दीपिका कुमारी ने रैंकिंग के बारे में न सोचते हुए हमेशा अपने खेल पर केंद्रित किया ध्यान

भारतीय तीरंदाज़ ने इस बात को स्वीकार किया कि उन्हें वर्ल्ड नम्बर-1 होने के मायने नहीं पता थे।

दीपिका कुमारी (Deepika Kumari) का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां उनके पिता एक ऑटो-रिक्शा चलाते थे और उनकी माँ एक नर्स थीं। उन्होंने तीरंदाज़ी के खेल का चुनाव इसलिए किया ताकि वह घर चलाने के अपने माता-पिता के बोझ को थोड़ा कम कर सकें। 

जब टाटा तीरंदाजी अकादमी ने उनकी आकांक्षाओं को पंख देने के साथ ही मुफ्त अभ्यास, भोजन, कपड़े और रहने की सुविधा प्रदान करने की बात की, तो उन्होंने एक पल गवाएं बिना ही इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

हालांकि, कई तीरंदाज़ी टूर्नामेंट खेलने के बाद दीपिका कुमारी की रुचि इस खेल में समय के साथ बढ़ी। लेकिन वह कभी भी शिखर तक पहुंचने का लक्ष्य लेकर आगे नहीं बढ़ीं।

इसलिए जब रांची की यह एथलीट जून 2012 में वर्ल्ड नम्बर-1 खिलाड़ी बनी तो उन्हें उनके करियर के अगले चार साल तक इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि इसके क्या मायने हैं।

दीपिका कुमारी ने भारतीय क्रिकेटर स्मृति मंधाना (Smriti Mandhana) और जेमिमा रोड्रिगेज (Jemimah Rodrigues) द्वारा यूट्यूब पर होस्ट किए जा रहे डबल ट्रबल शो में कहा, "उस समय मैं केवल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना चाहती थी और अपने खेल पर ध्यान देना चाहती थी।"

ओलंपिक पर ध्यान केंद्रित करते हुए दीपिका कुमारी ने मई 2012 में अंताल्या में अपना पहला वर्ल्ड कप व्यक्तिगत रिकर्व गोल्ड मेडल जीता था।

इस उपलब्धि की वजह से वह दक्षिण कोरिया की बोबे की (Bobae KI) को पीछे छोड़ते हुए वर्ल्ड रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर पहुंच गईं। इसके साथ ही वह डोला बनर्जी (Dola Banerjee) के बाद ऐसा करने वाली दूसरी भारतीय तीरंदाज़ बन गईं।

लेकिन इस तीरंदाज़ ने इस बात को स्वीकार किया कि उन्हें इस उपलब्धि के मायने के बारे में बहुत अधिक अंदाज़ा नहीं था।

भारतीय तीरदांज़ ने कहा, “मुझे प्रेस (मीडिया) से एक कॉल के बाद इसके बारे में पता चला। बाद में मैंने अपने कोच से पूछा कि वर्ल्ड नम्बर-1 क्या होता है? फिर मेरे कोच ने समझाया।”

तीरंदाज़ी और निशानेबाज़ी में अंतर और समानताएं

दीपिका कुमारी के साथ इस यूट्यूब शो में एक और पूर्व वर्ल्ड नम्बर-1 खिलाड़ी अपूर्वी चंदेला भी जुड़ीं। दोनों एथलीटों ने उन बातों को बताया जो निशानेबाज़ी और तीरंदाज़ी के खेल को एक दूसरे से अलग करती हैं। क्योंकि इन दोनों ही खेलों मे एथलीट एक ही स्थिति में खड़े होते हैं और अपने लक्ष्य पर निशाना लगाते हैं।

10 मीटर एयर राइफल निशानेबाज़ ने कहा, "तीरंदाज़ी थोड़ा गतिशील है, इसमें चारों ओर काफी चलना रहता है। जबकि निशानेबाज़ी के दौरान स्थिर खड़ा रहना होता हैं। एक शूटर को स्थिरता और अच्छी मांसपेशी नियंत्रण की जरूरत होती है, इसलिए हमारे सभी अभ्यास एक मजबूत कोर बनाने की दिशा में ही होते हैं।”

अपूर्वी चंदेला ने आगे कहा, “सीधी तरह से कहें तो इसमें आपको पूरी तरह से अपने शरीर को स्थिर रखना होता है और शरीर का कोई भी हिस्सा हिलना नहीं चाहिए।”

दूसरी ओर तीरंदाज़ी की प्रतियोगिता निशानेबाज़ी से अधिक समय तक चलती है। दीपिका कुमारी ने इस खेल के बारे में बात करते हुए शरीर के निचले हिस्से के मजबूत होने के महत्व को बताया।

आर्चर ने कहा, “तीरंदाजी बहुत अलग है क्योंकि हमें बहुत ताकत की जरूरत होती है। इसलिए हम ताकत के लिए बहुत सारे अभ्यास करते हैं, खासतौर पर पैरों के व्यायाम।”

हालांकि, दोनों एथलीटों ने एक महत्वपूर्ण पहलू पर सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि निशानेबाज़ों और तीरंदाज़ों को दिल की धड़कन को नियंत्रित करना बहुत जरूरी होता है।

अपूर्वी चंदेला ने कहा, "यदि आपके ऊपर दबाव है और आपके दिल की धड़कन सच में बढ़ने लगी तो शॉट बाहर जा सकता है। यह एक सेकंड का वह अंश है जिसमें आपको दिल की दो धड़कनों के बीच शूट करना होता है। मुझे लगता है कि यही बात दोनों खेलों में समान है।”

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