मैं कोई वन टाइम वंडर नहीं हूं - पीटी उषा

महज़ 0.01 सेकंड से ओलंपिक मेडल चूकने के बाद पीटी उषा ने मेहनत कर कई और मेडल भारत की झोली में डाले।

लेखक Olympic Channel Writer ·

भारत की ओर से ट्रैक एंड फील्ड में बहुत से खिलाड़ियों ने अपना जलवा दिखाया है, कुछ मेडल जीतने में कामयाब रहे तो कुछ बेहद क़रीब पहुंचकर चूक गए। उन्हीं में से एक नाम है पीटी उषा (PT Usha) का, उन जैसा रनर आज तक भारतीय इतिहास में कोई नहीं आया।

1984 ओलंपिक गेम्स के दौरान पीटी उषा 400 मीटर हर्डल रेस में चौथे स्थान पर रहीं थीं। यह भारतीय धावक ब्रॉन्ज़ मेडल से महज़ 1/100 सेकंड से चूक गईं। अगर उषा उस समय इस फासले को पार करने में सफल होती तो 20 साल की छोटी सी उम्र में वे एक लीजेंड बन जातीं।

भारत की इस एथलीट का कारवां तब बुलंदियों पर पहुंचा जब उन्होंने जकार्ता में हुए 1985 एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप (1985 Asian Athletics Championships) में 5 गोल्ड और एक ब्रॉन्ज़ मेडल को अपने नाम किया।

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए उषा ने बताया “मैंने सिर्फ एक चैंपियनशिप में मेडल नहीं जीते हैं। वह एक तुक्का नहीं था। 80 के दशक से लेकर लंबे अरसे तक मैंने भारत के लिए खेला है और गोल्ड मेडल भी जीते हैं। 1984 में मेरा खेल चरम पर था और मैंने एक के बाद एक गोल्ड मेडल जीते हैं चाहे वह एशियन गेम्स हों या एशियन चैंपियनशिप या फिर ग्रां प्री हो, मैंने हर जगह प्रदर्शन किया है।”

लॉस एंजिल्स 1984 में पीटी उषा ओलंपिक मेडल जीतने से केवल 0.01 सेकंड से चूक गईं।

उन्होंने आगे काहा “वह दौर भारतीय एथलेटिक्स के सिए एक सुनहरा समय था। इस समय को अच्छा बनाने में मेरा भी योगदान था क्योंकि मेरा नाम भी एक क्रिकेटर जितना लोकप्रिय हो गया था।’’

‘’यह एक गर्व की बात है कि भारत के बाहर भी इस भारतीय खिलाड़ी का नाम अदब से लिया जाता है। आज भी जकार्ता में अगर किसी स्थानीय दुकानदार को पता लगता है कि हम उस देश के निवासी हैं जिस देश से पीटी उषा ताल्लुक रखती हैं तो वे इज्ज़त देते हैं और भारी मात्रा में छूट भी देते हैं।’

लंदन की ट्रेनिंग रही फायदेमंद

पीटी उषा ने बहुत से लोगों को प्रेरणा दी है। जैसे जैसे नाम बढ़ता गया इस खिलाड़ी की मेहनत भी बढ़ती गई। अब बारी थी लंदन जा कर और ज़्यादा बेहतर तरीके से ट्रेनिंग करने की और उन्होंने ठीक वैसा ही किया। एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप (Asian Athletics Championships) से पहले उषा ने कोच ओम नांबियार (OM Nambiar) के साथ क्रिस्टल स्पोर्ट्स ट्रेनिंग सेंटर में पसीना बहाया।

पीटी उषा ने आगे बताया “मुझे वहां का बेकन पसदं आया। वह बहुत जूसी था और मैं उसे ब्रेकफास्ट के समय खाती थी। साथ ही अंडे, टोस्ट और सलाद का भी सेवन करती थी। रात के समय मैं भारतीय खाने के लिए बाहर जाती थी और चिकेन तंदूरी ओर चावल खाती थी। जब वहां अभ्यास करने का समय ख़त्म हुआ तो मैंने देखा कि मेरे हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ गया था।

इसी अभ्यास और मेहनत ने उन्हें जकार्ता में एक चैंपियन के तौर पर ला खड़ा किया। रिटायर होने तक पीटी उषा एक भारतीय दिग्गज बन गईं थीं, साथ ही वह टिंकू लुक्का (Tintu Lukka) और दुती चंद (Dutee Chand) जैसे बहुत से युवा धावकों की आज प्रेरणा भी हैं।