भारतीय हॉकी के प्रसार से दूर इलाके से जूनियर नेशनल कैंप तक कैसे पहुंचे मारेश्वरन सक्थिवेल?

इस उभरते हुए युवा खिलाड़ी ने पिता की हॉकी में रुचि के कारण चुना था यह खेल

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

मारेश्वरन सक्थिवेल (Mareeswaran Sakthivel) वर्तमान में भारतीय हॉकी के तेजी से उभरते जूनियर सितारों में से एक है। आपको जानकर हैरानी होगी कि कि सक्थिवेल के हॉकी में सपनों को ऊंची उड़ान भारतीय हॉकी के दिग्गजों के टेलीविजन पर दिखाई देने वाले बेहतरीन प्रदर्शन से नहीं मिली थी, बल्कि उनके अंदर हॉकी के सपनों का बीज तमिलनाडु की औद्योगिक नगरी कोविलपट्टी में रोपा गया था। यह गांव राजधानी चेन्नई से करीब 567 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और यह भारतीय हॉकी के शक्ति केंद्र से लाखों मील दूर प्रतीत होता है।

20 वर्षीय ने इस खेल को सिर्फ इसलिए चुना क्योंकि उनके पिता भी एक बार इस खेल में रह चुके थे।

भारतीय पुरुषों के 37-सदस्यीय कोर समूह का हिस्सा मारेश्वरन ने कहा, "मैंने 12 साल की उम्र में हॉकी खेलना शुरू किया था। खेल की सबसे पुरानी यादें मेरे पिता के इर्द-गिर्द घूमती थीं। भले ही वो नहीं खेल सकता थे, फिर भी स्टैंड से खेल देखते थे, चाहे वह राज्य या जिला स्तरीय प्रतियोगिता ही क्यो न हो। हालांकि, तमिलनाडु में हॉकी एक लोकप्रिय खेल नहीं है, लेकिन मेरे शहर में यह काफी लोकप्रिय है।"

उनके पिता की इस खेल में रुचि थी, लेकिन आर्थिक परेशानी के कारण वो इसमें आगे नहीं जा सके। मारेश्वरन के माता-पिता एक माचिस की फैक्टरी में काम करते हैं। यहां उनके पिता एक मशीन ऑपरेटर हैं। बड़े होने पर उसके पास हॉकी स्टिक या जूते खरीदने तक की व्यवस्था नहीं थी। टीवी स्क्रीन पर हॉकी में भारत के कारनामों को देखने के लिए घर पर टेलीविजन भी नहीं था।

मिडफील्डर ने कहा, "घर के आर्थिक हालात ठीक नहीं थे। ईमानदार से कहूं तो यह अभी भी ऐसे ही हैं। मैं पांच साल पहले SDAT के (स्पोर्ट्स डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ़ तमिलनाडु) स्पोर्ट्स हॉस्टल में चला गया और उन्होंने मुझे जूते और हॉकी स्टिक खरीदने में मदद की। पहले मेरे माता-पिता को मेरे खर्चों के लिए लोगों से ऋण लेना पड़ता था।"उन्होंने आगे कहा, "हमारे घर टेलीविजन नहीं था। हम यह खरीद नहीं सकते। बचपन में हॉकी ही मेरी एकमात्र पसंद थी। मैं पिताजी के साथ कोविलपट्टी में राज्य या जिला स्तरीय मैच देखने जाता था। स्पोर्ट्स हॉस्टल में जाने के बाद ही मैंने टीवी पर मैच देखना शुरू किया। यहीं पर मैंने पहली बार टेलीविजन पर गेम देखे और समझा कि भारत के लिए खेलने के लिए क्या करना होगा।"

स्कूल में मारेश्वरन ने एथलेटिक्स में भी हाथ अजमाया, लेकिन हॉकी से उसने सबसे ज्यादा जुड़ाव महसूस किया। उनके पिता ने भी उन्हें पूर्णकालिक रूप से हॉकी को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन उनकी मां चाहती थी कि वो आजमाने के बाद ही अकादमिक राह चुने।

उन्होंने कहा, "शुरुआत में स्कूल में हॉकी को महज मजे के लिए खेलता था। समय के साथ मैं बेहतर होता गया। SDAT की छत्रछायां में पहुंचने के बाद मैं हॉकी को लेकर गंभीर हो गया।"

पिछले कुछ वर्षों के लम्बे कड़े परिश्रम के बाद मारेश्वरन पिछले सीज़न में सफलता मिली, जब उन्हें तमिलनाडु सीनियर टीम के लिए चुना गया था। उन्होंने खेलो इंडिया यूथ गेम्स गुवाहाटी 2020 में राज्य का प्रतिनिधित्व किया था।

हालांकि, उनकी टीम नॉकआउट में बाहर हो गई, लेकिन खेले इंडिया यूथ गेम्स में मारेश्वरन का प्रदर्शन जूनियर राष्ट्रीय शिविर में बुलावे के लिए पर्याप्त था।राष्ट्रीय सेटअप में पहला कदम रखने के बाद यहां रुके रहने के लिए 20 वर्षीय दृढ़ संकल्पित हैं।

उन्होंने कहा, "मैं अभी 20 साल का हूं। फिलहाल मैंने केवल शिविर और आगामी महीनों पर ध्यान केंद्रित किया। हमारे पास जूनियर पुरुष एशिया कप (जुलाई, 2021) और FIH जूनियर विश्व कप (इस साल में बाद में) है। मैं उपलब्ध अवसरों का सबसे अच्छी तरह से उपयोग करना चाहता हूं ताकि धीरे-धीरे वरिष्ठ टीम की तरफ कदम बढ़ा सकूं। उम्मीद है, जल्द ही ऐसा होगा।