'मैं ओलंपिक स्वर्ण पदक हासिल करने के लिए पूरी तरह तैयार हूं'- विकास कृष्ण यादव  

संभवत: अपने आखिरी ओलंपिक में जीत हासिल करने के लिए इस बॉक्सर ने पिछले डेढ़ साल में अपनी जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है।  

लेखक दिनेश चंद शर्मा ·

भारतीय मुक्केबाज विकास कृष्ण यादव (Vikas Krishan Yadav) हमेशा से एक आत्मविश्वास से लबरेज व्यक्ति रहे हैं। अब बेहतर स्थिति में हैं और मानते हैं कि वो हर चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। 

पिछले डेढ़ साल से यादव खुद को तलाशने और सुधार करने की दिशा में काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने खेल की बुनियाद को बदलने के लिए अपनी जीवनशैली को भी बदल दिया है। तीसरी बार क्वालीफाई करने के बाद कृष्णन अपने आप को सुधारने का हर मौका दे रहे हैं। संभवतः इस जुलाई में टोक्यो में उनका आखिरी ओलंपिक खेल हो सकता है। 

ओलंपिक चैनल के साथ एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने दावा किया, "मुझे यकीन है कि मैं ओलंपिक में स्वर्ण जीत सकता हूं। लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं उस ओलंपिक स्वर्ण पदक को पाने के लिए सबसे अच्छी तरह से तैयार रहूं।" 

लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय यादव ने इस बार प्रक्रिया पर गहन रूप से ध्यान केंद्रित किया है। यह एक हार या एक उत्साहपूर्ण जीत के साथ शुरू नहीं हुआ, बल्कि NIS पटियाला में रूममेट के साथ एक संयोग से हुई चैट के बाद शुरु हुआ। 

29 वर्षीय कहते हैं, "शुरुआत में मैं बहुत अनुशासनहीन था। न कभी समय पर खाना खाता और न कभी समय पर सोता था। प्रशिक्षण का भी कोई समय निर्धारित नहीं था। मैं कोई भी काम समय पर नहीं करता था।" 

"जब मैंने 2019 में ओलंपिक शिविर में प्रवेश किया, तब मैं एक पहलवान के साथ रह रहा था। उन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया। उन्होंने मुझे बताया कि कैसे एक कुश्ती विश्व चैंपियन अपने दिन की रूपरेखा तैयार करता है। वो प्रशिक्षण से एक घंटा या 90 मिनट पहले उठ जाता था। फिर वो योग करता है। प्रशिक्षण के लिए भी वह 30 मिनट पहले चला जाता था। इसलिए मैंने भी उसका अनुसरण करना शुरू कर दिया।"

ये छोटी—छोटी आपको नियंत्रित करने वाली बातें हैं, लेकिन समय के साथ ये जुड़कर बढ़ी हो जाती हैं। यादव ने यह भी कहा कि उन्होंने एक साल से ज्यादा समय से पिज्जा नहीं खाया। 

वो कहते हैं, "सीमा के भीतर रहते हुए हर कोई जंक फूड का आनंद लेता है। हर कोई किसी न किसी एक दिन बेईमानी कर ही जाता है। कुछ लोगों को सप्ताह में एक बार मौका मिलता है तो दूसरों को महीने में एक बार। लेकिन, 18 महीने से ज्यादा हो गए मैंने पिज्जा या किसी भी तरह का जंक फूड नहीं खाया है।" 

उन्होंने कहा, "मैं बाहर का खाना नहीं खाता। मेरे घर से ही गेहूं आता है, इसलिए मुझे सबसे अच्छी गुणवत्ता का आटा मिलता है। आहार, पोषण, रिकवरी के लिए जो आवश्यक था मैं उपलब्धता के आधार पर उसमें छोटे बदलाव कर सकता था। रिकवरी के लिए मेरे पास थेरगुन है। मेरे पास दुनिया में सबसे अच्छी क्वालिटी के दस्ताने हैं, जो भारत में किसी के पास नहीं हैं।" 

मार्च, 2020 में यादव ने एशिया और ओशिनिया मुक्केबाजी ओलंपिक क्वालीफिकेशन टूर्नामेंट में रजत पदक (69 किग्रा वर्ग) हासिल किया। विजेंदर सिंह (Vijender Singh) के बाद तीन ओलंपिक गेम्स के लिए क्वालीफाई करने वाले भारत के दूसरे मुक्केबाज बनने का जश्न मनाने के बजाय हरियाणा के बॉक्सर ने अपने कोचों के साथ बैठकर उनसे अपने खेल की कमियों के बारे में पूछा।

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यादव याद करते हुए कहते हैं, "मैंने उनसे गलतियों के बारे में बताने को कहा। उनसे पूछा कि वे कौन सी बातें हैं, जो मुझे ओलंपिक स्वर्ण पदक हासिल करने से रोक रही हैं।"

