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अपने भरोसे के दम पर बिंद्रा ने गोल्ड पर निशाना लगाकर रच दिया इतिहास

पूरे तरीक़े से बीजिंग 2008 के लिए तैयार होने के बाद, भारतीय निशानेबाज़ ने व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत को पहला ओलंपिक स्वर्ण दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

भारत में ओलंपिक के फॉलोवर्स के लिए 11 अगस्त की तारीख एक विशेष और यादगार दिन है।

इस दिन 2008 में अभिनव बिंद्रा (Abhinav Bindra) ने भारत को पहला - और आज तक का - व्यक्तिगत स्पर्धा में एकमात्र - ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाया था।

2008 के बीजिंग ओलंपिक खेलों में पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में अपने अंतिम शॉट में 10.8 के स्कोर के साथ 25 वर्षीय निशानेबाज़ ने ओलंपिक चैंपियन का खिताब अपने नाम कर लिया।

यह वो पल था, जब अभिनव बिंद्रा ने एक बच्चे की तरह जश्न मनाया था।

"बीजिंग हॉल में मैं बहुत ज्यादा शांति महसूस कर रहा था।" उन्होंने अपनी आत्मकथा, ए शॉट इन हिस्ट्री में लिखा है। "मेरा हाथ हिलाया जा रहा था, मेरे नाम लिए जा रहे थे और दुनिया ये सब देखकर हैरान थी।"

बीजिंग में हुआ सपना साकार

चार साल पहले एथेंस 2004 में पदक का मौका गंवाने के बाद, अभिनव बिंद्रा ने बीजिंग में होने वाले ओलंपिक खेलों में भूखे शेर की तरह दहाड़ लगाई।

शूटर अभिनव बिंद्रा भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता हैं।

बिंद्रा ने कहा, "मुझे यकीन नहीं था कि मैं जीतने वाला हूं। लेकिन मुझे पता था कि मेरे पास जीतने के लिए जरूरी चीजे हैं क्योंकि मैं खुद उस जगह तक पहुंचा दिया था, जहां इसे हासिल कर सकूं।”

अभिनव बिंद्रा ने जिस रिजर्व ’के बारे में बात की थी, वो बीजिंग खेलों की तैयारी के लिए था।

कोच हेंज रिंकीमियर और गेब्रियल बुहल्मन का देख-रेख में अपने शूटिंग कौशल को चमकाने के लिए अभिनव बिंद्रा ने जर्मनी के डोर्टमंड में काफी समय बिताया। वो कोच यूवे रिस्तेर से मिलने और बड़े मंच पर प्रदर्शन करते समय अपनी आशंकाओं को दूर करने के लिए म्यूनिख गए।

बिंद्रा ने वो सब कुछ का पहले ही अभ्यास में किया था, उन्होंने बीजिंग में किया, जिसमें हाई एंकल बूट पहनकर शूटिंग के क्षेत्र में चलना और एक मॉक फ़ाइनल’ में जिस तरह से उन्होंने खेल दिखाया, ठीक वैसा ही उन्होंने बीजिंग में किया।

बाद में भारतीय निशानेबाज़ ने खेलों से एक सप्ताह पहले कमांडो की ट्रेनिंग ली। जिससे ऐसा लगता था कि कुछ काम करना है,

“मैं बिना किसी डर के बीजिंग पहुंचा। विश्वास एक ऐसी चीज़ थी जो कभी मेरे साथ नहीं थी, लेकिन इस बार, मुझे विश्वास खोजने के लिए जिस छलांग की जरूरत थी, वह मैंने लगाई।”

एक भारतीय ओलंपिक चैंपियन का उदय

अपनी प्रतिभा के अनुसार, चार बार के राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता ने बिना किसी परेशानी के क्वालिफिकेशन हासिल कर ली, जबकि उनके हमवतन गगन नारंग बाहर हो गए।

अभिनव बिंद्रा को साइटिंग टाइम में कुछ परेशानी का सामना करना पड़ा - पांच मिनट का वो समय होता है जहां निशानेबाजों को फाइनल से पहले राइफल की जांच करने के लिए लक्ष्य पर शूट करना होता है - उनकी बंदूक की साइट (लक्ष्य करने वाली डिवाइस) बंद थी और अंतिम क्षण तक इससे छुटकारा पाने के लिए उसे बदल दी।

Bindra brings India's first individual gold

Abhinav Bindra registers India's first-ever individual Olympic Games gold m...

जैसे ही गोल्ड मेडल मैच का राउंड शुरू हुआ, तो वो शांत हो गए, क्योंकि अभिनव बिंद्रा इतिहास रचने के बेहद करीब थे।

भारतीय दिग्गज निशानेबाज़ ने पहले शॉट से ही शानदार शूटिंग शूरू कर दी।

क्वालिफिकेशन स्टेज में शीर्ष पर रहने वाले फिनलैंड के हेनरी हेक्किनन, अभिनव बिंद्रा के साथ अंतिम शॉट तक बराबरी पर थे, लेकिन महत्वपूर्ण समय पर वो बिंद्रा को टक्कर नहीं दे सके और अपने अंतिम शॉट में 9.7 स्कोर ही कर सके। इस बीच, भारतीय खिलाड़ी ने लगभग 10.8 का स्कोर किया।

प्रतियोगिता में अभिनव बिंद्रा ने 2004 एथेंस ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता झू किनन को पीछे छोड़ते हुए 10 मीटर पुरुष एयर राइफल को 700.5 के स्कोर के साथ पूरा किया, झू किनन को रजत पदक से संतोष करना पड़ा।

भारत के एकमात्र व्यक्तिगत ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता ने कहा कि, मैंने राहत की साँस ली थी, यह चार साल से लगातार प्रयास के बाद हासिल हुई थी। इस जीत ने थकावट को दूर कर दिया, संतुष्टि गले लगा रही थी और दूसरे के लिए भी शानदार मौका था।"

“वो 10 शॉट्स, वाकई जादुई थे। स्थिरता, टाइमिंग, प्रयास के साथ लगाए गए मेरे जीवन के सर्वश्रेष्ठ शॉट थे ... मुझे पता था: मैं इससे बेहतर शूटिंग नहीं कर सकता था।”

बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण भारतीय खेल समुदाय के लिए बहुत खास है। जबकि इसने खेल की रूपरेखा को बढ़ावा देने में मदद की, अभिनव बिंद्रा की उपलब्धियों ने कई युवाओं को अपने कौशल पर विश्वास दिलाने में मदद की और खेल को पेशेवर स्तर पर भी ले जाने दिया।