शानदार दशक: दस सालों में इस तरह इन्होंने जीता विश्वास और जगाई उम्मीद

2020 टोक्यो ओलपंकि की तैयारियों को भारत के इन प्रदर्शनों से और भी प्रेरणा मिलती है कि किस तरह भारतीय एथलिटों ने खेल की दुनिया में अपना दबदबा बनाया

भारत के लिए अगले साल जापान में होने वाला 2020 टोक्यो ओलंपिक अब तक सबसे शानदार और क़ामयाब ओलंपिक हो सकता है, जो 2012 और 2016 संस्करण से कहीं आगे जा सकता है।

पिछले दो ओलंपिक में भारत को मिले 8 पदकों के अलावा इस दशक ने ऐसे कई यादगार पल दिए हैं, जिसको देखने के बाद ऐसा लगता है जैसे वह मशहूर कहावत ‘तूफ़ान से पहले की शांति’ सच होने जा रही है और इस बार कुछ बड़ा मुमकिन है।

एक नज़र डालते हैं पिछले दशक में हुए भारत के कुछ ऐतिहासिक खेल लम्हों पर

सिंधु और ओकुहारा के बीच हुआ ऐतिहासिक मैच

2016 रियो ओलंपिक के फ़ाइनल में पहुंचकर रातों रात एक उम्मीद बनी पी वी सिंधु के लिए दूसरे टूर्नामेंट उतार चढ़ाव से भरे रहे। उन्हें डेनमार्क, कोरिया और फ़्रेंच ओपन में शुरुआती दौर में ही हार झेलनी पड़ी। हालांकि इसके बाद सुन यू को मात देकर उन्होंने थाईहॉट चाइना ओपन का ख़िताब ज़रूर अपने नाम किया, जो 2016 में उनकी अंतिम चैंपियनशिप जीत थी। 2017 की शुरुआत उन्होंने बेहतरीन अंदाज़ में की, सिंधु ने लगातार सैयद मोदी अंतर्राष्ट्रीय और इंडिया ओपन का ख़िताब अपने नाम किया। इसके बाद एक सिंधु ने उस साल कोई चैंपियनशिप नहीं जीतीं।

सिंधु को पता भी नहीं था कि उनके सामने कितनी बड़ी चुनौती आने वाली है जब 2017 बीडब्लूएफ़ वर्ल्ड चैंपियनशिप में वह प्रबल दावेदार के तौर पर उतरीं थीं। सिंधु इस दौरान किम ह्यो मिन, चेऊंग एनगान यी, सुन यू और चेन यू फ़ेई को हराते हुए ख़िताबी भिड़ंत में जापान की नोज़ोमी ओकुहारा के सामने थीं।

वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिंधु के सभी मुक़ाबलों में अगर एनगान के साथ चले 1 घंटा 27 मिनट वाले मैच को छोड़ दें, तो बाक़ी सभी मैचों में सिंधु ने अपनी प्रतिद्वंदियों को सीधे गेम्स में ही शिकस्त दी थी। लेकिन ओकुहारा कुछ अलग ही इरादे से उतरीं थीं, ये ज़बर्दस्त फ़ाइनल सांस रोक देने वाला हो गया था। जहां कौन किस पर भारी है या कौन शक्तिशाली है इसका अंदाज़ा लगा पाना नामुमकिन के क़रीब हो गया था। एक घंटे और 50 मिनट के बाद आख़िरकार मैच जापान की ओकुहारा के पक्ष में ख़त्म हुआ जहां जापानी शटलर ने 21-19, 20-22, 22-20 से मैच और ख़िताब अपने नाम किया।

इस मुक़ाबले को न सिर्फ़ महिला एकल के सर्वोत्तम मुक़ाबलों में से एक का दर्जा हासिल हुआ बल्कि इसके बाद नोज़ोमी ओकुहारा और पी वी सिंधु के बीच हर मुक़ाबले को एक बदले की आग बना डाला।

सिंधु का ये वर्ल्ड चैंपियनशिप में पहला रजत पदक था, जो दो साल बाद स्वर्ण में भी तब्दील हुआ और साथ ही साथ उन्होंने 2017 का बदला भी ओकुहारा से ले लिया, जब उन्हें सीधे गेम्स में मात दे दी, इस बार मुक़ाबला सिर्फ़ 37 मिनट ही चला।