भारत के मुख्य पुरुष मुक्केबाजी कोच सीए कुट्टप्पा (CA Kuttappa), भारतीय मुक्केबाजी के उच्च प्रदर्शन निदेशक सैंटियागो नीवा (Santiago Nieva) और अमेरिका के उनके निजी कोच रोलैंड सिम्स (Roland Simms) ने उनको सभी त्रुटियों की पहचान करने में मदद की। इसके बाद उन्होंने पंच मारते समय अपने घुटने को सीधा रखने के लिए संतुलन बनाये रखने, डिफेंस और बैक-टू-द-बेसिक्स तकनीक पर काम करना शुरू कर दिया।

उन्होंने कहा, "मैं पिछले 20 सालों से उन तकनीकों पर काम कर रहा हूं। किसी ने मुझे नहीं बताया कि मैं इनमें गलती कर रहा था और न ही मैंने किसी से पूछने के बारे में सोचा था कि क्या यह सही है।"

"मैंने उस तकनीक से भी कड़ी टक्कर ली है। लेकिन, रोलैंड ने मुझसे कहा, ‘पेशेवर मुक्केबाजों को देखो, वे कैसे प्रहार करते हैं।’ पेशेवर हमसे बहुत बेहतर हैं। इसलिए मैंने अपनी तकनीक बदल दी।"

यह उतना आसान और तेज़ नहीं है जितना यादव इसे अच्छे से किया है। विशेषकर एथलीट के करियर में काफी देर हो चुकी है, जब 2016 में उनका खेल उन्हें रियो ओलंपिक खेलों के क्वार्टर फाइनल तक ले गया।

वो कहते हैं, "मैंने मुकाबले के दौरान और अभ्यास के दौरान लगातार इस पर काम किया है। जब भी आप ऐसे बदलाव करते हैं, तो शुरुआत में मुश्किल होती है। आपको फिर से स्थापित करना और ध्यान केंद्रित करना होगा। अंततः यह अब मुश्किल नहीं है। अब यह अपने आप हो जाता है। क्योंकि आप मांसपेशी की स्मृति का निर्माण कर लेते हैं।"

"अगर मैं पहले ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता के रूप में भारतीय मुक्केबाजी में संन्यास लेना चाहता हूं, तो मुझे उन असहज क्षणों से गुजरना होगा। मुझे वहां तक पहुंचने के लिए जो भी करना होगा, मैं करूंगा।"

नई तकनीक का परीक्षण करने का पहला मौका इस साल मार्च में कास्टेलॉन, स्पेन में आयोजित बॉक्सम इंटरनेशनल टूर्नामेंट में मिला था। लगभग एक साल बाद पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेलते हुए उन्होंने रजत पदक पर दावा करने से पहले क्वार्टर फाइनल में लंदन ओलंपिक खेलों के कांस्य पदक विजेता विकेंजो मंगियाकेरे (Vicenzo Mangiacapre) को हराया।

उन्होंने कहा, "यह टूर्नामेंट मेरे लिए एक परीक्षा थी। ओलंपिक क्वालीफिकेशन टूर्नामेंट के दौरान मैंने जो गलतियां कीं, मैंने उन पर 70-75% अंकुश लगा लिया। मैंने वही गलतियां नहीं दोहराईं। इसलिए बॉक्सम मेरे लिए सीखने का एक अच्छा अनुभव था।"

उन्होंने कहा, "मैं संतुलन बनाने पर भी काम कर रहा हूं। इस टूर्नामेंट में मैं एक—दो बार असंतुलित हो गया था। हालांकि, यह उतना नहीं था, जितना मैं आमतौर पर होता था। मैंने इस पर बहुत काम किया है और इसका फायदा भी मिल रहा है। ओलंपिक पदक विजेता को मात देना आसान बात नहीं है।"

प्रसिद्ध अमेरिकी बास्केटबॉल कोच बॉबी नाइट ने एक बार कहा था, ‘जीतने की कुंजी इच्छाशक्ति नहीं है... यह हर किसी के पास है। जीतने की तैयारी की इच्छाशक्ति महत्वपूर्ण है।’

यादव मानते हैं कि वो पिछले दो ओलंपिक की तुलना में इस बार बेहतर तरह से तैयारी कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, "यह वैसा ही है जैसे युद्ध में जाते समय आप चाकू, तलवार, राइफल और तोप सबकुछ लेकर उतरते हैं। आपको लगता है कि आप अजेय हैं। क्योंकि, आपके पास जरूरी सभी हथियार हैं। मैं ऐसा अनुभव करता हूं। मेरे रास्ते में आ रही किसी चीज से मैं नहीं डरता।"