फ़ीचर

रियो की निराशा को पीछे छोड़ टोक्यो ओलंपिक पर है अतानु दास का ध्यान

इस तीरंदाज़ ने माना कि पिछली बार वह मानसिक तौर पर तैयार नहीं थे लेकिन इस बार वह पूरी तरह तैयार हैं।

लेखक लक्ष्य शर्मा ·

पूर्व ओलंपियन और 2020 टोक्यो ओलंपिक में क्वालिफाई कर चुके अतानु दास (Atanu Das) से व्यक्तिगत और डबल्स में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद पूरा देश कर रहा है। फैंस को उम्मीद है कि वह रियो 2016 की निराशा को पीछे छोड़ इस बार अच्छा प्रदर्शन करेंगें।

कोलकाता के रहने वाले और डासिंग, संगीत और ट्रैवेलिंग में रूचि लेने वाले अतानु का पहला प्यार तीरंदाजी ही है। इस खिलाड़ी ने केवल 14 साल की उम्र में ही तीरंदाजी करना शुरू कर दिया था और साल 2008 में टाटा तीरंदाजी एकेडमी में एडमिशन ले लिया। यहां उन्होंने कोरियाई कोच लिम चाय वॉंग (Lim Chae Wong) के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग ली

अतानु दास ने 2019 एशियाई तीरंदाज़ी चैंपियनशिप में जीते कुल तीन ब्रॉन्ज़ मेडल।

सफलता का पहला स्वाद

इसी साल उन्होंने अपने इंटरनेशनल करियर का आगाज किया और उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 34वें नेशनल गेम्स के रिकर्व मेंस टीम इवेंट में गोल्ड जीतकर उन्होंने सीनियर लेवल पर अपना पहला पदक जीता। इसके अलावा उन्होंने साल 2011 में वर्ल्ड यूथ चैंपियनशिप में सिल्वर पदक भी अपने नाम किया।

लंबे समय तक भारतीय तीरंदाज का सफर इसी तरह चलता रहा। नेशनल गेम्स की सफलता के बाद उन्होंने ढाका में हुए तीसरे एशियन ग्रां प्री के रिकर्व मिक्स्ड टीम इवेंट में कांस्य जीता तो रिकर्व मेंस व्यक्तिगत इवेंट में गोल्ड पर निशाना लगाया।

इसी के साथ उन्होंने साल 2013 में एशियन आर्चरी ग्रां प्री के मेंस व्यक्तिगत इवेंट और मिक्स्ड टीम इवेंट में कांस्य पदक जीता। वहीं इस तीरंदाज़ ने कोलांबिया में हुए वर्ल्ड कप के मिक्स्ड टीम इवेंट में दीपिका कुमारी (Deepika Kumari) के साथ मिलकर कांस्य पदक हासिल किया।

साल 2014 में मेडलीन में हुए वर्ल्ड कप के मेंस टीम इवेंट में सिल्वर पदक जीतकर अतानु सुर्खियों में आ गए थे।

रियो की निराशा

वर्ल्ड कप के बाद इस खिलाड़ी ने अपने से अनुभवी जयंत तालुकदार (Jayanta Talukdar) और मंगल सिंह चंपिया (Mangal Singh Champia) को पीछे छोड़ रियो ओलंपिक में अपनी जगह पक्की की। यह पहला मौका था जब अतानु ओलंपिक में हिस्सा ले रहे थे।

वह रियो खेलों में पुरुषों की श्रेणी में एकमात्र भारतीय थे। लेकिन अतानु वो कमाल नहीं कर पाए, जिसकी उम्मीद उनसे की जा रही थी। कोरिया के ली सेउंग-यून (Lee Seung-Yun) के खिलाफ उन्होंने संघर्ष तो किया लेकिन वह नाकाफी साबित हुआ।

चार साल पहले रियो में अगले दौर में आगे बढ़ने के बावजूद उन्होंने ये दिखाया कि भले ही उनका प्रदर्शन उम्मीद के अनुसार नहीं रहा हो लेकिन वह उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं था। उन्होंने खुद माना कि मानसिक तौर पर मजबूत ना होने के कारण वह रियो में कामयाब नहीं पाएं।

ईएसपीन से बातचीत में उन्होंने बताया कि “रियो के अनुभव के बाद मुझे सीखने को मिला कि दिमाग का सही इस्तेमाल कैसे करना है। हमारा खेल आत्मविश्वास, एकाग्रता और व्यग्रता पर ही टिका हुआ है। मेडल मिलने और ना मिलने का अंतर बहुत ही कम होता है”।

रियो के अनुभव के बाद “मैं निश्चित तौर पर कह सकती हूं कि मैंने वहां से बहुत कुछ सीखा और अब मैं टोक्यो ओलंपिक के लिए पूरी तरह से तैयार हूं”।

टोक्यो में टारगेट पर निशाना

साधारण समय के अगले दो साल बाद वह दीपिका कुमारी के साथ खेलते नजर आए। अतानु दास ने तरुणदीप राय (Tarundeep Rai) और प्रवीण जाधव (Pravin Jadhav) के साथ टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया।

अतनु दास ने  पिछले साल एशियाई तीरंदाजी चैंपियनशिप में तीन कांस्य पदक जीतने के साथ बाकी विश्व तीरंदाजों को आगाह कर दिया कि वह इस बार कोई भी खिताब जीतने के लिए तैयार हैं।

वह व्यक्तिगत इवेंट के साथ मिक्स्ड इवेंट में भी तीसरे स्थान पर रहे, जहां वह अपनी मंगेतर के साथ जोड़ी बनाकर खेले। अब जब टोक्यो ओलंपिक एक साल के लिए स्थगित हो गया है तो उनके पास तैयारी करने का बहुत समय है और जो गलती उन्होंने रियो में की थी, उसमें भी वह सुधार करना चाहेंगे।

भारत की दीपिका कुमारी और अतानु दास एशियाई तीरंदाज़ी चैंपियनशिप में रिकर्व मिश्रित टीम में ब्रॉन्ज़ मेडल के लिए प्रतिस्पर्धा करते हुए शानदार फॉर्म में नज़र आए।

पिछले कुछ ओलंपिक में भारतीय तीरंदाजी टीम से काफी उम्मीदें बढ़ी हैं लेकिन वह अब तक कोई कमाल करने में असफल रही है। अब अतानु सहित सभी तीरंदाज पिछली निराशा को भूलाना चाहेंगे।

अब तक 4 भारतीय तीरंदाज टोक्यो के लिए क्वालिफाई कर चुके हैं। अब अतानु और दीपिका से ही पूरा देश मेडल की उम्मीद बांधे बैठा है। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि वह अगला साल ओलंपिक में कैसा प्रदर्शन करेंगे और रियो के अनुभव का फायदा कैसे उठाएंगे। हां ये जरूर है कि मानसिक तौर पर मजबूत हुए अतानु की आंखें अब टोक्यो पर ही टिकी हुई है।