36 सालों के बाद भारतीय महिला हॉकी टीम ने ओलंपिक के लिया क्वालिफ़ाई

बॉलीवुड की मशहूर फ़िल्म ‘चक दे इंडिया’ ने भारतीय महिला हॉकी टीम को एक नई दीवानगी ज़रूर दे दी थी, लेकिन टीम का मैदान में कुछ ख़ास प्रदर्शन न करना उनके प्रेमियों की संख्या को कम करता जा रहा था। महिला टीम ने 1980 के बाद ओलंपिक के लिए भी क्वालीफ़ाई नहीं किया था, जब ये खेल मॉस्को में हुआ था। तब भारतीय महिला टीम ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए चौथे स्थान पर रहीं थीं।

भारतीय महिला हॉकी टीम को इसके बाद 36 साल लगे तब जाकर इस टीम ने 2016 रियो ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई किया। हांलाकि इसके लिए भारतीय महिला टीम को इंग्लैंड का भी शुक्रगुज़ार होना चाहिए, क्योंकि ये स्थान उन्हें यूरोपियन चैंपियनशिप के सेमीफ़ाइनल में स्पेन पर इंग्लैंड की जीत के बाद ही मिला। भारतीय महिला हॉकी टीम ने 2015 में बेल्जियम में हुए हॉकी वर्ल्ड लीग सेमीफ़ाइनल्स में शानदार प्रदर्शन किया था, और ओलंपिक क्वालिफ़िकेशन में ये प्रदर्शन भी बेहद अहमियत रखता है।

‘’भारतीय हॉकी और पूरे देश के लिए ये एक गर्व का पल है, हम पिछले 36 सालों से इसका इंतज़ार कर रहे थे। ये ख़ुशी हाल ही में भारतीय हॉकी की सभी बेहतरीन ख़ुशियों से भी बढ़कर है।‘’ ये बातें उस समय तत्कालीक हॉकी इंडिया के अध्यक्ष नरेंद्र बत्रा ने कही थी।

भारतीय महिला टेबल टेनिस टीम ने पहली बार 2018 में कॉमनवेल्थ गेम्स स्वर्ण पदक जीता

भारतीय टेबल टेनिस खिलाड़ियों की स्थिति भी पहले बहुत अच्छी नहीं थी, 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले कभी भी भारतीय टेबल टेनिस की ओर से इस चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक नहीं आया था। लेकिन इस बार तस्वीर बदलने जा रही थी।

भारत ने महिला टीम कैटेगिरी में अच्छा प्रदर्शन करते हुए फ़ाइनल तक का सफ़र तय किया, जिसमें मनिका बत्रा, मौमा दास और मधुरिका पात्कर बेहतरीन लय में दिखाईं दे रहीं थीं। लेकिन अब ख़िताबी भिड़ंत में भारत के सामने गत विजेता सिंगापोर की चुनौती थी, ऐसा देश जिसने 2002 में कॉमनवेल्थ गेम्स में टेबल टेनिस को शामिल करने के बाद हर संस्करण में इसका चैंपियन रहा था। लिहाज़ा शायद ही किसी को भारतीय टीम से उम्मीद भी रही होगी।

भारत की ओर से फ़ाइनल की शुरुआत मनिका बत्रा ने की और उन्होंने तियानवी फ़ेंग को शिकस्त देते हुए भारत को 1-0 की शुरुआती बढ़त दिला दी थी। ये एक बेहद ज़रूरी जीत थी जिसने भारतीय टीम में आत्मविश्वास भर दिया था, हालांकि अगले ही मैच में सिंगापोर ने मुक़ाबला जीतते हुए स्कोर 1-1 से बराबरी पर ला दिया था। इस मैच में मेंग्यू यू ने मधुरिका को मात दे दी थी।

अगले ही मैच में भारतीय टीम को फिर बढ़त मिल गई थी जब इस बार मधुरिका ने मौमा के साथ मिलकर महिला युगल मुक़ाबले में यीहान ज़ू और मेंग्यू पर जीत दर्ज की। इसके बाद मनिका बत्रा ने यीहान ज़ू पर जीत दर्ज करते हुए इतिहास रच दिया था और पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स में टेबल टेनिस में भारत को स्वर्ण पदक हासिल हुआ था।

