विश्व कप में रजत पदक हासिल कर अंशु मलिक ने पहलवान रहे पिता का सपना किया पूरा  

बेटी को विश्व कप में शानदार प्रदर्शन करते देख पिता की आंखों से नहीं थमे खुशी के आंसु 

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

भारत की उभरती हुई रेसलिंग स्टार अंशु मलिक बेलग्रेड में व्यक्तिगत विश्व कप में 57 किग्रा भार वर्ग में रजत पदक पर कब्जा जमाने के बाद बुधवार को शहर में चर्चाओं में आ गईं। उनकी यह सराहनीय उपलब्धि पहलवान रह चुके उनके पिता के लिए बहुत खास थी।

एक बडे आयोजन में अपनी बेटी को शानदार प्रदर्शन के साथ मैच खत्म करते देख धर्मवीर मलिक खुशी के आंसु नहीं रोक पाए।

मलिक सीनियर 1990 के दशक में जूनियर स्तर पर भारतीय टीम में नियमित पहलवान थे और अंतरराष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे। 1995 की कैडेट विश्व चैम्पियनशिप में भाग लेना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। हालांकि इसमें वो बिना पोडियम फिनिश के ही मैदान से बाहर लौटे। पांच साल बाद घुटने की चोट ने कुश्ती में उनका चमकता हुआ करियर खत्म कर दिया, लेकिन इस सप्ताह उन्होंने अपनी बेटी के माध्यम से अपने सपनों को साकार कर लिया।

पदक जीतने के बाद खुशी से झूमती पहलवान अंशु मलिक

विश्व कप में अंशु की उपलब्धि के बाद, मलिक सीनियर ने कहा कि "उनकी बेटी ने एक अंतरराष्ट्रीय पदक जीतकर उनके सपने को पूरा किया है जिसे वो कभी हासिल नहीं कर पाए।"

धर्मवीर ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि "मेरी बेटी ने एक अंतरराष्ट्रीय पदक जीतकर मेरा अधूरा सपना पूर कर दिया।"

उन्होंने आगे कहा कि "घुटने की चोट के कारण मुझे कुश्ती छोड़नी पड़ी और कभी अंतरराष्ट्रीय पदक नहीं जीत सका। हालांकि मेरे बड़े भाई पवन कुमार ने SAFF गेम्स में स्वर्ण पदक जीता हैै। अंशु का विश्व कप में पदक जीतना हमारी सभी उपलब्धियों से उपर है क्योंकि हर माता-पिता अपने बच्चों से ऐसी ही उम्मीद करते हैं।"

धर्मवीर ने यह भी खुलासा किया कि "उन्हें अंशु से कुश्ती में उत्कृष्ट प्रदर्शन की उम्मीद थी क्योंकि बचपन से ही पहलवानी से उसका लगाव रहा है। हालांकि उसके बजाय मेरी ज्यादा उम्मीद बेटे शुभम पर टिकी थीं। जबकि अंशु ने शुभम के साथ प्रशिक्षण सत्र के बाद कुश्ती में ज्यादा रुचि लेना शुरू कर दिया।"

उनके कोच जगदीश श्योराण ने कहा, "कि वह पढ़ाई के लिए बहुत समय देती है। इसलिए हम उसके लिए छोटे प्रशिक्षण सत्र आयोजित करने की योजना बना रहे हैं। कुश्ती उसके खून में इसलिए वह तेजी से दांव-पेंच सीख रही थी।"

अंशु में दृढ़निश्चयी भावना है। उसने करियर के पहले चार सालों के भीतर अपना जोश दिखाना शुरू कर दिया। उन्होंने 2016 में ताइवान में एशियाई जूनियर कुश्ती चैंपियनशिप में रजत पदक जीता और उसी साल विश्व कैडेट प्रतियोगिता में कांस्य पदक पर कब्जा जमाया।

अंशु द्वारा हासिल की शुरुआती सफलता को देखते हुए, उनके पिता ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में नौकरी छोड़ दी। बेटी को भावनात्मक सहयोग करने के लिए लखनऊ या सोनीपत स्थानांतरित हो गए, जहां अंशु प्रशिक्षण ले रही थी।

उन्होंने कहा, कि "हम किराए के मकान में रहते हैं और अंशु केवल कुश्ती पर ध्यान दे सके इसलिए में खुद खाना बनाता हूं।"

19 वर्षीय अंशु को पहली सफलता 2017 में मिली जब उन्होंने एथेंस में विश्व कैडेट चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।

उनके कोच श्योराण कहते हैं कि "इस जीत ने उसे एक पहलवान के रूप में बदल दिया। उसकी मानसिक स्थिति में बदलाव हुआ और वह प्रशिक्षण को ज्यादा समय देने लगी। वह रोजाना छह घंटे प्रशिक्षण में लेती है।"

अब यह युवा भारतीय पहलवान नई पारी की शुरूआत पर अपना ध्यान केंद्रित करने में लगी है।