विजेंदर सिंह को ओलंपिक पदक जिताने में उनके कोच शिव सिंह ने निभाई थी अहम भूमिका

प्रतिद्वंदी के मुक्कों की मार से बचने के लिए विजेंदर सिंह को उनके अनुभवी बॉक्सिंग कोच और द्रोणाचार्य अवार्ड विजेता शिव सिंह ने तरीका बताया था।

लेखक रितेश जायसवाल ·

विजेंदर सिंह ने शिव सिंह के साथ जिस तरह से बढ़त हासिल की है, वह बमुश्किल ही किसी अन्य के साथ देखने को मिली है।

अनुभवी कोच उस वक्त भारतीय मुक्केबाज़ी में रमे हुए थे और तभी विजेंदर सिंह (Vijender Singh) राष्ट्रीय मंच पर प्रभावित करते हुए भारतीय टीम में शामिल हो गए।

हालांकि उनके युवा जोश और मेहनत ने विजेंदर सिंह को अपने शुरुआती दिनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ में से एक बनने में मदद की। यही वजह रही कि भिवानी के इस प्रतिभाशाली मुक्केबाज़ ने अक्सर अपने अंतरराष्ट्रीय दौरों से खिले हुए चेहरे के साथ वापसी की।

एक बार दर्द से निराश विजेंदर सिंह ने कोई रास्ता निकालने के लिए शिव सिंह (Shiv Singh) से संपर्क करने का फैसला किया।

शिव सिंह ने ओलंपिक चैनल को बताया, "एक दिन मैंने उसे बैठाकर पूछा कि क्यों? तो उसे कुछ पता नहीं था। वह यह पता लगाने की कोशिश कर रहा था कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी होने के बावजूद भी क्यों हिट हो रहा था। लेकिन, सौभाग्य से मैंने इसमें उसकी मदद की।”

“यह रिंग के किनारे बैठने की वजह से संभव हुआ। ऐसे में आप मुक्केबाज़ी को एक अलग नज़रिए से देखते हैं। आप इन चीजों जल्दी पकड़ लेते हैं।

इस साल की शुरुआत में द्रोणाचार्य अवार्ड हासिल करने वाले शिव सिंह ने आगे कहा, “मैंने उससे कहा कि हर बार जब तुम अंदर (रिंग के अंदर) जाते हो तो अपनी आंखें बंद कर लेते हो।”

बॉक्सिंग कोच शिव सिंह को इस साल द्रोणाचार्य पुरस्कार (लाइफटाइम) से सम्मानित किया गया। तस्वीर साभार: बीएफआई

शिव सिंह की सोच

हालांकि कोच ने उस समय के युवा विजेंदर सिंह पर अपनी राय नहीं दी और जब वह अगले दिन भारतीय मुक्केबाज के प्रशिक्षण के लिए लौटे तो उन्होंने कहा, “अगली बार जब वह रिंग में पूरे जोश में था, तो मैंने उसे बीच में ही रोक दिया और उससे उसकी हरकतों को देखने के लिए कहा। वह जब भी झुकता तो उसकी आँखें बंद हो जातीं। वह प्रतिद्वंद्वी को पंच मारने देता। तभी उसे इस बात का एहसास हुआ।"

“अब, हम जानते थे कि इस कमी को पूरा करना था। मैंने कुछ सुझावों के साथ उसकी मदद की और उसे हर बार बैक फुट पर जाने के लिए कहा।”

शिव सिंह ने इस मुद्दे को करीब से समझा और विजेंदर सिंह की मदद करने का एक तरीका ढूंढा, जिससे चलते वह ओलंपिक पदक विजेता बने। यह था पंचों से बचना।

उन्होंने आगे कहा, "बॉक्सिंग में एक ही चीज़ सभी (प्रतिद्वंद्वी) के लिए काम आए, ऐसा जरूरी नहीं है। आपको उनमें से प्रत्येक के लिए तरीके बदलने और खोजने की जरूरत होती है।”

“मैंने उससे कहा कि इस प्रक्रिया में समय लगेगा और इसमें तुरंत नतीज़े नहीं निकल सकते। लेकिन अगर यह तकनीक काम नहीं करती है, तो मेरे पास एक प्लान-बी भी है। हम एक पंच के बाद दूसरा पंच लगाने से पहले डक करने की कोशिश कर सकते थे और रास्ते से हट सकते थे।”

शिव सिंह ने कहा, “फिर जल्द ही ऐसा लगने लगा कि उसने इस कौशल में महारत हासिल कर ली है।”