साक्षी और राठौर के ओलंपिक मेडल की साक्षी बनी थी आज ही की तारीख

भारत के लिए आज की तारीख (17 अगस्त) ओलंपिक की दृष्टि से बेहद ऐतिहासिक है। राज्यवर्धन सिंह राठौर और साक्षी मलिक ने यादगार ओलंपिक मेडल जीते थे।

लेखक रितेश जायसवाल ·

ये खिलाड़ी अपने चुने हुए खेलों में अग्रणी रहे हैं। इन्होंने विपरीत परिस्थियों का डटकर सामना किया और अपने दृढ़ संकल्प के चलते यह मुकाम हासिल करने में सफल रहे। भारत के लिए राज्यवर्धन सिंह राठौर और साक्षी मलिक सिर्फ दो ओलंपिक मेडल विजेता नहीं हैं। बल्कि ये आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्दा मिसाल हैं।

ये दोनों भारतीय खेल सितारे आज ही (17 अगस्त) के दिन अपनी जीत का जश्न मना रहे हैं। ऐसे हम उन दो पलों को याद कर रहे हैं, जिसने इनके करियर को यादगार बनाने के साथ ही देश की युवा पीढ़ी को इन खेलों में भी भविष्य बनाने के लिए प्रेरित किया।

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रियो ओलंपिक में साक्षी मलिक 

साल 2016 में होने वाले रियो ओलंपिक में भारत को बहुत उम्मीदें थीं। पहली बार देश की तरफ से सबसे अधिक खिलाड़ियों का दल ओलंपिक में भाग करने के लिए गया था। जिसमें बेहतरीन फॉर्म में चल रहे निशानेबाज़ बड़ी संख्या में मौजूद थे। लेकिन जैसे ही खेलों के नतीजे आना शुरू हुए तो सभी के मन में निराशा घर करने लगी। क्योंकि सभी को भारत की झोली में की मेडल आने की उम्मीद थी।

साक्षी के खेल शुरू होने से पहले बढ़ा दबाव

निशानेबाज़ी में कोई भी खिलाड़ी देश को गौरवांवित करने में असफल रहा। साथ ही पुरुष हॉकी टीम भी पिछली बार की तरह कुछ ख़ास प्रदर्शन नहीं कर पाई। गोल की सही टाइमिंग न होने के कारण हॉकी से भी उम्मीद खत्म हो गई। साक्षी के रेसलिंग मैट में उतरने से पहले विनेश फोगाट को भी चोट लगने के कारण बाहर होना पड़ा। ऐसे में मेडल की उम्मीद के लिए खिलाड़ियों पर दबाव और भी बढ़ गया।

साक्षी क्वार्टर फाइनल में वेलेरिया कोबलोवा को हराने में नाकाम रहीं। लेकिन रूसी रेसलर के फाइनल में पहुंचने के साथ ही इस भारतीय रेसलर के रेपेच राउंड में जाकर मेडल हासिल करने की उम्मीद जाग गई।

जहां रोहतक में जन्मी इस रेसलर ने पहले मंगोलिया की ओरखोन पूर्वेदोर्ज को 12-3 से हराया। इसके बाद ब्रॉन्ज़ मेडल हासिल करने के लिए आखिरी मैच किरगिस्तान की ऐसूलू टिनीबेकोवा से हुआ। यह मैच शुरू होते ही लगने लगा कि साक्षी अब बहुत आसानी से यह मैच जीत जाएंगी। क्योंकि पहले राउंड के अंत होने तक साक्षी 5-0 से आगे चल रहीं थीं। लेकिन लगातार सिर्फ डिफेंस करने के कारण जजों के पैनल ने दो प्वाइंट मलिक के प्रतिद्वंदी की झोली में डाल दिए। लेकिन अपने करियर की शानदार वापसी करते हुए साक्षी ने ऐसूलू को हराकर रियो में ब्रॉन्ज़ मेडल को अपने नाम कर लिया। इसी के साथ वह रेसलिंग में मेडल जीतने वाली पहली महिला रेसलर बन गईं।

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राज्यवर्धन का गौरवपूर्ण पदक

आइए अब आपको साल 2004 में राज्यवर्धन सिंह राठौर के मॉर्डन ओलंपिक का जन्मदाता कहे जाने वाले ग्रीस के एथेंस में जीते गए मेडल के सफर पर ले चलते हैं। यह वो मेडल था जिसने देश को गौरवांवित करने के साथ ही शूटिंग में भारत के भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया। राठौर ने डबल ट्रैप स्पर्धा के क्वालीफ़ाइंग और अंतिम दौर में कुल 179 अंक हासिल करते हुए सिल्वर मेडल जीता। इस स्पर्धा में संयुक्त अरब अमीरात के अलमक्तुम को गोल्ड मेडल मिला जिन्हें दोनों दौरो में कुल 189 अंक मिले। वहीं, चीन के वांग ज़ेंग ने 178 अंक लेकर ब्रॉन्ज़ मेडल हासिल किया।

यह पहला मौका था जब ओलंपिक इतिहास में स्वतंत्र भारत में किसी भारतीय ने रजत पदक हासिल किया। इससे पहले 1900 में पेरिस ओलंपिक में कोलकाता के एक एंग्लो-इंडियन नॉर्मन प्रिचर्ड ने बाधा दौड़ में दो रजत पदक जीते थे। भारत के लिए ओलंपिक में कोई व्यक्तिगत पदक जीतने वाले राज्यवर्धन चौथे भारतीय खिलाड़ी बने। राठौर ने इसके पहले भी भारत के लिए निशानेबाज़ी में कई पदक जीते। लेकिन एथेंस में वे पहली बार ओलंपिक के अखाड़े में उतरे और चमक गए।

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ एथेंस ओलंपिक में भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक रजत पदक विजेता बने।