एथेंस में मिली उम्मीद ने विजेंदर सिंह को बीजिंग में दिलाया था ब्रॉन्ज़

भारतीय बॉक्सर विजेंदर सिंह 2008 ओलंपिक में क्वालिफ़ाई करने के महत्व के बारे में चर्चा की।

18 साल की उम्र में भारतीय बॉक्सर विजेंदर सिंह (Vijender Singh) पहली बार ओलंपिक का हिस्सा 2004 में रहे थे। एथेंस गेम्स में शिरकत करने से उन्हें आभास हो गया था कि इस उपलब्धि की अहमियत कितनी ख़ास है। हालांकि उस समय भिवानी का यह बॉक्सर नौकरी की तलाश में था लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ बड़ा लिखा हुआ था।

सोनी स्पोर्ट्स के फेसबुक पेज ‘द मेडल ऑफ़ ग्लोरी’ के माध्यम से विजेंदर ने बताया “पहले मुझे आभास नहीं था कि ओलंपिक कितना बड़ा है। मुझे लगा कि ओलंपिक का नाम जुड़ने से मुझे कोई नौकरी मिल जाएगी।”

साल 2003 में एफ्रो एशियन गेम्स (Afro Asian Games) जीतने के बाद इस मुक्केबाज़ ने एथेंस गेम्स 2004 के लिए क्वालिफाई कर सभी को चौंका दिया था। उन्होंने आगे कहा “जब तक मैं वहां पहुंचा नहीं था मुझे ज़्यादा कुछ पता नहीं था लेकिन जब मैं वहां पहुंचा तब मैंने भीड़ देखी। उस समय मुझे लगा कि हां, ओलंपिक एक बहुत बड़ा मंच है। जब मैं एरेना में गया तब मेरी आंखे चकाचौंध हों उठीं।

युवा विजेंदर का ओलंपिक का सफ़र पहले ही राउंड में ख़त्म हो गया था जब उन्हें तुर्की के मुस्तफ़ा कारागोल (Mustafa Karagollu) ने पटखनी दी। विजेंदर ने आगे बताया “मेडल सेरेमनी के दौरान मैंने 4 विजेता (लाइटरवेट भारवर्ग) पोडियम पर देखे और तब मुझे अहसास हुआ कि पोडियम पर खड़ा होने में कितना आनंद है।''

क्वालिफ़ायर्स से शुरू हुई जंग

समय बीत गया और 2006 के बाद इस मुक्केबाज़ का लक्ष्य बदल चुका था। उन्हें नार्थ वेस्टर्न रेलवे में नौकरी मिल गई थी और उनका एकमात्र लक्ष्य अब ओलंपिक में मेडल जीतना था। 2006 एशियन गेम्स (2006 Asian Games) में विजेंदर ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीत अपनी क़ाबिलियत का प्रमाण पेश किया और इसके बाद 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स और 2007 एशियन चैंपियनशिप (2006 Commonwealth Games and 2007 Asian championships) में सिल्वर मेडल हासिल कर अपने अनुभव में चार चांद लगा दिए।

एक और बॉक्सर ने इस मुक्केबाज़ के लिए कहा “हम सबको लगा कि विजु (विजेंदर सिंह) बीजिंग गेम्स के लिए आसानी से क्वालिफाई कर जाएंगे और मेडल जीत लेंगे।” हालांकि मिडल वेट 75 किग्रा भारवर्ग में खेलते हुए विजेंदर के लिए क्वालिफ़ाई करना मुश्किल होता जा रहा था।’’

थाईलैंड में हुए ओलंपिक बॉक्सिंग क्वालिफिकेशन के दूसरे राउंड में ही विजेंदर बाहर हो गए थे और इसके बाद चीन में दूसरे क्वालिफायर के दौरान उन्हें पहले ही राउंड में शिकस्त झेलनी पड़ी। विजेंदर सिंह ने आगे बताया “मैं 6-7 महीने तक घर नहीं गया था (कज़ाख़िस्तान बॉक्सिंग क्वालिफायर) और पटियाला में ही ट्रेनिंग कर रहा था।”

वह कहते हैं न कि मेहनत का फल मिलकर ही रहता है और कुछ ऐसा ही हुआ इस मुक्केबाज़ के साथ, और आख़िरकार इन्होंने 2008 ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर लिया।”

विजेंदर सिंह ओलंपिक मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बॉक्सर बनें 
विजेंदर सिंह ओलंपिक मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बॉक्सर बनें विजेंदर सिंह ओलंपिक मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बॉक्सर बनें 

बीजिंग में जीता ब्रॉन्ज़

बीजिंग ओलंपिक में विजेंदर ने बड़ोऊ जैक (Badou Jack) के खिलाफ 13-2 से मुकाबला जीत कर अपने प्रतिद्वंदियों के सामने बेहतरीन खेल को प्रस्तुत किया और अपना जलवा दिखाया। इसे बाद उनका मुकाबला थाईलैंड के अंगख़ान चोमफ़ुआंग (Angkhan Chomphuphuang) के साथ था और इस बार उन्होंने 13-3 से मुकाबला जीता लेकिन यह आसान नहीं था। उनके प्रतिद्वंदी ने उनके शरीर पर बहुत प्रहार किए जिस वजह से उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस दिग्गज ने आगे कहा “अंगख़ान चोमफ़ुआंग एक शक्तिशाली मुक्केबाज़ हैं और उनकी कोहनी वाली तकनीक ने मुझे बाईं तरफ चोटिल कर दिया था। क्वार्टर-फाइनल से पहले छुट्टी वाले दिन मैंने अपने शरीर का ट्रीटमेंट कराया।”

जहां ओलंपिक में विजेंदर सिंह भारत के लिए पहला बॉक्सिंग मेडल जीतने ही वाले थे कि 54 किग्रा भारवर्ग में खेलते हुए अखिल कुमार (Akhil Kumar) भी रातों रात स्टार बन गए।

इस उभरते सितारे के लिए विजेंदर ने कहा “अखिल कुमार ने वर्ल्ड चैंपियन को हराया था और इस मौके पर मीडिया भी वहां मौजूद थी। मुझे याद है कि मुकाबले से पहले मैं ड्रेसिंग रूम में था और लोग भारत से मेडल जीतने की उम्मीद कर रहे थे।”

उन्होंने आगे कहा “लेकिन अखिल क्वार्टर-फाइनल में हार गए और अब भारत की आखिरी उम्मीद मैं बन गया था।” विजेंदर सिंह को पता था कि वे किन उम्मीदों के लिए लड़ रहे हैं और उन्होंने कार्लोस गौन्गोरा (Carlos Góngora) को 9-4 से मात देते हुए भारत के लिए पहला ओलंपिक बॉक्सिंग मेडल हासिल किया।

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