जानिए कैसे कॉलेज टीचर ने पूजा रानी को दिखाया ओलंपिक खेलों का सपना

भारतीय बॉक्सर ने साथ ही यह भी बताया कि उनके माता-पिता चाहते थे कि वह बॉक्सिंग के इस खेल को छोड़ दें, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उन्हें चोट न लग जाए।

अगले साल टोक्यो में पहली बार ‘खेलों के महाकुंभ’ में हिस्सा लेने के लिए तैयार भारतीय मुक्केबाज पूजा रानी (Pooja Rani) अपने ओलंपिक सपने को पूरा करना चाहेंगी। लेकिन अगर उनके कॉलेज के लेक्चरर ने उन्हें बॉक्सिंग के लिए प्रेरित नहीं किया होता तो शायद आज वह अपने जीवन में किसी और राह पर आगे बढ़ रहीं होतीं।

29 वर्षीय यह मुक्केबाज़ जॉर्डन में हुए एशियन ओलंपिक बॉक्सिंग क्वालिफायर में 75 किग्रा महिला वर्ग के क्वार्टर फाइनल में थाईलैंड की पोर्निप्पा चट्टी (Pornnipa Chutee) को हराकर आने वाले ओलंपिक खेलों का टिकट हासिल करने वाली पहली भारतीय मुक्केबाज़ बनी।

उन्होंने यह जीत इस साल की शुरुआत में 8 मार्च को महिला दिवस के अवसर पर हासिल की थी। खास बात यह है कि वह एक महिला ही थी, जिसने पूजा रानी के जीवन को बॉक्सिंग की ओर मोड़ दिया था। 

महिला दिवस पर परिभाषित जीत 8 मार्च को हुई - इस वर्ष की शुरुआत में और उत्सुकता से, यह पूजा रानी के जीवन की महिलाओं में से एक थी जिसने उसे मुक्केबाज़ी की ओर मोड़ दिया।

हाल ही में इंस्टाग्राम लाइव सेशन के दौरान पहलवान संग्राम सिंह से बात करने हुए उन्होंने खुलासा किया, "मुझे मुक्केबाज़ी में कोई दिलचस्पी नहीं थी और इस खेल के बारे में भी नहीं पता था। मैं एक बास्केटबॉल खिलाड़ी थी, लेकिन मेरे कॉलेज के दिनों के दौरान, मेरी एक लेक्चरर और बॉक्सिंग कोच की पत्नी (मुकेश रानी) ने मुझे देखा और एक इंटर-कॉलेज बॉक्सिंग टूर्नामेंट में प्रतिस्पर्धा करने के लिए मुझे भेज दिया। मुझे इसमें हिस्सा लेने के लिए लगभग मजबूर किया गया था, लेकिन टूर्नामेंट में मैं रजत पदक जीतने में कामयाब रही।”

उन्होंने आगे कहा, "मेरे पहले मैच के दौरान जब मेरी प्रतिद्वंदी ने पहली बार मुझ पर हमला किया, तो मैंने अपनी लेक्चरर और अपने कोच को देखा और कहा कि मैं खेलना नहीं चाहती हूं, वह मुझे मार रही है।”

हालांकि शुरुआती झिझक के बाद यह पहला मैच उनके जीवन में एक नया मोड़ लेकर आया। फिर बाउट खत्म होने के बाद उनके कोच ने कैसे भी करके उन्हें बॉक्सिंग को करियर के तौर पर चुनने के लिए राज़ी कर ही लिया।

सामने आई एक नई चुनौती

मुकेश रानी वास्तव में संजय श्योराण की पत्नी थीं, जो कि एशियाई स्वर्ण पदक विजेता और अर्जुन पुरस्कार विजेता मुक्केबाज़ हवा सिंह के बेटे थे। अभिनेता सूरज पंचोली ने उस वर्ष उनपर एक बायोपिक बनाए जाने की घोषणा भी की थी।

संजय श्योराण भी उनकी पत्नी की तरह पूजा रानी के गुरु बन गए। उन्होंने उन्हें एक सफल बॉक्सर के लिए एक कोच के तौर पर अहम भूमिका निभाई। यही नहीं उन्होंने हर तरह से जीवन में उन्हें आगे बढ़ने में मदद भी की।

जहां पूजा रानी बॉक्सिंग रिंग में उतरने के लिए पूरी तरह आश्वस्त थीं, वहीं उनके माता-पिता अपनी बेटी के इस कॉम्बैट स्पोर्ट (लड़ाई वाले खेल) को चुनने के फैसले के बिल्कुल खिलाफ थे।

उन्होंने कहा, "मेरे पिता को मेरी मुक्केबाज़ी के बारे में जानकारी नहीं थी, क्योंकि वे हरियाणा पुलिस में थे और अपनी ड्यूटी की वजह से वह ज्यादातर बाहर ही रहते थे। जब उन्हें पता चला तो उन्होंने मुझसे कहा कि मैं बॉक्सिंग ट्रेनिंग के लिए जाना बंद कर दूं और कोई दूसरा खेल खेलूं। मैं उनके इस निर्णय से खुश नहीं थी। मेरी मां भी मेरे खिलाफ थीं, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं मुझे चोट न लग जाए।"

इस मुद्दे को सुलझाने के लिए फिर संजय श्योराण आगे आए और बॉक्सिंग को करियर के तौर पर चुनने के लिए पूजा रानी की राह को आसान बनाया।

उन्होंने बताया, “मेरे पिता को पहले मेरे कोच से बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन बाद में मैंने उन्हें मना लिया। मेरे कोच ने मेरे पिता को आश्वासन दिया कि वह अपनी बेटी की तरह मेरी देखभाल करेंगे।”

लंदन 2012 और रियो 2016 में अपनी जगह बना पाने से चूक गईं पूजा रानी अगले साल टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाले नौ भारतीय मुक्केबाज़ों में से एक हैं।

इस साल की शुरुआत में हुए बॉक्सिंग क्वालिफायर के पहले राउंड में उन्हें बाई मिला और अपने थाई प्रतिद्वंदी को क्वार्टर-फाइनल में 5-0 से हराकर ओलंपिक खेलों का अपना पहला टिकट हासिल किया।

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