कैसे पीडी चौगुले ओलंपिक मैराथन दौड़ने वाले पहले भारतीय बने

चौगुले को 'पवनंजय'- द कॉन्करर ऑफ द विंड की उपाधि से किया गया है सम्मानित

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

लंबी दूरी की दौड़ एथलीट की मानसिक शक्ति और सहनशीलता का परीक्षण है। एथलेटिक्स में देश के शुरुआती दिनों में सभी बाधाओं को पार करते हुए फड़प्पा दरेप्पा चौगुले या पीडी चौगुले ने ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले पहले भारतीय मैराथन बने।  

1920 के एंटवर्प समर ओलंपिक में छह एथलीटों ने भारतीय दल का प्रतिनिधित्व किया जिसमें चौगुले भी शामिल थे। इसके साथ वो ओलंपिक के मैराथन इवेंट में भाग लेने वाले पहले भारतीय एथलीट बने। उन्होंने 2 घंटे 50 मिनट 45:2 सेकंड के साथ दौड़ पूरी कर सम्मानजनक 19वां स्थान हासिल किया।

उत्तेजित दर्शक, अपने ऊपर फेंकी जा रही सोडे की कैन और यहां तक की गोली चलाए जाने के बीच उनके लिए दौड आसान आसान नहीं थी, लेकिन दृढ़ मानसिक शक्ति की बदौलत उन्होंने इन सब बाधाओं से पार पाते हुए बेहतरीन प्रदर्शन किया। कौन है यह भूला हुआ दिग्गज?

ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन के बाद अंग्रेज अधिकारियों के साथ पीडी चौगुले

शुरुआती दिन

चौगुले का जन्म 1900 के शुरुआत में कर्नाटक के बेलगाम में प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले खेती करने वाले एक परिवार में हुआ था। उन्होंने मुम्बई जाने से पहले जन्म स्थान पर छठी कक्षा तक मराठी माध्यम के स्कूल में अध्ययन किया।

पहलवान के रूप में मिली असफलता

अखाड़ों (एरेनास) में हर जगह कुश्ती के दांव—पेंचों का शोर सुनाई देता था क्योंकि उस समय यह खेल भारत के ग्रामीण इलाकों में बहुत लोकप्रिय था। बचपन में चौगुले को भी कुश्ती में बहुत रुचि थी। शुरू में उन्होंने इस खेल का पूरा आनंद लिया और वो इस खेल में करियर भी बनाना चाहते थे लेकिन एक चोट ने उन्हें कुश्ती से बाहर कर दिया।

एक स्थानीय अखाडे में कुश्ती मुकाबले के दौरान उन्हें चोट लगी। इस कारण वो इस खेल को आगे जारी नहीं रख पाए। हालांकि इस चोट के बाद भी चौगुले कमजोर नहीं पडे और चोट से उबरने के बाद उन्होंने एथलेटिक्स को चुना।

अच्छा भोजन और फिटनेस पर ध्यान

चौगुले सख्त अनुशासन का पालन करने वाले थे। वह पूरी तरह से शाकाहारी थे और इंग्लैंड व बेल्जियम की यात्रा के दौरान भी उन्होंने अपना भोजन नहीं बदला।

खुद को फिट रखने के लिए वो रोजाना 2000 पुश-अप और 2000 सिट-अप लगाते थे। हर दिन बेलगाम से खानपुर (खेतों तक) करीब 58 किलोमीटर की दूरी पर नंगे पैर दौड़ते हुए तय करते थे।

खेल में शुरुआती करियर

चौगुले ने अपने करियर की शुरुआत में फिटनेस के लिए एक मानदण्ड तय किया। उन्होंने पुणे के डेक्कन जिमखाना क्लब द्वारा आयोजित राष्ट्रीय मैराथन और अन्य लंबी दूरी की दौड़ प्रतियोगिताओं के साथ मुंबई में अखिल भारतीय ओपन एमेच्योर एथलेटिक स्पोर्ट्स मीट में 10 मील और 1 मील की दौड़ में भी भाग लिया।

इन सभी आयोजनों में उनके वर्चस्व ने उन्हें उस समय के सबसे शानदार एथलीटों में से एक बना दिया। इसके बाद एंटवर्प समर ओलंपिक में भागीदारी ने उनका कद और बढा दिया।

1920 ओलंपिक

1919 में पुणे में डेक्कन जिमखाना द्वारा आयोजित मैराथन कार्यक्रम में चौगुले दोराबजी टाटा को प्रभावित करने में कामयाब रहे। इसके बाद चौगुले का ओलंपिक में जाने का सपना पूरा हो गया। टाटा ने 1920 के ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले छह खिलाडियों में चौगुले को शामिल किया।

यहीं पर चौगुले की मानसिक मजबूती सामने आई। मैराथन इवेंट से तीन दिन पहले चौगुले ने 10000 मीटर इवेंट के हीट में भाग लिया, जहां दर्शकों ने उन्हें परेशान किया। अफवाह है की एक दर्शक ने पिस्तौल भी निकाल ली इस कारण चौगुले ने दौड़ना बंद कर दिया।

तीन दिनों के बाद, उन्होंने साहस जुटाया और मैराथन में भाग लिया और अद्भुत आत्मविश्वास दिखाते हुए वर्षा-प्रभावित आयोजन में 19वें स्थान पर कब्जा जमाया।

अन्य उपलब्धियां और निधन

मैराथन के रूप में करियर ने उन्हें पहचान दिलाई। उन्हें 7 दिसंबर 1919 को बेलगाम के लोगों द्वारा उन्हें 'पवनंजय'- द कॉन्करर ऑफ द विंड की उपाधि से सम्मानित किया। उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान ओलंपिक में शामिल होने के एक साल पहले मिली।

कर्नाटक के पहले ओलंपियन होने के कारण उनके घर का नाम पवनंजय रखा गया। चौगुले ने 1958 में अंतिम सांस ली। उनके निधन के कई साल बाद 2003 में उनके सम्मान में एक डाक कवर जारी किया गया।