असहनीय दर्द के साथ 1994 की वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतना जसपाल राणा को हमेशा रहेगा याद  

अर्जुन अवार्डी ने खुलासा किया कि दर्द इतना था कि वह अपनी पेंट भी नहीं उतार सकते थे और और प्रतियोगिता के एक दिन पहले सर्जरी करवाने की भी सलाह दी गई थी    

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

भारतीय शूटिंग पारिस्थितिकी तंत्र पूर्व स्टार निशानेबाजों सहित अभिनव बिंद्रा, जॉयदीप करमाकर और गगन नारंग जैसे निशानेबाजों का अगली पीढ़ी के निशानेबाजों पर ध्यान केंद्रित करने में लगातार फायदा उठा रहा है।  

दिग्गज निशानेबाज कोच जसपाल राणा भी इनसे अलग नहीं हैं। शूटर के रूप में अपने करियर में उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद राणा अब भारत के कुछ चमकती प्रतिभाओं के लिए कोच और सह मार्गदर्शक के रूप में काम कर रहे हैं।

कई एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता ने टोक्यो के लिए कोटा हासिल कर चुके मनु भाकर और सौरभ चैधरी को विश्व स्तरीय निशानेबाजों के रूप में तैयार किया है। वह देहरादून में जसपाल राणा इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी में भी कोच हैं। जसपाल को 2020 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से नवाजा गया।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) में अधिकारी रहे उनके पिता नारायण सिंह राणा ने ही जसपाल का परिचय इस खेल से कराया। पहले कोच के रूप में उन्होंने ही जसपाल को 10 साल की उम्र में पिस्तौल और राइफलों की बारीकियों से अवगत कराया।

जसपाल ने कई अन्य निशानेबाजों की तरह दोनों हथियारों के साथ शूटिंग शुरू की, लेकिन बाद में पिस्तौल शूटिंग में अच्छा प्रदर्शन करने के कारण उन्होंने इसी का चयन किया।  

जसपाल राणा ने ओलंपिक चैनल को बताया, "मैंने 10 साल की उम्र में शूटिंग शुरू की और 11-12 साल की उम्र में राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू कर दिया था। मेरे पिता भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (SPG) में सेवारत थे। उन्होंने ही मुझे हथियारों और शूटिंग खेल के बारे में पहली बार बताया। मैं पिस्तौल और राइफल दोनों से समान रूप से शूटिंग करता था, लेकिन महासंघ ने नियम बनाया कि एक व्यक्ति राइफल या पिस्टल में से किसी एक ही प्रतिस्पर्धा में ही भाग ले सकता है। पिस्टल स्पर्धाओं में बेहतर परिणाम मिलने के कारण मेरे पास इसे चुनने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।" 

खेल के रूप में शूटिंग का चुनाव करने के दो साल बाद 12 साल की उम्र में जसपाल ने 1988 में अहमदाबाद में आयोजित 31वीं राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप में राष्ट्रीय स्तर पर पदार्पण करते हुए एक रजत पदक के साथ घर वापसी की।

उनकी रैंक में लगातार वृद्धि होती रही। शानदार शूटिंग करियर में उन्होंने काफी उतार-चढ़ाव भी देखे, लेकिन मिलान में 1994 की विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक (जूनियर वर्ग) जीतना, हमेशा उनके दिल के करीब रहेगा।

अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित ने खुलासा किया कि वह दर्द से जूझ रहे थे और विश्व चैंपियनशिप से एक दिन पहले सर्जरी करनी थी। वो किसी भी हालत में इस इवेंट में भाग लेना चाहते थे। बिना दर्द निवारक दवाएं लिये प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हुए उल्लेखनीय परिणाम हासिल किया। उन्होंने जूनियर वर्ग की 25 मीटर स्टैंडर्ड पिस्टल स्पर्धा में विश्व रिकॉर्ड स्कोर के साथ अपना पहला अंतरराष्ट्रीय पदक जीता था।

