सतेंद्र सिंह लोहिया - माइकल फेल्प्स के प्रशंसक भी भारत के पैरा-एथलीटों से अभिभूत

सतेंद्र सिंह लोहिया ने अपने बुलंद इरादों के दम पर शारीरिक विकलांगता की बाधा को भी पार कर रचा इतिहास

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

विकलांगता केवल मन में होती है। क्योंकि बुलंद इरादों के दम पर शारीरिक विकलांगता की बाधा को भी पार किया जा सकता है जैसा कि दिव्यांग तैराक सतेंद्र सिंह लोहिया ने किया। उन्होंने खुद को कभी कमजोर ना मानते हुए विकलांगता की सभी बाधाओं को दूर किया।

लोहिया ने बचपन से ही चुनौतियों का सामना किया, लेकिन वह इनसे हतास नहीं हुआ। जन्म के कुछ महीनों बाद उन्हें डायरिया हो गया और किशोरावस्था में इस बीमारी ने उन्हें वापस आ घेरा।

मध्यप्रदेश के भिंड निवासी 33 वर्षीय दिव्यांग तैराक लोहिया को बचपन में लकवा मार गया। इससे उनका शरीर 70 फीसदी तक विकलांग हो गया लेकिन यह उनके उत्कृष्टता हासिल करने के बीच में बाधा नहीं बन सका। 

लोहिया ने सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में ओलंपिक तैराकी NSW-2017 स्टेट ओपन चैम्पियनशिप में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता। 2019 में उन्होंने 11.34 घंटे के एशियाई रिकॉर्ड समय में भारतीय पैरा तैराकी रिले टीम के साथ कैलिफोर्निया में 42 किमी कैटलीना चैनल (रात के अंधेरे में) में तैरकर इतिहास रचा।

पैरालंपिक में तैराकी करते सतेंद्र सिंह लोहिया

लोहिया 28 पदक विजेता (इनमें से 23 स्वर्ण) चैंपियन ओलंपिक तैराक माइकल फेल्प्स के बड़े प्रशंसक हैं। लोहिया YouTube जैसे अन्य प्लेटफार्मों के माध्यम से भारत में पैरा-एथलीटों को प्रशिक्षित और प्रेरित करने की मंशा रखते हैं।

लोहिया ने मिड-डे को बताया कि “मैं भविष्य में एक स्पोर्ट्स अकादमी खोलने की योजना बना रहा हूं। इसके साथ ही एक YouTube चैनल शुरू कर और प्रेरक उद्बोधनों के माध्यम से दूसरे पैरा-एथलीटों को प्रेरित कर उन्हें लक्ष्य हासिल करने के लिए उचित मार्गदर्शन देने की योजना भी है। उन्होंने कहा कि इस तरह उन्नत तकनीक की मदद से उनके सपनों को पूरा करने में मदद कर सकता हूं।

तैराकी ने उनकी भावनाओं को काफी मजबूती दी है। भले ही उन्हें अपने गांव में पेशेवर प्रशिक्षण नहीं मिला हो, लेकिन उन्होंने केवल मस्ती के साथ तैरने और शरीर को फिट रखने पर ही ध्यान दिया।

लोहिया कहते हैं कि " मैं मध्यप्रदेश में भिंड जिले के गाटा में एक छोटे से गांव में पैदा हुआ। जन्म के 2-3 महीने बाद डायरिया के कारण शरीर कमजोर हो गया, लेकिन उस समय इससे कोई गंभीर समस्या नहीं थी। सालों बाद किशोरावस्था में इस बीमारी ने मुझे फिर परेशान किया।” 

उन्होंने कहा कि " स्कूल के दिनों में मैंने गांव के पास बहने वाली एक नदी में तैराकी सीखना शुरू किया। हालांकि इसे पेशेवर तैराकी नहीं कहा जा सकता। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि पैरा-तैराकी जैसा भी कुछ होता है क्या। शुरुआती वर्षों में प्रोफेसर वीके डबास ने लोहिया का परीक्षण किया और उन्हें पैरा-तैराक बनाने में मदद की। 

लोहिया ने बताया कि "जब मैं वीके डबास सर से मिला, तो वो मेरे तैराकी कौशल का परीक्षण करना चाहते थे। जिसे देखने के बाद वे काफी प्रभावित हुए। मैंने उनके साथ कुछ समय के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया, लेकिन 2007 में परिवार के सामने एक आर्थिक परेशानी आने के कारण मैंने स्कूल जाना बंद कर दिया। 

"2008 में मैंने ग्वालियर में पैरा-तैराकी प्रतियोगिता में भाग लिया और 2009 में मुझे कोलकाता ले जाया गया, जहां मैंने कांस्य पदक जीता। धीरे-धीरे मैंने अपनी सोच को सकारात्मक किया और समस्या की बजाय उसके समाधान पर ध्यान केंद्रित किया।" 

इसके बाद उन्होंने कैलीफोर्निया चैनल (2019) और अंग्रेजी चैनल (2018) में कैटलीना चैनल को सफलतापूर्वक पार कर इतिहास रचा। उन्होंने राष्ट्रीय पैरालंपिक तैराकी चैंपियनशिप में चार स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पदक जीते। 

लोहिया की इस सफलता के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे मुलाकात की और उन्हें बेहतरीन पैरा-तैराक बताते हुए इसे दूसरों के लिए प्रेरणादायक बताया। 

सतेंद्र लोहिया को 2019 में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने 70 वें गणतंत्र दिवस के दौरान "विकलांगता के साथ सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी" के पुरस्कार से सम्मानित किया।  लोहिया की कहानी देशभर के पैरा-एथलीटों के लिए प्रेरणादायक है। यह संदेश देती है कि कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास से हर चुनौती पर विजय प्राप्त की जा सकती है।