भारतीय ओलंपिक के पिछले एक दशक के 10 यादगार लम्हें 

पिछले एक दशक के भारतीय ओलंपिक मेडल विजेताओं पर नज़र, जिन्होंने पूरे देश को गर्व के साथ जीत दिलाई। 

लेखक जतिन ऋषि राज ·

खेल और भारत, यह दोनों शब्द हमेशा ही साथ लिए गए हैं। भारत वर्ष में खिलाड़ियों को प्रेरणा का स्त्रोत, देश की उम्मीद और न जाने क्या-क्या कहा जाता है। खेल के साथ-साथ भारत में खिलाड़ियों भी को बेशुमार इज्ज़त और प्यार दिया जाता है। बैडमिंटन हो या क्रिकेट हर तरह के खेल को देखने और सराहने के लिए प्रशंसकों का जुनून हर दफा चरम पर रहता है। बात करें खेल की दुनिया के सबसे बड़े इवेंट की तो वह है ओलंपिक गेम्स। ओलंपिक के इतिहास में भारत ने अब तक कुल 28 मेडल अपने नाम किए हैं, जिनमें से पिछले 9 सालों में भारत ने 8 मेडल जीते हैं। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि पिछले कुछ सालों में भारतीय खिलाड़ियों ने मेडल के आंकड़ो को बदलने की कोशिश की और काफी हद तक इसमें सफल भी हुए।

अब दोबारा खेल का महाकुंभ सजने वाला है। जी हाँ, जापान के टोक्यो शहर में ओलंपिक खेलों का आयोजन 2020 में किया जाएगा और दुनिया भर के खिलाड़ी इस महा मुकाबले का हिस्सा बनेंगे। तो चलिए बात करते हैं भारत के ओलंपिक गेम्स के पिछले एक दशक के रिकॉर्ड की जहां बहुत से खिलाड़ी सितारे बनें और पूरे भारतीय राष्ट्र को अपने भाव से सम्मानित किया।

गगन नारंग का ब्रॉन्ज़ पर निशाना भारत का सफ़र 2012 लंदन ओलंपिक गेम्स तक पहुंच चुका था। शूटिंग के हवाले से बात की जाए तो अभिनव बिंद्रा पर पूरा देश नज़रें गड़ाए बैठा था। हालांकि बिंद्रा का लंदन ओलंपिक गेम्स का सफ़र सभी उम्मीदों के विपरीत बेहद जल्द ही ख़त्म हो गया और साथ ही भारत की उम्मीदें भी धसने लगीं। लेकिन अगर सूरज ने ठान लिया तो उसका उदय कोई नहीं रोक सकता। मेंस 10 मीटर एयर राइफल में कुछ ऐसा ही हुआ, गगन नारंग पोडियम का हिस्सा बनें और भारत के सिर एक मेडल की चमक और लगा दी। गगन ने रोमानिया के एलिन जॉर्ज मोल्दोनोवेनु और इटली के निकोलो कैम्पियानी के साथ अपना नाम भी विजेताओं की फेहरिस्त में शुमार कर लिया। गगन के इस ब्रॉन्ज़ मेडल से भारत ने लंदन ओलंपिक गेम्स में जीत का खाता खोला और यह जीत उस इवेंट के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गई।

लंदन 2012 में गगन नारंग (सीधी तरफ) के हाथ आया ब्रॉन्ज़ मेडल 

विजय कुमार की विजय

कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में तीन गोल्ड और एक सिल्वर मेडल जीतकर, अपने मनोबल को बस्ते में डाल कर विजय कुमार पहुंचे 2012 लंदन ओलंपिक गेम्स में। अपनी बेहतरीन फॉर्म के चलते विजय से उम्मीदें बढ़ चुंकी थी और उन्होंने प्रदर्शन भी कुछ ऐसा ही किया। 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल इवेंट में सिल्वर मेडल पर कब्ज़ा जमा अपने नाम का लोहा मनवाया।

आईएसएसएफ द्वारा शूटिंग के नियम बदले गए, जिस वजह से बहुत से शूटरों को प्रदर्शन करने में खासी दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा। इन बदले नियमों का असर विजय के मानसिक संतुलन पर नहीं पड़ा और ओलंपिक गेम्स में उन्होंने 585 का शानदार स्कोर हासिल कर फाइनल में प्रवेश किया। फाइनल राउंड भारत के विजय और क्यूबा के लेयोरस पूपो के बीच हुआ, हालांकि विजय गोल्ड तो हासिल न कर पाए लेकिन वह लंदन में भारत को पदक दिलाने में ज़रूर कामयाब रह।