‘’मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं एक ओलंपिक पदक विजेता और दुनिया की चौथे नंबर की पैडलर पर जीत दर्ज करूंगी। मैं जानती थी कि उन्हें मेरे पिंपल्ड रबर से दिक़्क़त हो रही थी, और मैंने ये महसूस किया। लेकिन मैंने अपनी ताक़त के तौर पर इसका इस्तेमाल नहीं किया, मैं हमेशा अपना खेल बदल रही थी। मैं उन्हें सेटल नहीं होने देना चाहती थी, इसलिए दूसरे गेम में मैंने अपना रबर बदल दिया।‘’ जीत के बत्रा ने ये बातें टीओआई के साथ कहीं थीं।

नीरज चोपड़ा वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाले पहले भारतीय एथलीट बने

शायद 2016 रियो ओलंपिक में भारत के सबसे योग्य एथलीट नीरज चोपड़ा हो सकते थे जो उस समय रियो नहीं जा पाए थे, लेकिन आज वह एक बड़ा नाम बन चुके हैं। नीरज ने पहले 2016 साउथ एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी ध्वस्त किया और वह यहीं नहीं रुके इसके बाद उन्होंने पोलैंड में हुए आईएएएफ़ अंडर-20 चैंपियनशिप में 86.48 मीटर दूर जेवलिन थ्रो करते हुए सभी को हैरान कर दिया था।

साथ ही साथ नीरज चोपड़ा ने एक इतिहास भी रच दिया था, वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाले वह न सिर्फ़ पहले ट्रैक एंड फ़ील्ड एथलीट बन चुके थे बल्कि सीनियर या जूनियर किसी भी स्तर पर वर्ल्ड रिकॉर्ड स्थापित करने वाले वह पहले भारतीय एथलीट हैं।

चोपड़ा इसके बाद हर सीज़न में अपने ही प्रदर्शन को और भी सुधारते चले जा रहे थे, 2017 एशियन एथलेटीक चैंपियनशिप में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीता और उससे भी अहम ये कि 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी गोल्ड मेडल जीतते हुए वह ऐसा करने वाले पहले भारतीय जेवलिन थ्रोअर बन गए। इस दौरान उन्होंने सीज़न का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 86.47 मीटर की दूरी तय की।

‘’मेरे लिए ये एक बेहद अहम पदक था, मैं अपने करियर का भी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहता था जो मैं बस एक सेंटीमीटर से चूक गया। मैं उसे हासिल करने के लिए इतना बेक़रार था जिसकी वजह से मैंने दो एटेम्प्ट ख़राब कर दिए। लेकिन मैं बेहद ख़ुश हूं और इस साल मेरे पास कई प्रतियोगिताएं हैं जिसमें मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकता हूं।“ नीरज चोपड़ा ने ये बातें स्वर्ण पदक जीतने के बाद टीओआई को कही थी।

जिनसन जॉनसन ने एशियाड 2018 में जीता गोल्ड

दिग्गज श्रीराम सिंह का 42 सालों पुराना रिकॉर्ड तोड़ते हुए केरला के इस एथलीट ने अपना नाम सुर्ख़ियों में ला दिया था। जिनसन जॉनसन ने गुवाहाटी में आयोजित हुई राष्ट्रीय अंतर्राज्यीय चैंपियनशिप के दौरान इस कारनामे को अंजाम दिया था। एशियाड 2018 में जॉनसन 800 मीटर इवेंट जीतने के प्रबल दावेदारों में से एक थे, लेकिन इस इवेंट में उनके साथी मनजीत सिंह ने उन्हें पीछे छोड़ते हुए स्वर्ण पदक पर कब्ज़ा जमा लिया था।

जॉनसन ने इसके बाद 1500 मीटर इवेंट में अपना जौहर दिखाया और उन्होंने शानदार 3:44.72 की टाइमिंग के साथ गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया था। उनकी रणनीतिक कुशलता देखने लायक़ थी, जब उन्होंने आख़िरी 80 मीटर बिजली की रफ़्तार से पूरा किया और ईरान के आमिर मोरादी (3:45.62) और बेहरिन के मोहम्मद तियोआली (3:45.88) को पीछे छोड़ दिया। जबकि मनजीत 3:46.57 की टाइमिंग के साथ चौथे स्थान पर रहे।

