नॉर्मन प्रिचार्ड: ओलंपियन पथ प्रदर्शक, अभिनेता और IFA के सचिव

ओलंपिक में भारत को पदक जिताने वाले पहले एथलीट के रूप में याद किए जाते हैं नॉर्मन प्रिचार्ड

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

पहला हमेशा विशेष होता है और नॉर्मन प्रिचार्ड को हमेशा ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने और पदक जीतने वाले पहले एथलीट के रूप में याद किया जाएगा। उन्होंने दो पदक अपने नाम किए।

उन्होंने 1900 पेरिस ओलंपिक में 200 मीटर बाधा दौड़ और 200 मीटर डैश इवेंट में एक-एक रजत पदक जीता। यह उपलब्धि हासिल करने वाले वो पहले एशिया में जन्मे एथलीट बने।

पेरिस खेलों में उन्होंने पांच स्पर्धाओं में भाग लिया और तीन स्पर्धाओं के फाइनल में पहुंचे - 110 मीटर बाधा दौड़, 200 मीटर दौड़ और 200 मीटर बाधा दौड़। हालांकि वह 100 मीटर की पहली हीट जीतने के बाद 60 मीटर और 100 मीटर के फाइनल के लिए क्वालीफाई करने में सफल नहीं हो सके। लेकिन क्या आप जानते हैं कि प्रिचार्ड एक ओलंपियन से भी ज्यादा अपने करियर में कई तरह की टोपियां हासिल करने के मामले में भी जाने जाते हैं।

अंग्रेजी शासन में भारत की ओर से ओलंपिक में शामिल हुए नॉर्मन प्रिचार्ड

कोलकाता में गुजरा शुरुआती जीवन

नॉर्मन गिल्बर्ट प्रिचार्ड एक ब्रिटिश नागरिक थे। उन्होंने 1900 पेरिस ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। उनका जन्म कोलकाता के अलीपुर में 23 जनवरी, 1875 को अकाउंटेंट जॉर्ज पीटरसन प्रिचार्ड और हेलेन मेनार्ड प्रिचार्ड के घर हुआ था।

प्रिचार्ड ने कोलकाता के सेंट ज़ेवियर कॉलेज से स्नातक किया और फिर शहर की एक प्रसिद्ध बर्ड एंड कंपनी के साथ जुड़ गए।

इस बात की पुष्टि प्रसिद्ध अंग्रेजी ट्रैक इतिहासकीथ मॉर्बी ने की थी जिन्होंने 2000 के दशक की शुरुआत में लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी के इंडिया ऑफिस रिकॉर्ड्स अनुभाग से नॉर्मन के रिकॉर्ड का खुलासा किया था। उन्होंने ठाकुर की भारतीय निर्देशिका में नॉर्मन से संबंधित जानकारियों को भी मान्यता दी, जो 1960 में काम करने वाली कोलकाता की एक प्रसिद्ध प्रकाशन कंपनी है।

फुटबॉल से लगाव

प्रिचार्ड एक स्वाभिक एथलीट थे। वह ना केवल एक बेहतरीन धावक थे बल्कि अपने शुरुआती वर्षों के दौरान फुटबॉल के खेल से भी लगाव रखते थे।प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने बंगाल को 1894 और 1900 के बीच लगातार सात वर्षों तक 100 यार्ड की दौड में लगातार जीत दिलाई, जो उनके सबसे प्रसिद्ध रिकॉर्ड्स में से एक है। उन्होंने भारत के लिए एक ओपन फुटबॉल टूर्नामेंट में 1897 में सेंट जेवियर और सोवाबाजार के बीच हुए मैच में एक शानदार हैट्रिक भी दर्ज की।

बाद में उन्होंने पश्चिम बंगाल राज्य में फुटबॉल संघ का संचालन करने वाले भारतीय फुटबॉल संघ के मुख्य पदाधिकारियों में से एक के रूप में काम किया। यह 1893 में स्थापित किया गया था और भारत में सबसे पुराने फुटबॉल संघों में से एक है।

भारत से विदाई

प्रिचार्ड 1900 में जूट का व्यापार करने के लिए अपने पिता के साथ इंग्लैंड चले गए। इसी दौरान उन्होंने इंग्लैंड में एथलेटिक सर्किट में भाग लेना शुरू कर दिया था। इसके बाद उन्हें 1900 के ओलंपिक में भाग लेने का मौका मिला।

प्रिचार्ड के पिता ने उन्हें 17 साल की उम्र में ही असम के बागान से जूट की रस्सियां लाने के बारे में बताया। वह भारत लौटे लेकिन 1900 के पेरिस ओलंपिक में दो रजत पदक जीतकर।

बाद में फरवरी 1905 में यह कहा गया कि प्रिचार्ड ने अपने जन्म स्थान कोलकाता में जूट की बोली लगाई और व्यापार जारी रखने के लिए इंग्लैंड लौट गए। अपने मूल स्थान पर लौटने के बाद, प्रिचार्ड को IFA द्वारा विदाई दी गई, जहाँ उन्होंने 1900 से 1905 तक संयुक्त मानद सचिव का पद संभाला था।

अभिनय के क्षेत्र में उदय

एक् अंग्रेजी अभिनेता और रंगमंच के मालिक सर चार्ल्स विन्धम ने प्रिचार्ड में अभिनय की प्रतिभा देखी। दिल्ली में लॉर्ड कर्ज़न (तब भारत के वायसराय) के एक नाटक का मंचन देखने के बाद विन्धम ने उन्हें अभिनय के क्षेत्र में करियर बनाने की सलाह को गंभीरता से लेने की पेशकश की।

उनकी सलाह को मानते हुए प्रिचार्ड संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) चले गए और 1914 में अभिनय के क्षेत्र में अपनी व्यापक शुरुआत की। उन्होंने 26 नाटकों और 27 मूक फिल्मों में अभिनय किया, ऐसा करने वाले वो पहले ओलंपियन बने।

काम जेन आइर (1921), द ब्लैक पैंथर्स कब (1921), ब्यू गस्ट (1926) और डांसिंग मदर्स (1926) में उनके अभिनय की बेहतर झलक मिलती है। टुनाइट एट ट्वेल्व (1929) उनकी अंतिम फिल्म थी।

2002 में बंगाल क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान राजू मुखर्जी का स्कूल के पूर्व छात्रों की पत्रिका में ब्यू गस्ट में नॉर्मन ट्रेवर के बेहतरीन अभिनय को लेकर एक फीचर प्रकाशित हुआ। जिसमें बताया कि फ्रेंच सेना के कमांडेंट का चरित्र कोलकाता के पुराने एथलीट ने बहुत शानदार तरीके से निभाया। उनकी उम्र और चेहरे की विशेषताओं ने अपनी छाप छोड़ी।

जिस दिन उन्होंने स्टैमफोर्ड ब्रिज (1900 में लंदन में) दुनिया की स्प्रिंटिंग चैंपियनशिप जीती थी। मैंने उन दिनों को याद किया जब भारत की भूमि पर पैदा हुए नॉर्मन प्रिचार्ड (या मंच पर नॉर्मन ट्रेवर) ना केवल कम दूरी के सबसे तेज धावक बने, बल्कि फुटबॉल और रग्बी में भी शानदार रहे। नॉर्मन प्रिचार्ड खिलाड़ियों में सबसे निस्वार्थ थे। प्रिचार्ड ने मस्तिष्क की खराबी के कारण अक्टूबर 1929 में अंतिम सांस ली।राक