साइना नेहवाल की ऐतिहासिक जीत

साइना नेहवाल, एक ऐसा नाम जिसके कंधों पर एक नहीं दो नहीं बल्कि हर बार जीत की उम्मीदों का भार रहता था। भारतीय बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल लंदन ओलंपिक गेम्स से पहले ही शौहरत कमा चुकीं थीं। खेल की दुनिया में नेहवाल का नाम अदब से लिया जाने लगा था। स्विस ओपन और थाईलैंड ओपन जीत कर नेहवाल ने अपने भविष्य का प्रमाण दिया लेकिन ओलंपिक गेम्स में बैडमिंटन में भारत का सूखा अभी तक मिटा नहीं था। नेहवाल के ऊपर बैडमिंटन में पहला ओलंपिक मेडल जीतने का भार जितना ज़्यादा था उससे कही ज़्यादा दम उनके हौंसलों में था। वर्ल्ड नंबर 2 की खिलाड़ी ज़िंग वां के सामने कोर्ट पर उतरीं नेहवाल ने खुद को 100 प्रतिशत झोंक दिया और चीनी शटलर से कई कड़े सवाल पूछे।

भारत की साइना नेहवाल ने लंदन 2012 ओलंपिक गेम्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता 

वांग को मुकाबले में पहला गेम जीतने के लिए अपने पसीने को पानी की तरह बहाना पड़ा और अंततः वह 21-18 से विजयी रहीं। दूसरे गेम में नेहवाल ने और बेहतर प्रदर्शन किया और जीत की ओर बढ़ने लगीं। मुकाबले के बीच में ही वा के सीधे घुटने में चोट लगी और उन्हें मुकाबले को छोड़ना पड़ा। नेहवाल के कड़े परिश्रम, तकनीक और हौंसले ने मिलकर भारत को ओलंपिक गेम्स के बैडमिंटन इवेंट में पहला मेडल जितवाया। इस ब्रॉन्ज़ मेडल ने भारत के सूखे को हटाया और बहुत से युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया।

मैरी का मैजिक

जिस प्रकार शूटिंग के नियमों में बदलाव किए गए उसी तरह बॉक्सिंग में भी कुछ बदलाव हुए। बॉक्सिंग में केवल तीन भार वर्गों को घोषित किया गया जिस वजह से मैरी कॉम जैसे कई खिलाड़ियों को मुश्किलातों का सामना करना पड़ा। ओलंपिक गेम्स में कुछ करना था तमैरी को अपने वज़न को बढ़ाने की दरकार थी ताकि वे 51 किग्रा वर्ग में खेल सकें। 46 और 48 किग्रा वर्ग के खिलाड़ी को जब 51 किग्रा में खेलना होता है तो हालात उनके विपरीत होते हैं लेकिन असल खिलाड़ी भी वही होते हैं जो हालातों को अपने पक्ष में करे और अपने देश को हर कीमत पर सम्मानित करें।

लंदन ओलंपिक गेम्स में भारतीय बॉक्सिंग का पलड़ा हल्का था और उम्मीदें कम। मैरी ने अपने कारवां को बढ़ाया और देखते ही देखते पोलैंड की कैरोलिना मिकालजुक को और तुनिशिया की मरुआ रहाली को हराकर पूरे ओलंपिक के खेमे में हलचल मचा दी। अब कोई भी बॉक्सर मैरी कॉम को आसानी से हराने का नहीं सोच सकता था। अब उनका मुकाबला था इंग्लैंड की ही निकोला एडम्स से। बहुत बेहतरीन खेल के बाद एडम्स 11-6 से विजयी साबित हुईं लेकिन इस मुकाबले के बाद भारत में ऐसा कोई घर नहीं था जहां मैरी और उनके जीते ब्रॉन्ज़ मेडल के किस्से नहीं गड़े गए। लंदन ओलंपिक गेम्स के बाद भारत कमैरी कॉम के रूप में स्टार बॉक्सर और ब्रॉन्ज़ के रूप में एक और मेडल मिल गया।

पीटीआई से बात करते हुए मैरी कॉम ने एक दफा कहा था कि “मैं भारत के लिए ओलंपिक गेम्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने वाली पहली महिला बॉक्सर बन कर बेहद खुश हूं लेकिन उसे गोल्ड में तब्दील न कर पाने का दुख भी है। सेमीफाइनल मुकाबले में मुझे न जाने क्या हुआ, मेरा शरीर वैसा नहीं चल रहा था जैसा कि मैं चाहती हूं और मुझे लगा कि मैं कुछ कर नहीं पा रही। मैं बहुत आसमंजस की स्थिति में आ गई थी।”

