अभिनव बिंद्रा ने ओलंपिक गोल्ड जीतने से पहले नींद न आने वाली रात को किया याद

अपने बीजिंग 2008 के अनुभव को याद करते हुए ओलंपिक चैंपियन शूटर ने कहा कि बड़े टूर्नामेंट का दबाव बहुत ज़्यादा होता है।

2008 में बीजिंग ओलंपिक खेलों में अपना ऐतिहासिक ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतने के दिन अभिनव बिंद्रा (Abhinav Bindra) एकाग्रता और आत्मविश्वास की एक अद्भुत तस्वीर बनकर उभरे। लेकिन उससे कुछ घंटों पहले की बात बहुत अलग थी।

शूटर अभिनव बिंद्रा ने भारत के 62वें स्वतंत्रता दिवस से चार दिन पहले 11 अगस्त, 2008 को चीन के बीजिंग में 10 मीटर एयर राइफल प्रतियोगिता जीतकर ओलंपिक में भारत को पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक दिलाया था। उसके बाद से भारत ने अभी तक व्यक्तिगत स्वर्ण पदक नहीं जीता है। 

बिंद्रा के इस कारनामे ने भारत के ओलंपिक इतिहास में एक स्वर्णिम युग की शुरुआत करने के काम किया, लेकिन शीर्ष भारतीय निशानेबाज़ के लिए इस सफलता से पहले की रात चिंताओं और घबराहट से भरी हुई थी।

अभिनव बिंद्रा ने टेबल टेनिस खिलाड़ी मुदित दानी (Mudit Dani) के साथ एक इंस्टाग्राम लाइव सेशन के दौरान उन पलों को याद करते हुए कहा, "मुझे नहीं लगता कि आप उस दबाव के लिए तैयार हो सकते हैं। इससे पहले की रात काफी डरावनी थी। कई चिंताओं से भरी हुई थी। मुझे लगता है कि मैं मुश्किल से ही सो पाया था।”

उन्होंने आगे कहा, "आप खेल में सीखते हैं कि दबाव का सामना कैसे करें और आप इससे दूरी नहीं बना सकते हैं।"

हज़ारों घंटों के समर्पित प्रशिक्षण ने उन्हें तकनीकी मोर्चे पर पदक के लिए तैयार किया था, किसी भी सामान्य अभ्यास ने नहीं। अभिनव बिंद्रा ने कहा कि उस रात महसूस हुए दबाव को के लिए खुद को ऐसे ही तैयार नहीं किया जा सकता था।

भारतीय निशानेबाज़ ने तर्क देते हुए कहा, “यह समझना महत्वपूर्ण है कि प्रशिक्षण का वातावरण और प्रतिस्पर्धा का वातावरण दो अलग-अलग दुनिया हैं। वे कभी एक समान नहीं होंगे। आप कभी भी इन भावनाओं को फिर से नहीं महसूस कर सकते हैं।”

स्वीकृति, तैयारी और प्रक्रिया

अभिनव बिंद्रा ने इस जद्दोजहद की स्थिति को खुद ही संभाला।

उन्होंने अपनी सफलता के मंत्र को समझाते हुए कहा, “दबाव वाली स्थिति को स्वीकार कीजिए और इसे खुद में ही समाने की कोशिश करिए। यह जरूरी नहीं है कि वह आपको पसंद ही आएगा। यदि आप स्वीकार करना सीख जाते हैं, तो आप इसके साथ काम करना भी सीख लेते हैं। यही सबसे महत्वपूर्ण बात है।”

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Medals Display at the Olympic Museum

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उन्होंने आगे कहा, "जिस समय आपका मन इसे स्वीकार कर लेता है, यह इसके साथ काम करने का कोई न कोई रास्ता भी खोज लेगा। यह विरोध करने के बजाय, दबाव के साथ काम करने का एक तरीका खोजने के बारे में है।"

उन्होंने लचीलापन के होने की आवश्यकता पर भी जोर दिया और सबसे अजीब चीज़ों के लिए मानसिक तौर पर पूरी तरह से तैयार रहने के लिए कहा।

"आपको वास्तव में एक बुरे दिन में सबसे अच्छा काम करने की जरूरत होती है, क्योंकि कुछ भी ऐसा हो सकता है जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। खेल में भाग्य का भी एक बहुत बड़ा महत्व होता है, जिसे आपको अपने लिए इस्तेमाल करना होता है।”

अंत में वह किसी भी परिणाम का इंतज़ार करने की बजाय उसकी प्रक्रिया पर जोर देने की बात करते हैं।

उन्होंने कहा, “ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक का पीछा करने की कोशिश कर रहे एक युवा व्यक्ति के रूप में, मैं इस बात से बहुत खुश होता था कि मैं ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतूंगा। यह सबसे खराब मानसिकता है, जो किसी के भी पास आसानी से आ सकती है। प्रक्रिया पर ध्यान देते हुए खुश रहना बहुत महत्वपूर्ण है। जब आप छोटे लक्ष्य निर्धारित करके भी खुश हो सकते हैं।”

“उस सफर का भी आनंद लीजिए। जरूरी नहीं कि हमेशा पूरी तरह से ध्यान केंद्रित किया जाए और परिणाम के पीछे भागा जाए। इसकी प्रक्रिया का भी आनंद लीजिए।”

अपने इन्हीं सिद्धांतों और राइफल के साथ अभिनव बिंद्रा ने बीजिंग के शूटिंग रेंज हॉल में कदम रखा था और उस दिन को हमेशा के लिए इतिहास बना दिया था।

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