भारतीय महिला खिलाड़ियों के स्वर्णिम युग की दिलचस्प दास्तां

ओलंपिक चैनल भारत की उन सभी बेहतरीन महिला खिलाड़ियों को लेकर उत्साहित है जिन्होंने बीते 10 वर्षों में भारत को गौरवांवित करने का काम किया है।

एक और दशक ख़त्म होने को है, ऐसे में यह जानना काफी दिलचस्प हो जाता है कि हमने बीते 10 वर्षों में क्या कुछ हासिल किया। इसलिए ओलंपिक चैनल भारत की उन महिला खिलाड़ियों की दास्तां आपके लिए लेकर आया है, जिन्होंने इसे स्वर्णिम युग बनाने में अपना अहम योगदान दिया। खेल जगत में इन महिलाओं ने कई मुश्किल हालातों को ठेंगा दिखाते हुए आसमान की बुलंदियों को छुआ और आने वाली पीढ़ियों के लिए नए मानदंड स्थापित किए।

इनमें से कुछ महिला एथलीटों ने न केवल अपने खेलों में शीर्ष स्थान हासिल किया बल्कि देश के युवाओं को भी प्रेरित करते हुए अपने संबंधित खेलों में शीर्ष स्थान हासिल किया।

साइना नेहवाल और पीवी सिंधु के कीर्तिमान

देश की खेल क्रांति में सबसे आगे भारतीय बैडमिंटन की महान खिलाड़ी साइना नेहवाल और पीवी सिंधु रही हैं। नेहवाल ने 2010 की शुरुआत में दिल्ली के कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर अपने सफर की शुरुआत की। लंदन 2012 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में ओलंपिक पदक हासिल करने वालीं पहली भारतीय महिला एथलीट बनकर उन्होंने नया कीर्तिमान रचा। इसके बाद नेहवाल ने 2015 में बीडब्ल्यूएफ महिला रैंकिंग में वर्ल्ड नंबर 1 बनकर नई उपलब्धि हासिल की। आपको बता दें, वह ऐसा करने वाली पहली महिला भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं।

पीवी सिंधु और साइना नेहवाल इस पूरे दशक में भारतीय बैडमिंटन की शान रही हैं।
पीवी सिंधु और साइना नेहवाल इस पूरे दशक में भारतीय बैडमिंटन की शान रही हैं।पीवी सिंधु और साइना नेहवाल इस पूरे दशक में भारतीय बैडमिंटन की शान रही हैं।

जहां दशक का पहला भाग साइना नेहवाल के नाम रहा तो वहीं दूसरे भाग में पीवी सिंधु इस खेल के शीर्ष पर पहुंच गईं। उन्होंने भी अपनी हमवतन साइना की तरह ही कई शीर्ष पदक हासिल किए।

महज 18 साल की उम्र में अर्जुन अवार्ड विजेता सिंधु लगातार दो बार बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप में पदक हासिल करने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बन गईं। उन्होंने 2013 और 2014 दोनों अवसरों पर ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। यह भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी रियो ओलंपिक 2016 के फाइनल में भी पहुंची लेकिन कैरोलिना मारिन द्वारा फाइनल में हराए जाने के बाद उन्हें सिल्वर मेंडल से ही संतोष करना पड़ा।

सिंधु ने 2017 के साथ-साथ 2018 बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप में भी ब्रॉन्ज़ जीता। खराब फॉर्म में जाने से पहले 2019 में सिंधु ने नोज़ोमी ओकुहारा को फाइनल में 21-7 से हराकर विश्व चैंपियनशिप का ख़िताब जीता। ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं।

सानिया मिर्ज़ा का शानदार प्रदर्शन    

दशक की शुरुआत में ही चोट लगने के बाद सानिया मिर्ज़ा के एकल करियर में काफी गिरावट देखी गई। कई लोग तो यह भी मानने लगे कि भारतीय टेनिस सनसनी सानिया मिर्ज़ा धीरे-धीरे गुमनामी में ढ़ल जाएंगी। हालांकि, उन्होंने अपने लिए कुछ सोच रखा था।

समय के साथ ही मिर्ज़ा ने खुद को एक युगल खिलाड़ी के रूप में परिवर्तित किया और युगल ग्रैंड स्लैम खिताब जीतकर युगल खेल में दुनिया के शीर्ष पर पहुंच गईं।

युगल वर्ग के सफ़र की शुरुआत 2011 में उन्होंने अपने पहले फ्रेंच ओपन के साथ की। जहां उन्होंने कुछ ही समय बाद अपने साथी युगल टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति के साथ मिश्रित युगल वर्ग में 2012 में पेरिस पहली जीत हासिल की। इस टूर सर्किट में शानदार प्रदर्शन करने के बाद सानिया मिर्ज़ा ने 2014 यूएस ओपन में अपना दूसरा मिश्रित युगल ग्रैंड स्लैम खिताब जीता।