सुशील का ओलंपिक मेडल

ओलंपिक गेम्स 2008 में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने के बाद भारतीय पहलवान सुशील कुमार से 2012 लंदन गेम्स के लिए उम्मीदें बढ़ गईं थीं। सुशील कुमार ने पूरी प्रतियोगिता के दौरान शानदार खेल दिखाया और अपने दर्शकों को दोबारा अपने ख़ास होने का एहसास दिलाया। लंदन गेस्म में सिल्वर मेडल जीतने वाले सुशील को फाइनल मुकाबले से पहले अपने शरीर से भी लड़ना पड़ा। फाइनल में इस भारतीय पहलवान की भिड़ंत जापान के तात्सुहिरो योनामि से हुई। भारत के लिए बुरी खबर तब आई जब सुशील को फाइनल से पहले पेट में उठे दर्द की वजह से परेशानी का सामना करना पड़ा। वह 6 बार गुसलखाने का प्रयोग करते नज़र आए जिस वजह से उनका वज़न गिरा और उन्हें अहम मुकाबले से पहले कमज़ोरी का सामना करना पड़ा। हालांकि योनामित्सु ने भी अच्छा खेल दिखाया और गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा किया लेकिन सुशील की लाजवाब कोशिश ने उन्हें वाह वाही का पात्र बनाया और सिल्वर मेडल से उन्होंने अपने जज़्बे को कामयाब रखा।

सुशील कुमार ने लंदन 2012 के दौरान भारतीय खिलाड़ियों की उम्मीदवारी की 

पीवी सिंधु ने किया कोर्ट पर कब्ज़ा 

जहां साल 2012 में साइना नेहवाल ने बैडमिंटन की दुनिया में भारत का नाम ऊंचा किया वहीं दूसरी तरफ 2016 रियो ओलंपिक गेम्स में भारत की पीवी सिंधु भारत के गर्व को एक अलग ही स्तर पर लें गईं। प्रतियोगिता में जल्द ही लय को पकड़ सिंधु न ताई जू यिंग, वांग यिहान और नोज़ोमी ओकुहारा जैसे दिग्गजों को मात दे फाइनल तक का सफर तय किया। फाइनल मुकाबले में सिंधु की भिड़ंत अव्वल दर्जे की खिलाड़ी कैरोलिना मारिन से हुई और इस 83 मिनट के कठिन मुकाबले में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। मारिन ने गोल्ड मेडल जीता और भारत की पीवी सिंधु ने सिल्वर मेडल के साथ-साथ पूरे देश का विश्वास भी जीता।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए पीवी सिंधु ने था कहा “मुझे नहीं पता था कि मैं 21 साल की उम्र में ओलंपिक मेडल जीत जाऊंगी, लेकिन मुझे पता था कि में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करूंगी। मैंने इसे अपने पहले ओलंपिक गेम्स के तौर पर लिया और एक समय पर बस एक ही मुकाबले के बारे में सोचा। सिल्वर मेडल को देश में लाने से में बहुत बहुत खुश हू।"

Marin makes badminton history for Spain

Carolina Marin beats India's PV Sindhu in three sets to become the first no...

साक्षी मलिक ने रचा इतिहास

साक्षी मलिक, एक ऐसी भारतीय महिला पहलवान हैं जिन्होंने रिकॉर्ड के साथ-साथ लोगों की धारणा को भी बदला। साक्षी के रियो ओलंपिक गेम्स में उनके नाम लगे ओलंपिक मेडल ने उन्हें पहली महिला पहलवान बनाया जिन्होंने यह कारनामा किया हो। हरियाणा की इस पहलवान का ओलंपिक का सफ़र बहुत से उतार चढ़ाव भरा रहा। ओलंपिक वर्ल्ड क्वालिफाइंग टूर्नामेंट में चीन की ज़ांग लै को पटकनी दे मलिक ने फाइनल के लिए क्वालिफाई किया। हालांकि इस जीत को प्रशंसकों द्वारा ज़्यादा सरहाया नहीं गया और इसे एक तुक्का माना जाने लगा। मलिक की जीत की ललक ने इस धारणा को तक बदला जब उन्होंने शुरूआती राउंड में अपने प्रतिद्वंदियों को हराया और अपना कारवां आगे बढ़ाया।

असल पहलवान वही है जो हर मुकाबले को एक सुनेहरे मौके के रूप में देखे। ऐसा ही कुछ मलिक का सफ़र रहा जब रूस की वेलेरिया कोब्लोवा ने फाइनल में प्रवेश किया जिसके तहत उन्हें रेपेचाज राउंड में लड़ने का मौका मिला। ब्रॉन्ज़ मेडल मैच में मलिक ने एशियन चैंपियन इज़ुल दायनीव्यक को मात दे ब्रॉन्ज़ मेडल पर कब्ज़ा किया और साथ ही पूरे देश की लाडली बन गईं।

दीपा कर्माकर ने दिखाया “द वॉल्ट ऑफ़ डेथ”