1500 मीटर की ओलंपिक प्रतियोगिता और दूसरी प्रतियोगिताओं के बीच के फ़र्क पर बात करते हुए इस जीत के बाद जॉनसन ने कहा, ‘’दो चीज़ें होती हैं, पहली ये कि इस तरह की दौड़ रणनीतिक दौड़ होती हैं, जहां अक्सर ओलंपिक और वर्ल्ड चैंपियनशिप जैसी बड़ी प्रतियोगिताओं में टाइमिंग बेहद कम हो जाती है। लिहाज़ा, उससे मेरी तुलना न करें।‘’

‘’दूसरा ये कि जब आप ओलंपिक की फ़ाइनल रेस में दौड़ते हैं तो आपका ध्यान टाइमिंग पर नहीं होता है। आप बस स्वर्ण पदक या दूसरे पदक जीतने के बारे में सोच रहे होते हैं, अगर इस क्रम में टाइमिंग भी अच्छी हो तो फिर शानदार बात है। अगर आप 2016 रियो ओलंपिक के सेमीफ़ाइनल्स की टाइमिंग को देखें तो वह विश्व स्तरीय थीं, क़रीब 3 मिनट और 40 सेकंड्स।‘’ ये बातें जॉनसन ने इंडिया टूडे के साथ कहीं।

मैरीकॉम बनीं दुनिया की सबसे क़ामयाब मुक्केबाज़

दुनिया अभी ही भारत की दिग्गज महिला मुक्केबाज़ एम सी मैरीकॉम की क़ायल हो गई है, और उनके लिए अब ऐसा लगता है कि कोई भी उपाधि या विशेषण छोटा ही है। मैरीकॉम अब भारत की ही नहीं बल्कि मुक्केबाज़ी इतिहास में पुरुष और महिला सभी में सबसे क़ामयाब मुक्केबाज़ बन गईं हैं।

उम्र को दरकिनार करते हुए मैरीकॉम ने वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में एक बार फिर 48 किग्रा वर्ग में हिस्सा लिया था, जहां वह इससे पहले पांच बार 2002, 2005, 2006, 2008 और 2010 में भी वह चैंपियन रहीं थीं। इस बार फिर मैरीकॉम ने चैंपियनशिप अपने नाम करते हुए वर्ल्ड चैंपियनशिप का छक्का लगा दिया था।

मैरीकॉम का फ़ाइनल मुक़ाबला यूकरेन की हन्ना ओकहोता के ख़िलाफ़ था, जिसे भारत की दिग्गज मुक्केबाज़ ने 5-0 से एकतरफ़ा अंदाज़ में अपने नाम किया। इसके साथ ही मैरीकॉम ने क्यूबा के पुरुष मुक्केबाज़ फ़ेलिक्स सेवन की बराबरी कर ली थी, और 2019 वर्ल्ड महिला मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतते हुए मैरीकॉम ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में अपना 8वां पदक जीतते हुए चैंपियनशिप में सबसे ज़्यादा पदक जीतने वाली मुक्केबाज़ (पुरुष और महिला दोनों में) बन गईं।

वेट लिफ़्टिंग में मीरा बाई चानू ने जीता गोल्ड

एक बेहतरीन और प्रतिभाशाली वेट लिफ़्टर मीरा बाई चानू शुरू से ही एक बड़ी उम्मीद बन कर उभरीं थीं, पहली बार वह सुर्ख़ियों में तब आईं जब उन्होंने ग्लैस्गो में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में 48 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीतकर सभी को हैरान कर दिया था। यहां तक कि 2016 रियो ओलंपिक से पहले मणिपुर की इस वेट लिफ़्टर से ओलंपिक में भी पदक की उम्मीद जग गई थी।

लेकिन रियो में वह अपनी प्रतिभा के साथ इंसाफ़ नहीं कर पाईं, उन्होंने अपना इवेंट तक पूरा नहीं किया और क्लीन एंड जर्क के तीनों ही एटेम्प्ट में नाकाम रहीं। उन्हें इससे उबरने में क़रीब एक साल लगे और तब जाकर उन्होंने अपना पहला गोल्ड मेडल जीता।

