खेल सिर्फ़ चैंपियन बनने के बारे में नहीं है: पुलेला गोपीचंद

बैडमिंटन के बेहतरीन कोच का मानना है कि खेल मज़ेदार होना चाहिए, इसे सिर्फ़ शिखर तक पहुंचने के लिए एक माध्यम नहीं समझना चाहिए।

भारतीय बैडमिंटन कोच और पूर्व खिलाड़ी पुलेला गोपीचंद (Pullela Gopichand) ने अपनी अकादमी के ज़रिए इस खेल में कई होनहार प्रतिभाओं को निखारने का काम किया है। साइना नेहवाल (Saina Nehwal) और पीवी सिंधु (PV Sindhu)के ओलंपिक पदक हासिल करने में भी उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है।

बीते कुछ वर्षों में भारतीय बैडमिंटन को विश्व स्तर पर आगे बढ़ाने में उनका बड़ा हाथ रहा है। पुलेला गोपीचंद का मानना है कि खेल को केवल जीत हासिल करने के लिए ही बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।

मुंबई मिरर से बात करते हुए उन्होंने कहा, “प्रतिस्पर्धात्मक खेलों ने एक ऐसा मोड़ ले लिया है कि लोगों ने अपने स्वास्थ्य और मनोरंजन के लिए खेल को खेलने की सोच को खो दिया है। आज हममें से कितने लोग खेल को सिर्फ खुशी हासिल करने के लिए खेलेंगे और जीत के बारे में नहीं सोचेंगे?”

उन्होंने आगे कहा, “हमें खेल के मूल भाव को फिर से समझने की जरूरत है, जो आत्म अनुशासन और मन से शरीर को जोड़ने का अहम काम करता है। एक खेल चैंपियन बनने के विचार से बहुत परे है। हमें यह देखना चाहिए कि खेल लोगों को कैसे बनाता है, न कि उन्हें तोड़ता है।”

2016 रियो ओलंपिक में पी वी सिंधु के कोच थे पुलेला गोपीचंद
2016 रियो ओलंपिक में पी वी सिंधु के कोच थे पुलेला गोपीचंद2016 रियो ओलंपिक में पी वी सिंधु के कोच थे पुलेला गोपीचंद

सोच को बदलने की ज़रूरत

कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी की वजह से देशभर में लागू लॉकडाउन ने सभी गतिविधियों पर विराम लगा दिया है। भारत में इसे दूसरी बार बढ़ाया गया है। इसने कुछ खिलाड़ियों को मुश्किल में डाल दिया है, वह इस बात से अनजान हैं कि अपनी खेल की नियमित दिनचर्या में वह वापस कब लौटेंगे।

ऐसे खिलाड़ियों को पुलेला गोपीचंद ने एक आसान सी सलाह दी। भारतीय बैडमिंटन कोच ने कहा, "मुझे लगता है कि हम सभी एक लक्ष्य के पीछे भाग रहे हैं, जो अगले सप्ताह, महीने या वर्ष में आने वाली किसी चीज़ के लिए प्रेरित करता है। अब हमारी सोच इसके विपरीत होनी चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, "आपको अपनी दैनिक दिनचर्या पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मसलन सुबह उठना है और सबसे अच्छा काम करना है, जो आप आज कर सकते हैं। बाकी सब अपने हिसाब से होगा।"

46 वर्षीय कोच, जो 2001 में (प्रकाश पादुकोण के बाद) प्रतिष्ठित ऑल इंग्लैंड ओपन जीतने वाले महज़ दूसरे भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, उन्होंने एथलीटों को चेतावनी देते हुए कहा कि इस महामारी को अपने खराब प्रदर्शन का कारण बताना सही नहीं होगा।

उन्होंने कहा, "यह बेहद महत्वपूर्ण है कि आप इससे नकारात्मकता को करीब न आने दें, बल्कि इस बात पर ध्यान केंद्रित करें कि आप क्या कर सकते हैं। इस नुकसान को एक बहाना नहीं मानिए। आप इस बहाने से बाहर निकलिए कि मुझे जरूरी अभ्यास का मौक़ा नहीं मिला है।"

"कभी-कभी आपके पास सबसे अच्छी सुविधाएँ होती हैं, फिर भी आप असफल हो सकते हैं। कभी-कभी आपके पास कुछ भी नहीं होता है और उसके बावजूद आप जीत जाते हैं। लेकिन यह केवल तभी संभव है जब आपके काम करने की लगन बहुत अधिक हो।”

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