पीवी सिंधु के लिए अपने माता-पिता से मिले सहयोग से बढ़कर कुछ भी नहीं

रियो 2016 की रजत पदक विजेता का मानना है कि उनके परिवार ने उन्हें बैडमिंटन के इस खेल में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लेखक रितेश जायसवाल ·

रियो ओलंपिक की रजत पदक विजेता पीवी सिंधु (PV Sindhu) का मानना है कि आप किसी खेल के उच्च स्तर पर अकेले नहीं पहुंचते हैं, इसके पीछे एक टीम का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इस भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी के अनुसार टीम का हर एक सदस्य, चाहे वह कोच हो, सहायक कर्मचारी हो या फेडरेशन, यह सुनिश्चित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि एथलीट सफलता की सीढ़ियों को लगातार चढ़ता जाए। 

लेकिन पीवी सिंधु के करियर में उनके माता-पिता ने जो योगदान दिया है उसकी बराबरी कोई भी नहीं कर सकता है। सिंधु को चैंपियन बनाने में उन्होंने बहुत अहम भूमिका निभाई है।

भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के नव नियुक्त सहायक निदेशकों से बात करते हुए वर्ल्ड चैंपियन पीवी सिंधु ने कहा कि वह धन्य हैं कि उन्हें ऐसे माता-पिता मिले, जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं।

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उनके पिता रमाना अर्जुन पुरस्कार विजेता हैं और वह 1986 के एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय वॉलीबॉल टीम का हिस्सा थे, जबकि उनकी माँ एक राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी थीं।

पीवी सिंधु ने कहा, “माता-पिता किसी भी एथलीट की सफलता में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वे एक बच्चे की मानसिक स्थिति को दूसरों से बेहतर समझते हैं। मैं अपने पिता के साथ अपने मैच देखने में बहुत समय बिताती हूं और अन्य खिलाड़ियों के मैच देखकर उनके खिलाफ अपनी रणनीति और योजना को तैयार करती हूं।”

करियर की शुरुआत में माता-पिता बने सहारा

पीवी सिंधु ने अपने करियर की शुरुआत में जो संघर्ष किया उसके बारे में लगभग सभी लोग जानते हैं। जो नहीं जानते हैं उनको बता दें कि यह उनके पिता ही थे जो उन्हें ट्रेनिंग के लिए रोज़ाना गोपीचंद अकादमी ले जाते थे।

सिंधु ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा, “शुरुआत में मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती रोज़ाना 120 किलोमीटर (सिकंदराबाद स्थित घर से अकादमी तक जाना और वापस आना) का सफर था। मेरे पिता ने अपनी रेलवे की नौकरी से लंबी छुट्टी ले ली थी, जिससे कि वह मेरी कमियों को दूर कर मेरी मदद कर सकें।”

इस 24 वर्षीय खिलाड़ी ने उस तालमेल और रिश्ते पर भी जोर दिया जो एक शटलर को अपने कोच के साथ बनाए रखने की आवश्यकता होती है। हालांकि सिंधु का मानना है कि ‘कोचों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी खिलाड़ी प्रशिक्षण और मैचों के दौरान अपना सर्वश्रेष्ठ दें’, इसके अलावा उन्हें खिलाड़ियों की मेहनत का सम्मान करना चाहिए और उनके सफर को बीच में नहीं खत्म करना चाहिए।

सिंधु ने उम्मीद जताते हुए कहा, “कोचों में निरंतरता होनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से अधिकांश सीनियर कोच अपने कॉन्ट्रैक्ट के खत्म होने से पहले ही चले जाते हैं।”

हाल के दिनों में भारत के युगल कोच फ्लैंडी लिम्पेले (Flandy Limpele) ने व्यक्तिगत कारणों से सीज़न की शुरुआत में ही अपने पद को छोड़ दिया। इससे पहले 2019 में पीवी सिंधु को वर्ल्ड चैंपियनशिप का खिताब जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले दक्षिण कोरियाई कोच किम जी ह्यून (Kim Ji Hyun) ने सितंबर में अपना पद छोड़ दिया था, जबकि पिछले युगल कोच तन किम हर (Tan Kim Her) ने पिछले मार्च में ही अपनी नौकरी छोड़ दी थी।