जानिए क्यों दीपा कर्माकर ने ‘वॉल्ट ऑफ डेथ’ प्रोडुनोवा को चुना

लिंग असमानता ने दीपा कर्माकर को आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक में सबसे कठिन रूटीन में से एक को करने के लिए प्रेरित किया था।

लेखक रितेश जायसवाल ·

दीपा कर्माकर (Dipa Karmakar) के लिए प्रोडुनोवा जिम्नास्टिक की मैट पर महज़ उनका ख़ास मूव नहीं था। भारत में महिला जिमनास्ट के लिए समान अवसर मिलने के लिए यह उनका एक मज़बूत स्टैंड था।

दीपा कर्माकर दुनिया की उन पांच महिला जिमनास्टों में से एक हैं, जिन्होंने सबसे मुश्किल प्रोडुनोवा वॉल्ट मूव को सफलतापूर्वक किया है, जिसने उन्हें कई प्रतियोगिताओं में पोडियम तक पहुंचाया और 2016 के रियो ओलंपिक में इसी की वजह से वह ऐतिहासिक चौथे स्थान पर रहीं।

हालांकि, त्रिपुरा में जन्मी जिम्नास्ट ने पदक जीतने के लिए अभी तक जिम्नास्टिक में सबसे प्रसिद्ध और मुश्किल मूव को करने में महारत हासिल करना नहीं शुरू किया है।

दीपा कर्माकर ने ओलंपिक चैनल के साथ बातचीत में याद करते हुए कहा, ”जब मैं अपनी शुरुआत कर रही थी, तब आशीष कुमार ने 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में जिमनास्टिक में एक रजत पदक जीता था। हालांकि, महिलाओं के लिए स्थिति बहुत अलग थी।”

उन्होंने आगे बताया, “उस समय यह धारणा थी महिला जिमनास्ट भोजन और छुट्टी के लिए शिविरों में आती हैं। सभी सुविधाएं सिर्फ लड़कों के लिए थीं। हमें उपकरणों का उपयोग करने से पहले अपनी बारी का इंतजार करना होता था।”

2014 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान के एक विदेशी कोच को याद दीपा याद करती हैं, जो महिला जिमनास्ट को लाइन-अप करते हुए यह कहता है कि ‘केवल लड़कों के पास ही पदक जीतने का कोई मौका था।’

कर्माकर ने कहा, “इससे मुझे बहुत दुख हुआ। यहां तक कि मेरे कोच बिशेश्वर नंदी को भी आंसू आ गए। मैंने खुद को अल महसूस किया और सोचा कि ‘महिलाएं क्यों नहीं कर सकती हैं? तभी नंदी सर और मैंने प्रोडुनोवा पर काम करने का विचार किया। यह मुश्किल था, लेकिन मैं 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने और लोगों को गलत साबित करने के लिए दृढ़ थी।”

दीपा कर्माकर ने ग्लासगो में सूजे हुए पैर के साथ कांस्य पदक जीता था।

दीपा कर्माकर 2014 में कॉमनवेल्थ गेम्स में जिम्नास्टिक मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।

27 वर्षीय ने कहा, “उस वक्त बाकी महिलाओं का समर्थन अविश्वसनीय था। अगर मैं उस दिन पदक जीतने में नाकाम हो जाती तो भारत में महिलाओं की आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक शायद खत्म हो जाती।”

राष्ट्रमंडल खेलों का कांस्य पदक उनके शानदार करियर की शुरुआत थी। तब से दीपा एक असाधारण दल का हिस्सा रही हैं, जिसमें साइना नेहवाल, पीवी सिंधु, साक्षी मलिक, एमसी मैरी कॉम, फोगाट बहनें और कई अन्य महिला एथलीट शामिल हैं। इन्होंने भारतीय महिला एथलीटों को बढ़ावा देने का काम किया।

दीपा कर्माकर खुद भी मानती हैं कि बदलाव की हवा तेज़ हो गई है।

उन्होंने कहा, “आज के समय में अगर कोई महिला सफलता हासिल करती है, तो पूरा देश बहुत अधिक उत्साहित होता है और सम्मान देता है। अतीत की बात करें तो महिलाएं हमेशा इस पृष्ठभूमि से दूर रही हैं। इसलिए, उन्हें जो भी सफलता मिलती है, वह बाधाओं से पार पाने की कहानी होती है। अब निश्चित रूप से यह साबित हो चुका है कि महिलाएं भी पुरुषों के बराबर ही उपलब्धि हासिल कर सकती हैं।”

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