जसपाल राणा ने मनु भाकर सहित कई युवा प्रतिभाओं को तैयार किया है।

राणा उस मुश्किल वक्त को याद करते हुए कहते हैं, "एक निशानेबाज के रूप में सभी उपलब्धियां मेरे लिए यादगार हैं, क्योंकि ये यादें करीब 16 साल के करियर में हार-जीत और बहुत उतार-चढ़ाव से भरी हैं, लेकिन 1994 मिलान विश्व चैंपियनशिप में विश्व रिकॉर्ड (विशेष) के साथ स्वर्ण जीतना मेरे लिये सबसे यादगार है, क्योंकि घुटने में फोडा हो जाने के कारण मैं इस प्रतियोगिता के एक दिन पहले रात को अस्पताल में भर्ती था। डॉक्टरों ने मुझे डिस्चार्ज करने से मना कर दिया। मैं प्रतियोगिता में भाग लेना चाहता था। इसलिए मेरे कोचसनी थॉमस ने वहां से चलने का फैसला किया। हमने अगले दिन वापस आकर सर्जरी कराई।"

हालांकि, यह राणा और उनके कोच की योजना के हिसाब से नहीं हुआ। क्योंकि उनका फोड़ा फट गया और दर्द असहनीय हो गया। ऐसी हालत हो गई कि वह घुटने के ऊपर से अपनी जीन्स पेंट को भी नहीं हटा पा रहा था।

राणा ने कहा, "हम अस्पताल से तो भाग आये, लेकिन उस रात को ही फोड़ा फूट गया और मुझे असहनीय दर्द से गुजरना पड़ा था। मैं पूरी रात सो नहीं पाया, लेकिन डोप नियमों के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं होने के कारण मैंने कोई भी दर्द निवारक दवा नहीं ली। मैं अपनी जिंस पेंट भी नहीं उतार पा रहा था। इस कारण अगले दिन प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए पेंट को काटकर शाॅर्ट्स बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा।"

बिना कोई दर्द निवारक दवा लिये जसपाल ने अपनी प्रतिस्पर्धा में विश्व रिकॉर्ड स्कोर कायम करते हुए प्रतियोगिता जीतने में कामयाबी हासिल की। यह असाधारण से कम नहीं था।

उन्होंने कहा, "मैं सिर्फ प्रतियोगिता खत्म करना चाहता था और डॉक्टरों के पास कुछ दर्द निवारक दवाइयां लेने गया और शूटिंग के बाद मैंने यह सही किया। बाद में मेरे कोच ने आकर मुझे बताया कि मैंने स्वर्ण पदक जीता है। कुछ समय बाद वो फिर से लौटकर आये और बताया कि उसने प्रतियोगिता जीतने के साथ जूनियर विश्व रिकॉर्ड भी बनाया है। इसके बाद मुझे दर्द का अहसास ही नहीं रहा। अपने देश का झंडा दूसरे देशों से उपर देखना और स्वर्ण पदक के साथ स्वदेश लौटना अद्भुत अहसास था।"

18 साल की उम्र में उन्होंने हिरोशिमा में 1994 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता और इसी वर्ष उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

जसपाल भारत के सबसे प्रसिद्ध निशानेबाजों में से एक बनने की ओर अग्रसर थे। तो उनके साथ यह खेल भी देश में धीरे-धीरे लोकप्रियता की ओर बढ़ रहा था। एशियाई खेलों में उन्होंने अभूतपूर्व सफलता हासिल की। दोहा में हुए 2006 के आयोजन में उन्होंने आठ पदक जीते, जिनमें तीन स्वर्ण और एक रजत था।

उन्होंने 1994 में जूनियर विश्व चैंपियनशिप स्वर्ण पदक के अलावा दो एशियाई शूटिंग चैम्पियनशिप पदक भी जीते हैं।