पुलेला गोपीचंद ने बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल और पीवी सिंधु के बारे में खोले कई राज़

उनकी दो सबसे सफल शिष्याएं एक-दूसरे से अलग हैं, कोच ने इस बारे में बात करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने कोर्ट पर उन्हें आक्रामक बनने की ट्रेनिंग दी।

साइना नेहवाल (Saina Nehwal) और पीवी सिंधु (PV Sindhu) ने भारतीय बैडमिंटन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम दर्ज करने का काम किया है। लेकिन उनकी इस सफलता के पीछे पुलेला गोपीचंद (Pullela Gopichand) ही थे, जिन्होंने ओलंपिक पदक की उम्मीदों जो जिंदा कर उसे हासिल करने में इन दोनों की मदद की थी।

भारतीय टीम के वर्तमान मुख्य कोच ने कम उम्र से ही भारत की दोनों बैडमिंटन खिलाड़ियों के साथ काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने हाल ही में खुलासा किया है कि जब बात भावना की आती है तो दोनों एक-दूसरे से अलग दिखाई देती थीं।

पुलेला गोपीचंद ने फ़र्स्टपोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में बताया, “सिंधु अंक हासिल करने के बाद चीखने या जश्न मनाने के मामले में कमजोर थीं। इसलिए, मुझे उसे ऐसा करना सिखाना पड़ा।”

“साइना को आक्रामक होने के लिए सिखाने की ज़रूरत नहीं थी, उसे उत्साहित करने के लिए कभी कोई समस्या नहीं हुई। जब भी वो आक्रामक बैडमिंटन खेलती थी तो वो सिर्फ स्मैश करती थी, वो शटल को टॉस भी नहीं करती थी, इसलिए मुझे उसे कई बार आराम-आराम से खेलने के लिए कहना पड़ता था।”

साइना नेहवाल और पीवी सिंधु का व्यवहार अलग-अलग है
साइना नेहवाल और पीवी सिंधु का व्यवहार अलग-अलग हैसाइना नेहवाल और पीवी सिंधु का व्यवहार अलग-अलग है

बैडमिंटन में आक्रामकता का महत्व

देखा जाए तो आमतौर पर इस शब्द का बोलचाल में नकारात्मक अर्थ है, पुलेला गोपीचंद का मानना ​​था कि इसकी वजह से मानसिक मज़बूती मिली, यही वजह है कि उनकी शिष्याओं ने इस तरह के पहलू पर ध्यान केंद्रित किया।

उन्होंने आगे कहा, “जब आपके सामने आपसे बड़ा खिलाड़ी कोर्ट पर हो तो आपको चुनौती देने के लिए आक्रामकता की ज़रुरत होती है। आपको उस समय उस आक्रामकता को महसूस करना होता है जब आप हार जाते हैं।”

पुलेला गोपीचंद खुद एक आक्रामक खिलाड़ी थे, जिन्होंने 2001 में ऑल इंग्लैंड ओपन जीता था, जिसकी वजह से वो प्रकाश पादुकोण (Prakash Padukone) के बाद ऑल इंग्लैंड ओपन का खिताब जीतने वाले सिर्फ दूसरे भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बन गए।

लगातार चोट ने उनके करियर को पटरी से उतार दिया, लेकिन उन्होंने अपने कोचिंग के दौरान कुछ तरीकों को सिखा, कुछ ऐसा जो भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ियों की धारणा को बदलने में मदद कर सके।

उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, “जिस साल मैंने ऑल इंग्लैंड ओपन का टाइटल जीता था, उस साल तीन सर्जरी करवाई थी लेकिन इसके बावजूद, मैं एक आक्रामक खिलाड़ी था, जो शटल पर आक्रमण करने के लिए तैयार रहता था। मुझे लगा की भारतीय खिलाड़ियों को इसी तरह से खेलने की जरूरत है।”

उन्होंने आगे कहा, “खिलाड़ियों को उनकी ताक़त और उन्हें दुनिया के सबसे अच्छे खिलाड़ी होने का विश्वास दिलाने से भारतीय बैडमिंटन को उच्च स्तर तक ले जाया जा सकता है। हमें कोर्ट में तेज़-तर्रार बैडमिंटन खेलने की जरूरत है। यदि आप वर्तमान पीढ़ी को देखते हैं तो साइना या सिंधु बेहतरीन खिलाड़ी हैं और वो शारीरिक रूप से भी फिट हैं।"

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