प्रकाश पादुकोण: वेडिंग हॉल में ट्रेनिंग लेने से ऑल इंग्लैंड चैंपियन बनने तक का सफ़र

इस पूर्व शटलर ने अपने पिता के साथ मनोरंजन के तौर पर बैडमिंटन खेलना शुरू किया, लेकिन उनकी अद्भुत क्षमताओं ने उन्हें इसे एक पेशेवर करियर के रूप में चुनने के लिए सक्षम बना दिया।

प्रकाश पादुकोण (Prakash Padukone) ने जब 1980 में ऑल इंग्लैंड जीता, उसी के बाद भारतीय बैडमिंटन के एक नए युग की शुरुआत हुई।

1978 में कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड और भारत में राष्ट्रीय खिताब के बाद एक प्रतिष्ठित चैंपियनशिप में जीत इस भारतीय बैडमिंटन स्टार के करियर का यादगार हिस्सा रहा।

हालांकि, जब 7 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ 1962 में यह खेल खेलना शुरू किया, तो बहुत से लोग इस शटल खेल के बारे में जानते भी नहीं थे।

पादुकोण ने Scroll.in के साथ एक वीडियो चैट में खुलासा करते हुए कहा, “उस वक्त एक और खेल था जिसे बॉल बैडमिंटन कहा जाता था, जो कि दक्षिण में बहुत लोकप्रिय था। यह एक आउटडोर स्पोर्ट था, जिसमें हर टीम में पांच खिलाड़ी एक पीली गेंद के साथ खेलते थे। इसलिए यह खासतौर पर बताना होता है कि यह शटल बैडमिंटन था।”

उनके पिता रमेश उन कुछ लोगों में से एक थे जिन्होंने बैडमिंटन को खेला और इस खेल के लिए बने पहले स्टेट एसोसिएशन का हिस्सा रहे। यही वह बात थी जिसने प्रकाश पादुकोण का रुख बैडमिंटन की ओर कर दिया। फिर उन्होंने एक वेंडिंग हॉल में राज्य के अन्य खिलाड़ियों के साथ ट्रेनिंग करते हुए अपने खेल कौशल को बेहतर किया।

पूर्वा भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी ने समझाते हुए कहा, "मेरे पिता मुझे और मेरे दोस्तों को पास के ही एक क्लब में ले गए, जो वास्तव में एक मैरिज हॉल था। राज्य के कुछ अन्य खिलाड़ी भी उसी हॉल में खेल रहे थे, इसलिए मैंने सिर्फ खेल को देखा। उस समय मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि मैं भी खेलने जाऊंगा। यह उसके लिए (बैडमिंटन) प्यार से कहीं अधिक था। कोई लक्ष्य या महत्वाकांक्षा नहीं थी, कोई उद्देश्य भी नहीं था। बस खेल का आनंद लेना होता था।"

जीवन में बस आगे बढ़ते जाएं

जल्द ही युवा प्रकाश पादुकोण ने राज्य स्तर के टूर्नामेंट में खेलना शुरू कर दिया और एक सफल पेशेवर करियर बनाने की बड़ी छलांग उन्होंने तब लगाई, जब उन्होंने 17 साल की उम्र में जूनियर और सीनियर दोनों राष्ट्रीय खिताब अपने नाम कर लिए।

पादुकोण ने कहा, “एक सप्ताह के भीतर मैंने मेंस सिंगल्स और ब्वायज़ सिंगल्स दोनों जीत लिए और मैं ब्वाय्ज़ डबल्स में रनर अप रहा। यहीं से मेरा सफर शुरू हुआ।”

भारतीय बैडमिंटन स्टार ने लगातार नौ साल तक नेशनल चैंपियनशिप जीती और जब ऑल इंग्लैंड खिताब जीतने के बाद उन्होंने 1981 में डेनमार्क के एक क्लब के लिए खेलने का ऐतिहासिल कदम उठाया तो इसने भारतीय शटलरों के लिए यूरोपीय रास्ते भी खोल दिए।

उन्होंने कहा, '' आपको जीवन में वैसे ही आगे बढ़ना होता है, जैसे कि आपको अवसर मिलते हैं। मेरे करियर में, मेरे जीवन में, मैं हमेशा बहुत सकारात्मक सोच रखी है। मुझे याद है जब मैं बहुत छोटा था तो मेरे पिता ने मुझे बताया था कि यह सब तुम्हारे पास है। चाहे शादी का हॉल हो या जो भी हो। इसलिए उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करो, जो आपके बस में हैं।”

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