अंजू बॉबी जॉर्ज ने भारतीय एथलेटिक्स में सकारात्मक बदलाव के दिए सुझाव

भारतीय दिग्गज का मानना है कि एथलेटिक्स सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी किसी बड़े इवेंट में एक मेडल का सपना नहीं देखा जा सकता है।

भारतीय एथलेटिक्स दिग्गजों में से एक अंजू बॉबी जॉर्ज (Anju Bobby George) का मानना है कि जब से उन्होंने प्रतिस्पर्धा करना शुरू किया, तब से लेकर अब तक इस खेल ने एक बहुत लंबा सफर तय किया है।

स्पोर्ट्सकीड़ा के आयोजित किए गए एक इंस्टाग्राम लाइव सेशन में बोलते हुए 2003 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप की कांस्य पदक विजेता ने कहा कि एथलीटों के पास आज अच्छी सुविधाएं हैं। उनके समय से अगर तुलना की जाए तो आज सक्रिय एथलीटों के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा और शीर्ष स्तर की ट्रेनिंग सुविधाएं उपलब्ध हैं।

उन्होंने कहा, “यह एक स्वाभाविक सी बात है। जब मैं प्रतिस्पर्धा करती थी तब से तो जीवन के हर पहलू में बदलाव देखा है। लेकिन साल 2000 के दौरान हमारे पास मुश्किल से अंतरराष्ट्रीय सर्किट या प्रशिक्षण के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध था। हमें छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ा। अभी तो काफी विकास हो गया है। आज चीज़ें जितनी आसान हैं उतना पहले नहीं हुआ करती थीं। तब चीजें बहुत धीमी थीं।”

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#SKLive with Anju Bobby George

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खेल के प्रति सरकार के दृष्टिकोण में बदलाव पर बात करते हुए लॉन्ग जम्प की राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक ने कहा कि केंद्र सरकार आज समझती है और एथलीटों को देश की संपत्ति मानती है। अब बस सबको खुद पर काम करना है और जरूरत पड़ने पर अच्छा प्रदर्शन करना है।

उन्होंने कहा, “यहां तक कि जब सरकारी सहायता की बात आती है तो आज यह आसानी से उपलब्ध है। आज आपके पास सरकार पहुंच रही है। यदि आप में अच्छी प्रतिभा है, तो सरकार आपको अपना सहारा देगी और करियर बनाने के लिए मदद करने के लिए तैयार है।”

भविष्य पर नज़र

अंजू बॉबी जॉर्ज का मानना है कि भारत ने बीते कुछ वर्षों में ज़मीनी स्तर पर प्रतिभाओं को खोजने और उन्हें तैयार करने की दिशा में भी अपना ध्यान केंद्रित किया है। 

खेलो इंडिया यूथ गेम्स और नेशनल इंटर डिस्ट्रिक्ट जूनियर एथलेटिक्स मीट जैसी पहल इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। यहां कम उम्र में ही प्रतिभाओं को खोजा गया और फिर उन्हें तैयार करने पर ध्यान दिया गया। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि इसके परिणाम तत्काल सामने नहीं आएंगे।

43 वर्षीय ने कहा, “वास्तव में सबसे निचले स्तर पर प्रतिभा समान है। एथलेटिक्स की बात की जाए तो हम बहुत ज्यादा अंतर नहीं देखते हैं। फर्क तब पड़ता है जब हम ट्रेनिंग और अन्य चीजों से जुड़ते हैं, जो एक एथलीट को बेहतर बनाती हैं। अन्य देशों में भी प्रतिभा को निचले स्तर पर ही खोजा जाता है। इसी मामले में भारत पीछे रहा है। लेकिन अब इसमें बदलाव आ रहा है।”

इसके अलावा हम कोचों को भी शिक्षित कर रहे हैं। ज़मीनी स्तर पर यह जरूरी बातों में से एक है। आपको यह जानना होगा कि खेल में आने वाले बच्चों के साथ कैसे काम करना है।

लेकिन इस तरह के केंद्रित प्रयासों के बावजूद भारतीय एथलेटिक्स की इस दिग्गज ने चेतावनी दी है कि किसी बड़े इवेंट में भारतीय एथलीटों को पोडियम स्थान पर इतनी जल्दी देखना सही नहीं होगा।

उन्होंने कहा, “अगर आप इस बात पर ध्यान दें तो हमारी जूनियर टीम वास्तव में अच्छा कर रही है। हमारे पास नीरज (चोपड़ा) हैं, जो एक जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक हैं। और फिर हिमा (दास) हैं, जो एक जूनियर विश्व चैंपियन है। लेकिन जूनियर और सीनियर स्तर के बीच एक बड़ा अंतर है। अगर वे अच्छा करना चाहते हैं, तो आपको उन्हें बहुत अच्छी ट्रेनिंग, सुविधाएं, कोचिंग और आत्मविश्वास दिलाना होगा। एक एथलीट को बेहतर बनाए जाना वाला हर पहलू बेहतर नहीं, सबसे अच्छा होना होगा। तब हम ओलंपिक पदक या वर्ल्ड्स के पदक के बारे में सोच सकते हैं।”

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