कोचिंग मेरे अंदर के जोश और जुनून को जिंदा रखती है – पुलेला गोपीचंद

पीवी सिंधु और साइना नेहवाल जैसी खिलाड़ियों को कोचिंग देने वाले ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन चैंपियन को अब IOC ने भी सराहा है।

भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल (Saina Nehwal) और पीवी सिंधु (PV Sindhu) ने जब क्रमश: लंदन 2012 और रियो 2016 में ऐतिहासिक ओलंपिक पदक जीते, तो इन दोनों की कामयाबी के पीछे एक ही शख्सियत थी और वह थे पुलेला गोपीचंद (Pullela Gopichand)।

वर्तमान में भारतीय बैडमिंटन टीम के मुख्य कोच के तौर पर कार्यरत गोपीचंद ने भारतीय बैडमिंटन को विश्व स्तर पर पहुंचाने का काम किया है। लेकिन जब उन्होंने 2003-04 में एक कोच के रूप में शुरुआत की थी तो वह निष्पक्ष तौर पर सभी को बढ़ावा देते थे।

तो आइए जानते हैं कि गोपीचंद को आगे बढ़ते रहने के लिए किसने प्रेरित किया?

पुलेला गोपीचंद ने भारतीय क्रिकेटर रविचंद्रन अश्विन (Ravichandran Ashwin) द्वारा होस्ट किए जा रहे यूट्यूब चैट शो 'DRS विद Ash' में कहा, “यह टूर्नामेंट के लिए की गई अपनी यात्राओं के दौरान मिले जीत के फॉर्मूले को इस्तेमाल करने की ज्वलंत इच्छा के जैसा था। लेकिन मैं खुद इसका इस्तेमाल नहीं कर सका, क्योंकि मेरा शरीर तब मुझे इसकी इजाजत नहीं दे रहा था।”

“जब मैंने ऑल इंग्लैंड (2001 में) जीता, तो मैंने अलग-अलग स्थानों की यात्रा की और दुनियाभर के बहुत से लोगों की सलाह और मार्गदर्शन से बहुत कुछ सीखा, लेकिन मुझे जल्द ही दो फ्रैक्चर (दाएं घुटने और दाएं टखने) में हुआ। फिर मैंने अपने घुटने की सर्जरी कराई और उसके बाद मैं वास्तव में खेलने के लिए वापस नहीं लौट सका।"

भारतीय बैडमिंटन कोच ने यह भी स्वीकार किया कि 30 वर्ष की कम उम्र में कोचिंग देने का निर्णय कुछ सीनियर खिलाड़ियों को सही नहीं लगा, लेकिन ऑल इंग्लैंड चैंपियन के रूप में गोपीचंद का सम्मान बढ़ गया और उसने उन युवाओं को भी आकर्षित किया, जो इस खेल को खेलना चाहते थे।

46 वर्षीय गोपीचंद ने बताया, “जब आप एक खिलाड़ी के रूप में अपना करियर खत्म करते हैं, तो मुझे लगता है कि आप लगभग किसी चट्टान से लटक रहे होते हैं और आप जानते हैं कि आपको गिरना होगा। यदि आप थोड़ी सी ऊर्जा रखते हुए चट्टान पर लौटने का निर्णय लेते हैं, तो आप कूदकर वापसी कर सकते हैं।”

"मुझे लगता है कि मैं अपने करियर के अंत में भाग्यशाली था। मैं कोचिंग में कूद गया और इससे मुझे आगे बढ़ने की ऊर्जा मिली।”

कोचिंग के शुरुआती दिन

खेल के लिए उनके जुनून ने उन्हें बैडमिंटन कोचिंग की दुनिया में पहुंचा दिया, हालांकि पुलेला गोपीचंद के दिमाग में इसके बारे में कोई उचित रास्ता तय नहीं था।

हालांकि उन्हें अकादमी के बारे में विचार तुरंत नहीं आया, भारतीय बैडमिंटन कोच ने इसकी शुरुआत हैदराबाद के कुछ इच्छुक युवाओं को सलाह देकर की।

पुलेला गोपीचंद ने याद करते हुए कहा, “अप्रैल 2004 में पहली बार मैंने बच्चों को रोज़ाना कोचिंग देना शुरू किया और शुरूआत में तो यह एक स्टार्ट-अप कंपनी की तरह था। मैं कई लोगों की भूमिका अकेले ही निभा रहा था, जैसे कि एक कोच, अभिभावक, फिजियो, ट्रेनर और यहां तक कि चौकीदार की भी।”

“वर्षों बाद मुझे वास्तव में पैसा मिला और चीजें धीरे-धीरे 2006-2007 के आसपास आकार लेने लगीं। हमारे पास तब अन्य कोच और फिजियो उपलब्ध थे। उनमें से कई एक दशक से अधिक समय से वहां हैं और अब कोर टीम का हिस्सा हैं।”

अकादमी की पहली बड़ी सफलता 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में मिली, जब साइना नेहवाल ने स्वर्ण पदक जीता और अब उनके पति बन चुके पारुपल्ली कश्यप ने कांस्य जीता। इसके बाद उन्होंने दो ओलंपिक पदक के साथ ही बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप में भारत को कई पदक दिलाने का काम किया।

2019 में गोपीचंद को भारत में बैडमिंटन के विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के कोच लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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