साल 2015 मिर्ज़ा का और शायद किसी भी भारतीय टेनिस खिलाड़ी का सबसे अच्छा साल था। उन्होंने मार्टिना हिंगिस के साथ जोड़ी बनाई और दोनों ने लगातार तीन खिताब जीते, जिसने मिर्ज़ा को महिला युगल रैंकिंग में नंबर 1 पर पहुंचा दिया। वह यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं। हिंगिस के साथ उन्होंने लगातार तीन ग्रैंड स्लैम खिताब जीते और लगातार रिकॉर्ड 41 मैच जीते।

सानिया मिर्ज़ा और मार्टिना हिंगिस ने 2016 के ऑस्ट्रेलियाई ओपन जीत के बाद कुछ महीनों तक अलग-अलग खेला। हालांकि, इसके बाद मिर्ज़ा ने 2017 तक अपने खाते में ख़िताब जोड़ना जारी रखा। इसके बाद चोटों और गर्भावस्था ने उनके करियर में एक छोटा सा विराम लगा दिया। अब मिर्ज़ा लंबे इंतज़ार के बाद 2020 में होबार्ट इंटरनेशनल में खेलते हुए देखी जा सकेंगी।

मैरी कॉम – उम्र के साथ हुईं बेहतर

सदी के अंत में पदार्पण करने के बाद से महिला भारतीय मुक्केबाज एमसी मैरी कॉम ने भारत के लिए 18 अंतरराष्ट्रीय खिताब और कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं। यही नहीं बॉलीवुड में उनके जीवन पर बनी फिल्म भी काफी सफल रही है। लेकिन 36 वर्षीय इस भारतीय मुक्केबाज़ का अभी भी रुकने का कोई इरादा नहीं है।

अपने पूरे करियर के दौरान मैरी अजेय रही हैं। 2001 में एआईबीए महिला विश्व चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीतने के बाद से मैरी ने छह बार गोल्ड मेडल जीता। साल 2018 में जीता गया मेडल उनका नवीनतम मेडल है।

लंदन 2012 में अपने डेब्यू के बाद मैरी कॉम ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। बीजिंग 2008 में हुए ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में विजेंदर सिंह के मेडल जीतने के बाद मैरी तीसरे स्थान पर रहते हुए ओलंपिक पदक जीतने वाली दूसरी भारतीय मुक्केबाज़ बन गईं। भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान और पद्म भूषण से सम्मानित मैरी कॉम ने भारत में महिलाओं की मुक्केबाज़ी के लिए आगे का मार्ग प्रशस्त करने का काम किया है। 36 वर्षीय मैरी अभी भी दूसरे ओलंपिक मेडल की तलाश में हैं। यही वजह है कि वह टोक्यो 2020 के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं।

फोगाट बहनों की उपलब्धियां सराहनीय

विश्व स्तरीय पहलवानों के तौर पर फोगाट बहनों ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। कॉमनवेल्थ गेम्स में गीता फोगाट के गोल्ड मेडल जीतने के बाद बबीता कुमारी और विनेश फोगाट ने अपनी बहन के नक्शेक़दम पर चलते हुए 2014 के कॉमनवेल्थ गेम्स के साथ ही साथ 2018 में भी गोल्ड मेडल जीतने में सफलता हासिल की।

अंतररार्ष्ट्रीय स्तर पर लगातार मेडल जीतने वाली विनेश फोगट इतिहास में सबसे सफल भारतीय पहलवानों में से एक रही हैं। लेकिन आप हरियाणा से अभी भी कम उम्र की बेहतरीन पहलवान के निकलने की आस विनेश के रूप में ज़िंदा रख सकते हैं। हाल ही में वह शानदार फॉर्म में रही हैं। 2018 में एशियाई खेलों का गोल्ड मेडल और नूर-सुल्तान में विश्व चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ जीता। अब विनेश ने 2020 टोक्यो ओलंपिक पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।

गोल्ड की निशानेबाज़- मनु भाकर

बीजिंग 2008 में अभिनव बिंद्रा के गोल्ड के बाद शूटिंग में भारत ने बड़े पैमाने पर अपनी बढ़त बनाने में सफलता हासिल की है। उनकी जीत के 11 साल बाद अब देश की शूटिंग प्रतिभाओं का एक बड़ा दल पदक जीतने का माद्दा रखता है। उम्मीद है कि टोक्यो में होने वाले 2020 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में निशानेबाज़ कई पदक जीत सकते हैं।

टोक्यो 2020 में भारतीय शूटिंग दल में सबसे बड़ा नाम युवा खिलाड़ी मनु भाकर का होगा। 2018 में ग्वाडलजारा में आईएसएसएफ विश्व कप में, भाकर इतिहास में सबसे कम उम्र में आईएसएसएफ विश्व कप गोल्ड मेडल जीतने वाली निशानेबाज़ बन गईं। उस दौरान उनकी उम्र महज़ 16 वर्ष थी।

