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सैनिक, ओलंपियन, राजनेता: राज्यवर्धन सिंह राठौर के बारे में 9 बातें जो आप नहीं जानते होंगे 

कारगिल युद्ध में लड़ने से लेकर खेलो इंडिया शुरू करने तक, शूटिंग के इस दिग्गज खिलाड़ी ने राष्ट्र के लिए कई मायनों में अपना योगदान दिया है।

लेखक ओलंपिक चैनल ·

राज्यवर्धन सिंह राठौर ने 2004 के एथेंस ओलंपिक में उस वक्त सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने डबल ट्रैप शूटिंग स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीता। वह प्रथम भारतीय हैं जिन्होंने देश के लिए व्यक्तिगत ओलंपिक सिल्वर मेडल जीता।

गौरतलब है कि उनका जीवन और करियर काफी रोमांचक रहा है। तो आइए उनके जीवन पर एक बार फिर से नज़र डालते हैं और वह बातें जानने की कोशिश करते हैं जिनके बारे में आप शायद ही जानते होंगे:

प्रोफेशनल शूटिंग में 28 की उम्र में रखा कदम

कोई भी एथलीट जो ओलंपिक में जाने के सपने देखता है, वह आमतौर पर अपने करियर की शुरुआत कम उम्र से करता है। हालांकि, भारत के पहले ओलंपिक व्यक्तिगत रजत-पदक विजेता ने 28 साल की उम्र में पेशेवर शूटिंग में अपने कदम रखे।

उपनाम ‘चिली’ पुकारे जाने वाले राठौर ने एक बच्चे के रूप में कई खेल खेले, जिसमें क्रिकेट, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल। यही नहीं, उन्होंने डिस्कस थ्रो इवेंट में एक राष्ट्रीय मीट में अपने विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय का प्रतिनिधित्व भी किया।

‘कप्तान’ के तौर पर लड़ा कारगिल युद्ध

आप सभी राज्यवर्धन सिंह राठौर के सेना में अपनी सेवा देने के बारे में जानते होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में लड़ाई लड़ी थी? राठौर कप्तान के पद पर पाकिस्तान के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में सीमा पर मौजूद रहे और एक साल बाद मेजर के पद पर पदोन्नत किए गए।

खेल मंत्रालय का प्रभार संभाला

उन्होंने पेशेवर शूटिंग से सेवानिवृत्त होने के बाद राजनीति में कदम रखा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के बाद खेल मंत्रालय का कार्यभार संभालने से पहले 2014 में संसद सदस्य बने। बाद के कार्यकाल में राज्यवर्धन सिंह राठौर ने नवल एल माउतावकेल, जॉन बोलैंड, पिएत्रो मेनेया और कई अन्य ओलंपिक पदक विजेताओं को शामिल किया, जो मंत्री भी बने।

राठौर का बेटा है एक जूनियर शूटिंग चैंपियन

राज्यवर्धन सिंह राठौर के बेटे मानवदित्य ने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए भविष्य के चैंपियन बनने के संकेत दिए हैं। मानवदित्य सिंह राठौर ने 14 साल की उम्र में जूनियर नेशनल ट्रैप का खिताब जीता था और 2019 में खेलो इंडिया यूथ गेम्स में अंडर-21 ट्रैप इवेंट में गोल्ड जीता था।

उन्होंने नेशनल शॉटगन चैंपियनशिप में तीन स्वर्ण पदक जीते और भारतीय सीनियर टीम में जगह बना रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि राठौर ने अपने बेटे का आधिकारिक कोच नहीं बनने का विकल्प चुना है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वह उसपर पर्याप्त सख्त नहीं हो सकते - लेकिन स्पष्ट रूप से वह एक स्थिर संरक्षक की भूमिका निभाते हैं।

उनकी पत्नी 2004 में राठौर के पदक जीतने के क्षण को नहीं देख सकीं

राज्यवर्धन सिंह राठौर ने स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ में मास्टर्स की डिग्री ली है, लेकिन यह उनकी पत्नी थी जिन्होंने आवश्यकता पड़ने पर रणनीति की योजना में एक भूमिका निभाई। राठौर ने अपनी पत्नी डॉ. गायत्री राठौर को उनके योगदान के लिए श्रेय दिया है। दुर्भाग्यवश डॉ. गायत्री राठौर केबल ऑपरेटरों की हड़ताल के कारण अपने पति को सिल्वर पर निशाना लगाते हुए लाइव नहीं देख सकीं।

2014 में राठौर के पास थीं 11 बंदूकें

भारत में 2014 के आम चुनावों से पहले राठौर की अनिवार्य सार्वजनिक संपत्ति की घोषणा से पता चला कि उनके पास 11 बंदूकें थीं, जिनमें नौ 0.12 बोर की बंदूकें थीं, जिनमें से एक की कीमत 1.48 लाख रुपए थी। उनमें से अधिकांश को पुरस्कार के रूप में सम्मानित किया गया था। उसके अलावा उनके पास 20,000 रुपए की एक LVT-322 पिस्तौल भी है। यह भी उन्होंने पुरस्कार के रूप में जीती।

फिटनेस का राज़ – ऑमलेट और योगा

यह पहलू उनकी सैन्य पृष्ठभूमि को देखते हुए बहुत आश्चर्यचकित करने वाला नहीं है, लेकिन सेना और शूटिंग दोनों से सेवानिवृत्ति होने के इतने वर्षों बाद भी राज्यवर्धन सिंह राठौर अपने आपको पूरी तरह से फिट रखना पसंद करते हैं और अक्सर अपने स्वास्थ्य काम करते रहते हैं। इसके लिए वह ऑमलेट खाते हैं और योगा करते हैं।

राष्ट्रमंडल खेल रिकॉर्ड धारक

2004 में जब उन्होंने अपने ओलंपिक पदक के साथ शोहरत हासिल की तो उसके बाद ही 50 वर्षीय राठौर ने 2002 के मैनचेस्टर खेलों में अपने स्वर्ण पदक के दौरान राष्ट्रमंडल खेलों में भी रिकॉर्ड बनाया। उन्होंने मेंस डबल्स ट्रैप एकल स्पर्धा में 200 में से 192 निशाने लगाए, जो एक मील का पत्थर है। जिसे बाद के किसी भी खेल में नहीं बनाया गया है।

अपनी पसंदीदा बंदूक को खो बैठे

शूटिंग में गोल्ड जीतने के बाद मिस्र के काइरो में 2006 के ISSF विश्व कप में 2008 बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालिफिकेशन हासिल करने के बाद राज्यवर्धन सिंह राठौर ने भारत लौटने के दौरान अपनी पेराज्ज़ी इतालवी बंदूक खो दी।

जिस एयरलाइन से वह उड़ान भर रहा थे, उसने अपना सामान खो दिया था। इसी सामान में वह बंदूक भी शामिल थी, जिसने राठौर को स्वर्ण पदक जीतने में मदद की थी। दिलचस्प बात यह है कि इसी एयरलाइन ने इस घटना के कुछ दिन पहले ही साथी ट्रैप शूटर रंजन बिरदीप सोढ़ी की बंदूक भी खो दी थी।