बाद चौथे भारतीय ग्रीको रोमन पहलवान होंगे, जो पिछले दो दशक में ओलंपिक संस्करण के लिए क्वालिफाई करेंगे। बता दें कि 1993 में पप्पू यादव (Pappu Yadav) ने 48 किग्रा भार वर्ग में भारत को एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक दिलाया था। तब से भारतीय ग्रीको रोमन पहलवान कुश्ती में अधिक सफलता हासिल नहीं कर सके हैं।  

23 फरवरी 2020 को केडी जाधव स्टेडियम में पप्पू यादन ने सुनील कुमार के पास जाकर गले लगाया था, वह गले लगाने वालों में से पहले व्यक्ति थे। भारतीय प्रशंसको को उम्मीद है कि इस बार यह पहलवान ग्रीको रोमन कुश्ती (Greco-Roman wrestling) में भारत का नाम रोशन करेगा।

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