महज 17 साल की उम्र में मनु भाकर छह बार आईएसएसएफ विश्व कप गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं।
महज 17 साल की उम्र में मनु भाकर छह बार आईएसएसएफ विश्व कप गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं।महज 17 साल की उम्र में मनु भाकर छह बार आईएसएसएफ विश्व कप गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं।

बीते 20 महीनों में, भाकर ने अपने पदकों के खाते में छह आईएसएसएफ विश्व कप, दो एशियाई शूटिंग चैंपियनशिप और एक कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडल शामिल किया है। हालांकि उनका करियर अभी भी शैशवावस्था में है। भाकर शूटिंग में अपने शानदार प्रदर्शन के चलते दुनिया में एक चर्चित नाम बनकर उभरी हैं।

दीपिका कुमारी का शानदार प्रदर्शन

हाल ही में संपन्न हुए एशियाई तीरंदाज़ी चैंपियनशिप में उनके दो ब्रॉन्ज़ मेडल जीत का मतलब यह है कि दीपिका कुमारी ने बीते एक दशक में सिर्फ 2017 को छोड़कर हर साल एक अंतरराष्ट्रीय ख़िताब जीता है। सिर्फ 25 साल की होने के बावजूद कुमारी 10 साल से अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। महज 15 वर्ष की उम्र में ही कुमारी ने दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ खेलों में दो गोल्ड मेडल और एशियाई खेलों में एक बॉन्ज़ मेडल जीतकर सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का काम किया।

दीपिका कुमारी ने तीरंदाज़ी विश्व कप में अब तक चार सिल्वर मेडल और 2011 में एशियाई तीरंदाजी चैंपियनशिप में एक सिल्वर जीतकर साबित कर दिया वह काफी बेहतर तीरंदाज़ हैं। हालांकि, कुमारी के लिए दूसरा स्थान काफी नहीं था। ऐसे में अंताल्या में साल 2012 में तीरंदाजी विश्व कप में 17 वर्षीय इस तीरंदाज़ ने अपना पहला गोल्ड मेडल हासिल किया। अपने एक दशक के लंबे करियर में कुमारी ने अब तक कुल 23 तीरंदाज़ी वर्ल्ड कप मेडल जीते हैं, जिसमें पांच गोल्ड और छह एशियाई तीरंदाज़ी गोल्ड मेडल शामिल हैं। इसमें 2013 में मिश्रित टीम का गोल्ड भी शामिल है।

अपनी सभी सफलता के बावजूद कुमारी अभी भी अपने ओलंपिक पदक से दूर हैं। 2020 टोक्यो ओलंपिक में भारत के लिए एक कोटा स्थान प्राप्त कर लिया है, ऐसे में वह चाहेंगी कि अगले साल जापान में एक मेडल अपने खाते में जोड़ सकें।

दीपा करमाकर की साहसी विजय

केवल कुछ गिने-चुने जिमनास्टों ने ही प्रोडुनोवा को करने की कोशिश की है। हालांकि, भारत की दीपा करमाकर न केवल ऐसा करने वाली उन बहादुरों में शामिल हैं, बल्कि उन्होंने ‘वॉल्ट ऑफ़ डेथ’ को करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है।

उनके प्रयास रंग लाए हैं। ग्लासगो में 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में, दीपा करमाकर ने प्रोडुनोवा को करते हुए सफल लैंडिग कर कमाल कर दिया। इतिहास में वह इस मूव को सफलतापूर्वक करने वाली पांचवीं महिला बन गईं। उनके साहस ने उन्हें तीसरे स्थान पर लाने में मदद की और कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने वाली वह पहली भारतीय महिला जिमनास्ट बन गईं।

रियो 2016 में, करमाकर ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली जिमनास्ट बनी। महज 23 वर्ष की इस जिमनास्ट ने यह साबित कर दिया कि वह ब्राजील ऐसे ही नहीं गईं थीं। उन्होंने इस भव्य मंच पर सभी के सामने प्रोडुनोवा का प्रयास किया और इसे सफलतापूर्वक किया भी। हालांकि, वह चौथे स्थान पर रहते हुए पदक से चूक गईं, लेकिन दीपा करमाकर की बहादुरी जिम्नास्टिक समुदाय में सभी से प्रशंसा अर्जित करने में सफल रही।

उज्ज्वल भविष्य

इन महिलाओं के प्रयासों ने न केवल राष्ट्र को अभूतपूर्व गौरव दिलाया है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को भी उनके कदमों पर चलने और उनका अनुकरण करने के लिए प्रेरित किया है। उनकी उपलब्धियां सराहनीय हैं।

इनमें से ज्यादातर महिला खिलाड़ी टोक्यो 2020 ओलंपिक में प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार हैं। ऐसे में आने वाले समय में वह अपने शानदार करियर में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ सकती हैं।

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