बजरंग पूनिया: ताकत और उम्दा दांव-पेंच का दमदार पहलवान

मुश्किल भरे हालातों से लड़कर विश्व के नंबर एक पहलवान बने हैं बजरंग पूनिया।

लेखक अरसलान अहमर ·

'खेल से प्यार करो और खेल तुमसे प्यार करेगा।' भारतीय युवा पहलवान बजरंग पूनिया इस कहावत की उम्दा मिसाल पेश करते हैं। काफी कम समय में कुश्ती में एक ख़ास मुकाम हासिल कर लेने वाले पहलवान बजरंग पूनिया भारत के उन चुनिंदा एथलीटों में से एक हैं जिन पर टोक्यो ओलंपिक 2020 में सभी की निगाहें रहने वाली हैं। बजरंग ने कुश्ती के दांव-पेंच ओलंपिक ब्रॉन्ज़ मेडल विजेता और अपने गुरु योगेश्वर दत्त से सीखे हैं। ताकत और तकनीक के अद्भुत मिश्रण से लैस बजरंग के लिए बीते हुए कुछ वर्ष काफी शानदार रहे हैं।

अपने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड मेडल के साथ बजरंग पुनिया 

65 किलोग्राम वर्ग में विश्व के नंबर एक पहलवान बजरंग को 'द टैंक' के नाम से भी जाना जाता है। साल 2018 में कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल जीतने के बाद उन्होंने इस साल अप्रैल में हुई एशियन चैंपियनशिप में भी सोने का तमगा अपने नाम किया। इसके अलावा उन्होंने अली एलिएव टूर्नामेंट में भी गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा जमाया। बजरंग ने स्थानीय खिलाड़ी विक्टर रासाडिन को 13-8 से मात देकर सोने का तमगा हासिल किया। लगातार गोल्ड जीतकर उन्होंने इस बात को साबित कर दिया है कि वह कुश्ती के अखाड़े में बड़े से बड़े दिग्गज को धूल चटाने का माद्दा रखते हैं।  


भारतीय तिरंगे के साथ जश्न मनाते हुए बजरंग पुनिया

दृष्टिकोण में किया परिवर्तन

ताकत और स्टैमिना बजरंग के हथियार थे लेकिन कुश्ती के दंगल में उनकी सही तकनीक उन्हें दूसरों से अलग बनाती है। पिछले कई सालों से भारत में ऐसे बहुत से पहलवान रहे हैं जो रेसलिंग में अपनी ताकत और पैरों की फुर्ती पर निर्भर करते हैं लेकिन बजरंग के साथ ऐसा नहीं है। ताकत के साथ-साथ सही समय पर सही तकनीक लगाने की उनकी कला उनके विरोधियों को भारी पड़ जाती है। हालांकि पहले ऐसा नहीं था। विश्व के अव्वल दर्जे के पहलवानों के सामने सकारात्मक नतीजे नहीं मिल पाने की वजह से बजरंग को अपनी तकनीक में कुछ बदलाव की ज़रूरत महसूस हुई। यह वह समय था जब जॉर्जिया के पूर्व रेसलर और कोच शाको बेंटिनीडीस ने उनकी मदद के लिए अपना हाथ बढ़ाया। बेंटिनीडीस की निगरानी में बजरंग कुछ ऐसे दांव-पेंच से रूबरू हुए जिससे उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ा और इस तरह से उन्होंने अपनी अंदर छुपी हुई प्रतिभा को पहचाना। तकनीक के साथ-साथ बेंटिनीडीस ने बजरंग को मानसिक तौर पर मजबूत बनाने में भी अहम योगदान दिया। आपको बता दें बेंटिनीडीस अब बजरंग के निजी कोच है।

आसान नहीं थी राह

बजरंग के पिता बलवान पूनिया अपने समय के जाने-माने पहलवान थे। लेकिन गरीबी की वजह से उनका कुश्ती का सफर आगे नहीं बढ़ पाया। कुछ ऐसे ही हालात बजरंग के साथ भी हुए जब वह छोटे थे। पैसों की कमी के चलते बजरंग के पिता के पास अपने बेटे को घी खिलाने के पैसे नहीं होते थे। इसकी वजह से वह बस छोड़कर साइकिल से चलने लगे ताकि वह अपने बेटे के पौष्टिक आहार के लिए कुछ पैसे बचा सकें। इन हालात के बावजूद बजरंग ने कभी हार नहीं मानी और लगातार अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहे।

यूपी की मिट्टी में खेलकर पहलवान बने बजरंग

वैसे तो बजरंग हरियाणा के रहने वाले हैं लेकिन उन्होंने कुश्ती की ट्रेनिंग उत्तर-प्रदेश के गोंडा ज़िले में स्थित नंदिनी नगर कुश्ती अकादमी से ली। यही से शुरू हुआ उनका कुश्ती का वह सफर जिसने उन्हें एक आम इंसान से चैंपियन बनाया। गोंडा में कुश्ती के शुरूआती दांव-पेंच सीखने के बाद बजरंग ने दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में कुश्ती के गुर सीखे। इसमें कोई शक नहीं कि बजरंग ने रेसलिंग की दुनिया में आज अपना एक ख़ास मुकाम बना लिया है। जीत और गोल्ड हासिल करने की उनकी यह भूख उन्हें दूसरों से जुदा करती है। यक़ीनन यह वह धुरंधर पहलवान है जिसपर टोक्यो 2020 में सभी की निगाहें टिकीं होंगी।