2017 वर्ल्ड चैंपियनशिप में मीरा बाई ने 48 किग्रा वर्ग में कुल 194 किग्रा भार उठाया था, 85 किग्रा स्नैच में और 109 किग्रा क्लीन एंड जर्क में, और स्वर्ण पदक पर कब्ज़ा जमाया। उस वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत के लिए पहला गोल्ड मेडल था, साथ ही साथ 1995 के बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत को स्वर्ण पदक मिल रहा था, इससे पहले कर्नम मलेश्वरी ने भारत के लिए चीन में हुए वर्ल्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था।

दीपा कर्माकर ने ग्लैस्गो 2014 में जीता कांस्य पदक

2016 रियो ओलंपिक में वॉल्ट ऑफ़ डेथ या प्रोदुणोवा को लेकर चर्चा में रहने वाली और ओलंपिक पदक के बेहद क़रीब पहुंचकर चूकने वाली अगरतला की फ़्लैट फ़ुटेड जिम्नास्ट दीपा कर्माकर सिर्फ़ दूसरी भारतीय आर्टिस्टिक जिम्नास्ट हैं जिन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स पदक जीता है। उनसे पहले आशीष कुमार ने भी आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक में कॉमनवेल्थ पदक हासिल किया है।

उस टूर्नामेंट यानी 2014 ग्लास्गो कॉमनवेल्थ में तब 20 वर्ष की उम्र में हिस्सा ले रही दीपा की शुरुआत अच्छी नहीं रही थी, वॉल्ट-1 में दीपा ने सिर्फ़ 13.633 प्वाइंट्स का स्कोर हासिल किया था। जो फ़ाइनल में हिस्सा ले रहे सभी 8 प्रतिभागियों में सबसे कम था, लेकिन अगले ही वॉल्ट में 15.100 के स्कोर के साथ उन्होंने धमाकेदार वापसी की, जो वॉल्ट-2 में किसी भी प्रतिभागी का सबसे ज़्यादा स्कोर था।

इस शानदार वॉल्ट ने भी दीपा के स्कोर को औसतन 14.366 लाया, जबकि इंग्लैंड की क्लाउडिया फ़्रैगेपेन 14.633 के साथ गोल्ड मेडल विजेता रहीं। और कनाडा की एल्साबेथ ब्लैक 14.433 के साथ रजत पदक जीतने में क़ामयाब रहीं।

भारतीय शूटरों का सधा हुआ निशाना

क्रिकेट के अलावा, अगर भारत में कोई खेल है जो ज़मीनी स्तर से ही एक बेहतरीन प्लानिंग के साथ आगे बढ़ रहा है, और नई नई युवा प्रतिभाएं देता जा रहा है, तो वह है शूटिंग। 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में तो भारतीय शूटरों ने लाजवाब प्रदर्शन किया था, और 7 स्वर्ण पदक सिर्फ़ शूटिंग से ही आए थे।

2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी भारतीय शूटर्स ने कमाल का प्रदर्शन किया था और भारत के कुल 64 में से 17 पदक शूटिंग से आए थे, यानी क़रीब एक तिहाई हिस्सा। जबकि 2018 में 27 शूटरों ने कुल 16 पदक भारत की झोली में डाले जिसमें 7 गोल्ड थे और ये सभी कॉमनवेल्थ गेम्स के रिकॉर्ड तोड़ते हुए हासिल किए गए।

इतना ही नहीं अगले साल होने वाले 2020 टोक्यो ओलंपिक के लिए भारत के अब तक 15 शूटरों ने 10 अलग अलग इवेंट में कोटा हासिल कर लिया है। जिसमें 8 पुरुष और 7 महिला शूटर हैं, इनमें मणु भाकर, सौरभ चौधरी, अपूर्वी चंदेला जैसे बड़े और प्रतिभाशाली नाम भी शामिल हैं। ओलंपिक का कोटा हासिल करने वाले सभी शूटरों ने हाल ही में हुए सभी आईएसएसएफ़ वर्ल्ड कप में कमाल का प्रदर्शन किया था। जिसके बाद भारतीय फ़ैंस से लेकर शूटिंग दिग्गजों को भी इस बात की पूरी उम्मीद है कि इस बार 2020 टोक्यो ओलंपिक में शूटिंग भारत के लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकता है, और सबसे ज़्यादा पदक यहीं से देश को मिल सकते हैं।

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