बैडमिंटन

एक नए युग की शुरूआत: अपने पहले ही ओलंपिक में पीवी सिंधु ने पार की थी सिल्वर लाइन

पीवी सिंधु ने भारत के लिए पहला ओलंपिक बैडमिंटन रजत पदक जीतकर इतिहास रचा था, और इस कारनामे में उन्हें रातों-रात स्टार खिलाड़ी बना दिया।

लेखक विवेक कुमार सिंह ·

भारतीय बैडमिंटन की झोली में पहला ओलंपिक पदक तब आया, जब साइना नेहवाल (Saina Nehwal) ने लंदन 2012 में कांस्य पदक अपने नाम किया।

इसने आने वाले सालों में बैडमिंटन ने कई प्रतिभावान खिलाड़ियों को तराशने में सफलता प्राप्त किया। जिसका परिणाम चार साल बाद देखने को मिला, जब 21 साल की युवा खिलाड़ी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए देश को फिर से ओलंपिक का पदक दिलाया। 

19 अगस्त, 2016 को, पीवी सिंधु (PV Sindhu) ने 2016 के रियो ओलंपिक में फाइनल में प्रवेश किया, लेकिन अंततः ओलंपिक रजत के साथ उनका सफर समाप्त हो गया। सिंधु के इस यादगार प्रयास की वजह से दुनिया और भारत के लिए एक नए स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी का जन्म हुआ।

ये दुनिया के दर्शकों के लिए एक आश्चर्यजनक जीत हो सकती है लेकिन सिंधु रियो 2016 ओलंपिक तक लगातार शानदार प्रदर्शन कर रही थी।

रियो 2016 के सफर पर एक नज़र

पुसरला वेंकट सिंधु का जन्म एथलीटों के परिवार में हुआ था, जिसमें उनके माता-पिता दोनों भारतीय वॉलीबॉल टीम का प्रतिनिधित्व करते थे। उसकी बड़ी बहन एक राष्ट्रीय स्तर की हैंडबॉल खिलाड़ी थी।

लेकिन बैडमिंटन ने सिंधु का ध्यान आकर्षित किया और वह आखिरकार ऑल इंग्लैंड चैंपियन और भारतीय बैडमिंटन के दिग्गज पुलेला गोपीचंद (Pullela Gopichand) के पास अपने कौशल को और निखारने के लिए गईं।

पुलेला गोपीचंद की कोचिंग में पीवी सिंधु ने रियो 2016 में रजत पदक जीता।

युवा शटलर के स्पोर्ट्स का ज़ज़्बा इस बात से ही नजर आता है, जब पता चलता है कि वो गोपीचंद की बैडमिंटन अकादमी में 56 किलोमीटर की यात्रा करके जाती थीं, जिससे उनका खेल के प्रति असीम समर्पण और जुनून दिखाई देता है। जल्द ही इसका परिणाम भी मिला, जब सिंधु ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपना प्रभाव बनाना शुरू कर दिया।

2012 में उन्होंने बैडमिंटन एशिया अंडर -19 का खिताब जीता, जिसमें उन्होंने चाइना मास्टर्स में लंदन 2012 की स्वर्ण पदक विजेता ली ज़ुआरुई को हराने से पहले अपनी प्रतिद्वंद्वी नोज़ोमी ओकुहारा को हराया था।

ली ज्यूरुई के खिलाफ जीत भारतीय के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।

इसके बाद और अधिक सफलता मिली, जिसमें उनका पहला ग्रां प्री गोल्ड खिताब, विश्व चैंपियनशिप में भारत का पहला महिला एकल पदक और एक राष्ट्रमंडल खेल पुरस्कार शामिल है।

उन्होंने कोपेनहेगन में 2014 विश्व चैंपियनशिप में दूसरा कांस्य पदक जीता, जहां वो सेमीफाइनल में कैरोलिना मारिन से हार गई थी। ये वो नाम है, जिसे पीवी सिंधु के ऐतिहासिक पल में लिया जाएगा।

रियो में एक अविश्वसनीय सफर

एक 21 वर्षीय युवा शटलर सो कोई भी उतनी उम्मीद नही कर रहा था और न ही उनके बारे ममें ज्यादा कोई जानता था।

भारतीय बैडमिंटन स्टार बड़े टूर्नामेंट में अच्छा प्रदर्शन कर रही थी, लेकिन 2015 में समर खेलों के लिए जगह बनाने के लिए उन्हें एक गंभीर टेंसन फ्रैक्चर को दूर करना पड़ा था।

इसलिए, जब साइना नेहवाल - उस समय की भारतीय बैडमिंटन स्टार खिलाड़ी - यूक्रेन की मारिया उलीतिना के खिलाफ हार के बाद ग्रुप स्टेज में बाहर हो गई, तो अधिकांश दर्शकों ने बैडमिंटन में एक और पदक की उम्मीद लगाई।

हालांकि, सायना नेहवाल के बाहर होने से जो ध्यान केंद्रित हुआ था, उससे प्रोत्हासित होने के बजाय, सिंधु ने उसे दबाव के रूप में ले लिया।

