भारतीय फुटबॉल की विरासत को बचाए रखेगा ATK मोहन बगान 

भारतीय फुटबॉल के दिग्गज भाईचुंग भूटिया ने ATK में मोहन बागान के विलय के बाद प्रतिष्ठित जर्सी रंग को नहीं बदलने के कदम की सराहना की।

आज के समय में जब भारतीय फ़ुटबॉलिंग इको सिस्टम तेजी से कार्पोरेटाइजेशन के दौर से गुज़र रहा है, ऐसे समय में 131 साल पुरानी विरासत को अपने साथ जोड़कर रखना बहुत बड़ी बात है।

मोहन बागान की प्रतिष्ठित लाल और मैरून रंग की धारियां आने वाले कई वर्षों तक भारतीय फुटबॉल में दिखती रहेंगी, इसकी पुष्टि शुक्रवार को की गई।

आपको बता दें कि भारतीय फुटबॉल के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण है। 2019-20 आई-लीग चैंपियन मोहन बागान और इंडियन सुपर लीग की चैंपियन ATK का विलय हो गया। ये एक ऐतिहासिक कदम था। अब इस नई टीम का नाम ATK मोहन बागान हो गया है।

इस बात कि घोषणा पिछले साल की गई थी, हालांकि फुटबॉल से संबंधित विवरण, जिसमें नए क्लब का आधिकारिक नाम, जर्सी रंग और प्रतीक अब तक जारी नहीं किए गए थे।

इस घोषणा में ये भी पता चल गया कि मोहन बागान का प्रतिष्ठित ‘सेल बोट’ लोगो को नहीं बदला जाएगा। इसमें केवल ATK को ही शामिल किया गया है। बागान के प्रशंसक इस टीम को मरीनर्स कहते हैं।

लेकिन भारतीय फुटबॉल के समर्थकों के लिए शायद सबसे बड़ी खबर यह थी कि सदी के पुराने क्लब और देश के फुटबॉल इतिहास में एक विशेष स्थान रखने वाला क्लब मोहन बागान के प्रतिष्ठित हरे और मैरून रंगों को बरकरार रखा जाएगा।

एटीके मोहन बागान में 80 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले एटीके मालिकों से उम्मीद थी कि वो मोहन बागान के हरे और मैरून रंग को आईएसएल के छठे सीज़न में लाल और सफेद रंगों से बदल देंगे।

भारतीय फुटबॉल की विरासत है हरा और मैरून

टीम के खेलों में, विशेष रूप से फुटबॉल में रंग बहुत ज्यादा महत्व रखते हैं।

जैसे मैनचेस्टर यूनाइटेड या लिवरपूल के लाल, रियल मैड्रिड के सफेद, बार्सिलोना के मैरून और नीला, जुवेंटस के काले और सफेद रंग दूसरों के बीच अपने क्लबों की अलग ही पहचान बनाए रखते हैं। इन क्लबों ने अपने देश में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर फुटबॉल में पहचान बनाई है। मोहन बागान का हरा और मैरून रंग भी भारतीय फुटबॉल में उसी प्रकार का दर्जा रखता है।

1889 में स्थापित होने वाले इस क्लब ने 1911 में ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट पर आइएफए शील्ड के फाइनल में न सिर्फ पहली बार जीत हासिल की, बल्कि ऑल इंडिया टीम ने एक ब्रिटिश टीम को हराकर एक फुटबॉल ट्रॉफी जीती। इसे आज़ादी के लिए भारत की शुरुआत भी मानी जाती है।

इसके अलावा, कोलकाता प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ उनकी प्रतिद्वंद्विता - लाल और सुनहरे रंगो वाली ईस्ट बंगाल के खिलाफ हरे और मैरून की लड़ाई न केवल भारत बल्कि विश्व फुटबॉल में भी काफी प्रसिद्ध थी।

मोहन बागान के हरे और मैरून रंग भारतीय फुटबॉल में प्रतिष्ठित स्थान रखते हैं (फोटो: AIFF)
मोहन बागान के हरे और मैरून रंग भारतीय फुटबॉल में प्रतिष्ठित स्थान रखते हैं (फोटो: AIFF)मोहन बागान के हरे और मैरून रंग भारतीय फुटबॉल में प्रतिष्ठित स्थान रखते हैं (फोटो: AIFF)

बंगाल में इन दो क्लबों से लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं - इस क्षेत्र को भारतीय फुटबॉल का मक्का माना जाता है। लोग इमारतों को इन रंगों से रंग देते हैं, यहां तक ​​कि टीम के रंगों में रंगी हुई चीजों को ज्यादा पसंद करते हैं।

कुछ फैंस तो कोलकाता के मैदान में, पूजा स्थानों और तीर्थस्थानों पर क्लब टेंट को लगाते हैं।

बाईचुंग भूटिया ने की इस कदम की सराहना

जबकि एटीके ने 2014 में अपना सफर शुरू किया और कुछ ही समय में खुद को कॉर्पोरेट-समर्थित इंडियन सुपर लीग में एक बड़े नाम के रूप में स्थापित किया, जिसने छह साल में तीन बार ट्रॉफी जीती।

जबकि दोनों टीमों का विलय भारतीय फुटबॉल के लिए एक ऐतिहासिक लम्हा था, मोहन बागान के इतिहास और विरासत को अपने रंगों के माध्यम से सुरक्षित रखना, भारतीय फुटबॉल की विरासत को संरक्षित रखना, एक आवश्यकता थी।

मोहन बागान के पूर्व खिलाड़ी और भारतीय फुटबॉल आइकन बाईचुंग भूटिया (Bhaichung Bhutia) ने पीटीआई को बताया, “पहचान के लिए मोहन बागान के रंगों को बरकरार रखना बहुत महत्वपूर्ण था। उन्होंने लोगो को भी बरकरार रखा है जो एक बहुत ही सराहनीय संकेत है।”

उन्होंने कहा, “ईस्ट बंगाल और मोहन बागान दो प्रतिष्ठित क्लब हैं और वे अपने रंगों के लिए जाने जाते हैं। कल्पना कीजिए कि अगर कल मैनचेस्टर यूनाइटेड पूरी तरह से लाल रंग निकाल दे, और उसका इस्तेमाल कभी न करें... रंग विरासत का हिस्सा हैं इसलिए ये बहुत अच्छा कदम है।”

बाईचुंग भूटिया की भावनाएं इस बात की गवाह है कि पूरे देश के फुटबॉल फैंस की भावनाएं किस तरह मोहन बागान से जुड़ी थीं।

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