आशीष कुमार का दृढ़ संकल्प उनकी सफलता की राह को बना रहा आसान

भारतीय मुक्केबाज़ ने कुछ खराब परिणामों के बाद इस खेल को छोड़ने का विचार बना लिया था।

भारतीय मुक्केबाज़ आशीष कुमार (Ashish Kumar) के लिए साल 2019 बेहद शानदार रहा था। बीते दशक के एक बड़े हिस्से में बेहतर परिणाम हासिल करने से जूझ रहे इस 25 वर्षीय मुक्केबाज़ ने आखिरकार इसी वर्ष रिंग में शानदार प्रदर्शन करना शुरू किया।

उन्हें एशियाई चैंपियनशिप में एक रजत पदक, थाईलैंड ओपन में एक खिताब और वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी सराहनीय प्रदर्शन करते हुए देखा गया। आशीष कुमार ने 75 किग्रा वर्ग में एक शानदार भारतीय दावेदार के रूप में खुद को स्थापित किया। आपको बता दें, इसी वर्ग ने देश को विजेंदर सिंह (Vijender Singh) और विकास कृष्ण (Vikas Krishan) जैसे सितारे दिए हैं।

इन बेहतरीन सितारों के बाद सुंदरनगर के इस मुक्केबाज़ ने एक बार फिर से इस साल की शुरुआत में एशियन ओलंपिक बॉक्सिंग क्वालिफायर में शानदार प्रदर्शन करते हुए टोक्यो ओलंपिक के लिए टिकट हासिल किया।

लेकिन उनकी यह उपलब्धि बड़े संघर्षों के बाद उनके हिस्से में आई है। कुछ साल पहले एक ऐसा समय आया था जब उन्होंने इस खेल को छोड़ने का भी विचार कर लिया था।

पहलवान से अभिनेता बने संग्राम सिंह (Sangram Singh) ने आशीष कुमार के साथ एक इंस्टाग्राम लाइव सेशन में अपनी कहानी सुनाते हुए कहा, “जब मैंने जूनियर स्तर पर मुक्केबाज़ी शुरू की तो मुझे लगा कि यह आसान होगा, क्योंकि मैं हमेशा सभी पर भारी पड़ता था। लेकिन जब मैं नेशनल लेवल पर पहुंचा तो अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं दे सका।”

“मैं लगभग हर प्रतियोगिता में अपना पहला, दूसरा या तीसरा मुक़ाबला हार जाता था और टूर्नामेंट से बाहर हो जाता था। मुझे लगा कि मैं इस खेल के लिए नहीं बना हूं और मुझे इससे कुछ हासिल नहीं होगा।”

अपनी किशोरावस्था की शुरुआत में आशीष कुमार अपने परिवार को समझाने में कामयाब रहे और हरियाणा जाकर वहां के भिवानी बॉक्सिंग क्लब में शामिल हो गए। आपको बता दें, इस क्षेत्र (भिवानी) में कई मुक्केबाज़ों को पाए जाने की वजह से इसे भारत का ‘लिटिल क्यूबा’ भी कहा जाता है।

खुद में जगाया विश्वास

नेशनल स्तर पर अपने कदम रखने से पहले उन्होंने भिवानी में 5-6 वर्षों तक कोच देवराज सिंह के सानिध्य में ट्रेनिंग ली। लेकिन अपने अथक प्रयासों के बावजूद आशीष कुमार बेहतर परिणाम देने में असमर्थ रहे।

अपने करियर के मुश्किल दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा, "मुझे याद है कि मैं उस वर्ष (2013) सीनियर नेशनल्स जीतने के लिए पूरी तरह से आश्वस्त था। अगर जीत नहीं भी होती तो मुझे पता था कि मैं कम से कम एक पदक जरूर जीत सकता हूं। मैं तीसरे राउंड में उस मुक्केबाज़ से हार गया, जिससे हारने के बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था। इससे मेरा आत्मविश्वास टूट गया। मैंने मुक्केबाज़ी छोड़कर एक सामान्य नौकरी करने के बारे में सोचा।”

लेकिन इसे छोड़ने से पहले भारतीय मुक्केबाज़ ने इस खेल में एक आखिरी दांव आजमाने का विचार किया, क्योंकि यह खेल उनके शुरुआती जीवन का एक हिस्सा रहा था, जिसे ऐसे ही छोड़ा नहीं जा सकता था।

2015 में आशीष कुमार अपनी हिमाचल की टीम के साथ नेशनल गेम्स में जगह बनाने में कामयाब रहे और यहीं से उनकी किस्मत बदल गई।

आशीष कुमार ने कहा, “मैंने तय किया था कि अगर सफल नहीं हुआ तो मैं बॉक्सिंग छोड़ दूंगा और कुछ और करने की कोशिश करूंगा। लेकिन सौभाग्य से नेशनल गेम्स में मैं सफल रहा।”

उन्होंने आगे कहा, “मैंने सेमीफाइनल में मौजूदा नेशनल चैंपियन को हराया और फाइनल में स्वर्ण पदक जीता। वह जीत मेरे जीवन में एक आशा की नई किरण बनकर सामने आई थी। एक चैंपियन को हराकर मैंने सभी को विश्वास दिलाया कि मैं इससे भी बेहतर कर सकता हूं।”

क्या आपको यह आर्टिकल पसंद आया? इसे अपने दोस्तों के साथ साझा करें!