“मैं शुरू से ही पदक के बारे में नहीं सोच रही था। कठिन ड्रॉ को देखते हुए, मुझे पता था कि मुझे एक समय में एक मैच के बारे में सोचना होगा।”

पीवी सिंधु को हंगरी के लौरा सरोसी और कनाडा की मिशेल ली के साथ एक समूह में रखा गया था।

भारतीय शटलर ने अपने पहले मैच में लॉरा सरोसी को 21-8, 21-9 से हराकर जीत हासिल की। उसके बाद पीवी सिंधु ने मिशेल ली के खिलाफ अपना शानदार खेल दिखाया, उन्हें सिंधु ने 19-21, 21-15, 21-17 से हराकर अंतिम 16 में प्रवेश किया।

प्री-क्वार्टर जैसी जीत पीवी सिंधु ने अभी तक नहीं हासिल की थी, जहां उन्होंने चीनी ताइपे की ताई त्ज़ु-यिंग को 21-13, 21-15 से हराया। शटलर का अविश्वसनीय फॉर्म जारी रहा, जहां उन्होंने दो साल में दूसरी बार वांग यिहान को 22-20, 21-19 हराया और सेमीफाइनल में प्रवेश किया।

फाइनल में उनका इंतजार दूसरी वरीयता प्राप्त नोज़ोमी ओकुहारा कर रही थीं, जिन्हें पीवी सिंधु ने केवल एक बार हराया था और उनके खिलाफ वो पूरे तीन गेम तक खेलती थीं।

हालांकि ये हैदराबादी शटलर शानदार फॉर्म में थीं, उन्होंने ओकुहारा से कई गलतियां करवाई और मैच 21-19, 21-10 से जीत लिया।

यह पहली बार था जब सिंधु ने जापानी खिलाड़ी को सीधे गेमों में हराया था और फाइनल में प्रवेश किया। इससे पहले कोई भी भारतीय शटलर ओलंपिक के फाइनल तक नहीं पहुँचा था।

मैराथन मैच में सिंधु ने की पूरी कोशिश

फाइनल में पीवी पीवी सिंधु को दो बार की विश्व चैंपियन और विश्व नंबर 1 कैरोलिना मारिन के खिलाफ खेलना था।

ये खिलाड़ियों और दर्शकों के लिए सांस रोक देने वाला मुक़ाबला था और पीवी सिंधु ने शानदार शुरुआत की और शुरुआती गेम में जीत हासिल की।

हालांकि, मारिन ने दूसरे गेम अच्छी वापसी की - स्पेनिश शटलर कोर्ट में शानदार स्मैश लगा रहा थीं। दूसरे गेम को मारिन ने केवल 20 मिनट में जीत लिया।

पीवी सिंधु ने डीएनए वेबसाइट को बताया, "कैरोलिना दूसरे में इतना अच्छा खेल रही थी।" "मैं बस चलो खेलते हैं 'की तरह खेल रही थी, लेकिन तब भी मैंने इसे ऐसे ही नहीं छोड़ा और बहुत प्रयास किया।"

शीर्ष वरीयता प्राप्त मारिन को जोरदार टक्कर देने वाली पीवी सिंधु को फाइनल गेम में हार का सामना करना पड़ा और इस तरह मैच 19-21, 21-12, 21-15 से कैरोलिना ने अपने नाम कर लिया। इसके साथ ही ओलंपिक स्वर्ण पदक भी कैरोलिना मारिन ने जीत लिया।

भारतीय ने कहा कि, "मैंने अंत तक हार नहीं मानी," “मैं 16-19 से वापस आई और पहला गेम जीतने के लिए पांच सीधे अंक हासिल किए। इसलिए, यह हमेशा मेरे दिमाग में चल रहा था कि कुछ भी हो सकता है।”

पीवी सिंधु भले ही फाइनल में हार गई हों, लेकिन वो ओलंपिक रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बन गईं, और सबसे कम उम्र की भी।

पीवी सिंधु के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ओलंपिक पदक ने उन्हें भारतीय बैडमिंटन का स्टार खिलाड़ी बना दिया।

''रियो ओलंपिक पदक के बाद कोर्ट पर जीवन बदल गया है। मुझे अब कोर्ट पर बहुत भरोसा है और लगता है कि कुछ भी संभव है।''

उन्होंने उस आत्मविश्वास को हासिल किया और इसके साथ आगे बढ़ रही हैं, जिसकी झलक BWF वर्ल्ड चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियाई खेलों में दिखाई दिया। 

2019 में, पीवी सिंधु ने अपना और भारत का बीडब्ल्यूएफ विश्व चैंपियनशिप का स्वर्ण जीता और कैरोलिना मारिन से विश्व चैंपियन का खिताब हासिल किया, जिसने रियो ओलंपिक के फाइनल में पीवी सिंधु को हराया था। 

पिछले कुछ वर्षों में, पीवी सिंधु सबसे बड़ी बैडमिंटन प्रतियोगिताओं में एक निरंतर खिलाड़ी के रूप में उभरी हैं। टोक्यो ओलंपिक में वो इस बार पोडियम के शीर्ष पर चढ़ना चाह रही हैं।