भारतीय दिग्गज मुक्केबाज़ विजेंदर सिंह की ज़ुबानी जानिए उनकी ओलंपिक की विजयी गाथा 

2008 ओलंपिक गेम्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने वाले भारतीय बॉक्सर विजेंदर सिंह का मानना है कि जीवन में शॉर्टकट नहीं बल्कि मेहनत ही मुक़ाम तक ले जाती है।

असल खिलाड़ी वह ही होता है जो मैदान-ए-जंग में गिरकर भी खड़ा हो जाए। ऐसा ही कुछ हुआ है पूर्व भारतीय बॉक्सर विजेंदर सिंह (Vijender Singh) के साथ। उन्होंने इस बात को स्वीकार भी किया है कि कभी अपने जीवन में कोई शॉर्टकट नहीं लिया और हर हार के बाद ही खेल की बारीकियों को सीखा।

बीजिंग 2008 में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने वाले इस बॉक्सर ने टेबल टेनिस खिलाड़ी मुदित दानी को इंस्टाग्राम लाइव चैट के दौरान कहा, “सच्चाई काम आती है। वहां ऐसे लड़के थे जो लिफ्ट लिया करते थे, लेकिन मैं आखिर तक दौड़ा करता था। उस समय मुझे गुस्सा आता था लेकिन फिर भी मैंने कभी शॉर्टकट नहीं लिया। मैं कम से कम दुनिया को बता सकता हूं कि मैंने 30 किमी पूरा दौड़ा है।”

“ज़िन्दगी आसान नहीं है। सब्र रखें और अपनी मेहनत करते रहें।”

बीजिंग से पहले का माहौल

एमेच्योर बॉक्सिंग में नाम कमाने के बाद विजेंदर सिंह ने 2015 में प्रोफेशनल बॉक्सिंग की ओर रुख किया और उन्हें लगता है कि उन्होंने अपनी हार से भी बहुत कुछ सीखा है।

एथेंस 2004 में क्वालिफाई करने के बाद उनका ओलंपिक गेम्स का कारवां पहले ही राउं के बाद ख़त्म हो गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इसके बाद 2008 बीजिंग ओलंपिक गेम्स के लिए उन्होंने खुद को एक मुख्य दावेदार बना लिया था।।”

विजेंदर सिंह ने बताया कि बीजिंग के लिए क्वालिफाई करना ही असल चुनौती थी 
विजेंदर सिंह ने बताया कि बीजिंग के लिए क्वालिफाई करना ही असल चुनौती थी विजेंदर सिंह ने बताया कि बीजिंग के लिए क्वालिफाई करना ही असल चुनौती थी 

2006 एशियन गेम्स (2006 Asian Games) में ब्रॉन्ज़ मेडल, 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स (2006 Commonwealth Games) में सिल्वर और 2007 एशियन चैंपियनशिप (2007 Asian championships) में मिले सिल्वर मेडल ने बॉक्सर विजेंदर सिंह को भारत में हीरो बना दिया था। हालांकि, ओलंपिक में सफलता हासिल करने के लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी।
भिवानी के बॉक्सर ने आगे कहा, “मुझे लगता है कि हार आपको जीत से ज़्यादा सिखा सकती है। 2007 में जब हम शिकागो में थे तब मैं पहला राउंड हार गया था। पहले तो लग रहा था कि मैं मेडल पक्का जीतूंगा और सब कह रहे थे कि विजु पहले क्वालिफायर में ही सफल हो जाएगा।”

विजेंदर ने आगे अल्फ़ाज़ साझा करते हुए कहा, “पहला क्वालिफायर हारने के बाद मेरे ऊपर बहुत दबाव था, बल्कि बैंकॉक में दूसरा हारने से भी ज़्यादा दबाव पहले क्वालिफायर के समय था।” 

“उस समय पटियाला कैम्प में ट्रेनिंग करते समय अपने आखिरी मौके के बारे में सोच रहा था।” ग़ौरतलब है कि कज़ाकिस्तान में हुए दूसरे एशियन क्वालिफिकेशन में विजेंदर सिंह ने ओलंपिक गेम्स में अपनी जगह बना ली और साथ ही प्रतियोगिता (बीजींग ओलंपिक गेम्स) में ब्रॉन्ज़ मेडल भी जीता।

क्या आपको यह आर्टिकल पसंद आया? इसे अपने दोस्तों के साथ साझा करें!