कुछ खिलाड़ी ऐसे भी होते हैं, जो बिना जीते ही हर खेल प्रेमी के दिल में अपनी जगह बना लेते हैं। भारत को कर्मकार नामक नामक एक ऐसी जिमनास्ट मिलीं जो जीत तो न सकीं लेकिन अपने हुनर और हौंसले से सभी के मन को मोह लिया। रियो गेम्स में उम्दा प्रदर्शन करने के बाद कर्मकार हर घर का हिस्सा बन गईं। इतना ही नहीं, कर्माकर ने प्रोदुनोवा मूव, जिसे “द वॉल्ट ऑफ़ डेथ” भी कहा जाता है, वह दर्शा कर सभी को चौंका दिया। हालांकि कर्माकर जीत तो न सकीं, लेकिन उन्होंने भारत के साथ पूरी दुनिया की महिलाओं को जिमनास्ट बनने के लिए प्रेरित किया।

चौथे स्थान पर रहीं कर्माकर ने 15.006 अंक बटोरे और ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने वाली आलिया मुस्तफ़िना ने 15.100 अंक अपने नाम किए और पोडियम का हिस्सा बनीं।

अभिनव बिंद्रा की शानदार कोशिश

बीजिंग ओलंपिक गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने के बाद भारतीय उम्दा शूटर अभिनव बिंद्रा ने रियो ओलंपिक गेम्स में फिर एक बार कदम रखे। रियो गेम्स से पहले ही बिंद्रा ने दर्शा दिया था कि यह ओलंपिक उनका आखिरी होगा। इसी वजह से उनके साथ खेल प्रेमियों का स्नेह और उम्मीदें ज़्यादा थी। उम्मीदों के मुताबिक बिंद्रा ने पहली दो सीरीज़ में उम्दा शुरुआत कर 29.9 और 30.2 स्कोर किया और टॉप तीन खिलाड़ियों में अपना नाम शुमार कर तीसरी सीरीज़ की ओर बढ़े।

इस दिग्गज खिलाड़ी ने कोशिश तो बहुत की लेकिन देखते ही देखते उनके प्रतिद्वंदी उनसे आगे निकलने लगे। हालांकि वह अभी भी खेल में बरकरार थे और अंत में यूक्रेन के सरही कुलिश के साथ उनका मुकाबला टाई हो गया। नॉकआउट राउंड में बिंद्रा ने अपनी लय को खो दिया और रियो ओलंपिक गेम्स में वह चौथे स्थान पर रह गए। 

अभिनव बिंद्रा ने इंडिया टुडे से बात करते हुए कहा था “आपको सच्चाई को अपनाना पड़ेगा। खेल आपको ऐसी चीज़ें सिखा देता है। खेल की दुनिया में आप कभी ऊंचाई पर जाते हो तो कभी नीचे, खेल उस सच्चाई को अपनाना सिखाता है। चौथे स्थान का मतलब है कि आप दुनिया में चौथे नंबर हैं, यह इतना बुरा तो नहीं है, पांचवें से भी आपको बेहतर बताता है।”

रियो 2016 के 10 मीटर एयर रायफल के दौरान शूट-ऑफ के बाद बाहर हुए अभिनव बिंद्रा। 

जोयदीप कर्माकर ने लंदन ओलंपिक में चखा कर्मफल

जैसे पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं वैसे ही खेल की दुनिया में खिलाड़ी का जौहर जूनियर स्तर पर ही दिख जाता है। 1994 के जूनियर नेशनल चैंपियन में जोयदीप कर्माकरने कम उम्र में अपने कौशल से वाह वाही लूटी और खेल प्रेमियों की आँखों में सुनहरे सपने बुनने शुरु कर दिए। मंच सज चुका था और कर्मकार 50 मीटर राइफल प्रोन इवेंट के लिए एक दम तैयार था। लंदन ओलंपिक में कर्माकर ने शानदार प्रदर्शन दिखाया और अपे कारवां को आगे बढ़ाया।

लंदन 2012 ओलंपिक गेम्स में जॉयदीप कर्माकर पदक जीतने से चूक गए थे, उन्होंने 50 मीटर राइफ़ल प्रोन में चौथा स्थान हासिल किया था।

क्वालिफिकेशन राउंड में कर्माकर और अन्य 4 खिलाड़ियों के बीच टाई हुआ जिस वजह से सभी को 10-10 शॉट्स (शूट ऑफ़) का मौका मिला। इस मौके को कर्माकर ने दोनों हाथों से पकड़ा और हर शॉट को सीधा निशाने पर मारा। क्वालिफिकेशन राउंड से पहले रैजमंड देबेविक भारतीय शूटर कर्माकर से महज़ एक अंक ऊपर थे जिस वजह से उनको फाइनल में जाने का मौका मिला। जोयदीप कर्माकर जीत तो न सकें लेकिन उन्होंने हर खेल प्रेमी के दिल में ख़ास जगह बनाई।