भारतीय फ़ुटबॉल दिग्गज और ओलंपियन चुन्नी गोस्वामी का निधन

राष्ट्रीय टीम के पूर्व कप्तान का गुरुवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उन्होंने कोलकाता एक अस्पताल में अंतिम सांस ली।

लेखक रितेश जायसवाल ·

भारतीय फुटबॉल के दिग्गज नामों में से एक और पूर्व ओलंपियन सुबिमल 'चुन्नी' गोस्वामी (Subimal ‘Chuni’ Goswami) ने गुरुवार को कोलकाता एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। 82 वर्षीय अनुभवी फुटबॉलर का निधन दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुआ। उनके परिवार में उनकी पत्नी बसंती (Basanti) और बेटा सुदिप्तो (Sudipto) हैं।

चुन्नी गोस्वामी भारत की उन दुर्लभ प्रतिभाओं में से एक थे, जिन्होंने उच्च स्तर पर एक नहीं बल्कि दो खेलों में सफलता हासिल की। उन्होंने 1946 में मोहन बगान की जूनियर टीम के साथ अपने फुटबॉल करियर की शुरुआत की और जल्द ही सीनियर टीम में जगह बना ली। अंततः साल 1968 में उन्होंने इस खेल को अलविदा कह दिया।

इसी बीच साल 1962 में उनके क्रिकेट के करियर की शुरुआत हुई, जब वह रणजी ट्रॉफी में बंगाल के लिए एक ऑलराउंडर के रूप में उभरकर सामने आए। कोलकाता के इस प्रतिभाशाली इंसान ने बंगाल के लिए 46 फर्स्ट क्लास मैच खेले, जिसकी बदौलत उन्हें 1972 में रणजी ट्रॉफी के फाइनल में टीम का नेतृत्व करने का मौका मिला।

हालांकि, चुन्नी गोस्वामी को कभी भी नेशनल टीम के लिए क्रिकेट खेलने का मौका नहीं मिला, लेकिन वह 1966-67 सीज़न के दौरान गैरी सोबर्स की अगुवाई वाली वेस्टइंडीज़ टीम के खिलाफ एक अभ्यास मैच में अपनी छाप छोड़ने में जरूर सफल रहे। इस दाएं हाथ के मीडियम पेसर गेंदबाज ने मैच में कुल आठ विकेट लिए, जिसमें पहली पारी में पांच विकेट शामिल थे। वेस्टइंडीज़ को अपने इस टूर गेम में हार का सामना करना पड़ा था।

चुन्नी गोस्वामी – एक फुटबॉल दिग्गज

जहां क्रिकेट चुन्नी गोस्वामी के लिए हमेशा एक जुनून रहा, वहीं यह फुटबॉल ही था जिसने उन्हें देश के कुछ सबसे बड़े नामों में से एक बना दिया।

भारतीय फुटबॉल पर बात करने वाले उल्लेखनीय आवाज़ों में से एक नोवी कपाड़िया ने इस प्रतिभाशाली स्ट्राइकर का अपने साप्ताहिक कॉलम में वर्णन करते हुए लिखा, “गोस्वामी यकीनन भारत के एक बेहतरीन फुटबॉल खिलाड़ी थे। 1960-64 के उनके करियर के दौरान उनके बैलेंस, सिल्की ड्रिब्लिंग स्किल, स्लिक बॉल कंट्रोल और चालाकी से बॉल पासिंग करने के उनके हुनर ने उन्हें देश में एक स्टार खिलाड़ी बना दिया।”

“उनकी बेहतरीन कद-काठी लोगों को काफी आकर्षित करती थी और इन्हीं खूबियों ने उन्हें अपने युग के अन्य महान लोगों से अलग बना दिया। पूर्व-अंतरराष्ट्रीय और प्रसिद्ध कोच सुभाष भौमिक (Subhash Bhowmick) ने यह बात हमेशा कही कि गोस्वामी रोनाल्डिन्हो (Ronaldinho) या रॉबिन्हो (Robinho) या ब्राज़ील के किसी भी महान फुटबॉलर के जैसे ड्रिबल कर सकते हैं।”

कलकत्ता के मैदान में उन्होंने अपने कौशल से बहुत लोगों को प्रभावित किया था। ऐसे में नेशनल टीम से चुन्नी गोस्वामी के लिए बुलावा आना बहुत बड़ी बात नहीं थी।

आखिरकार इस युवा स्ट्राइकर ने 1956 में नेशनल टीम में अपनी जगह बना ली और यह 1958 के एशियन गेम्स ही थे जब चुन्नी गोस्वामी एक बेहतरीन और आक्रामक फुटबॉल खिलाड़ी के तौर पर उभरकर सामने आए।

जापान के टोक्यो में हुए 1958 एशियाड में इस भारतीय खिलाड़ी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बर्मा और हांगकांग के खिलाफ किए गए उनके गोल की मदद से ही भारत इस टूर्नामेंट में चौथे स्थान पर रहा।

एशियाई खेलों के प्रदर्शन से सीख लेने के बाद चुन्नी गोस्वामी ने अपने खेल पर काम किया और खुद को रोम 1960 में अपने ओलंपिक डेब्यू के लिए तैयार किया।

चार साल पहले उनके शानदार प्रदर्शन के दम पर भारतीय फुटबॉल टीम चौथे स्थान पर रही, जिसकी वजह से रोम 1960 में टीम से उम्मीदें काफी बढ़ गईं।

तुलसीदास बलराम (Tulsidas Balaram), पीके बनर्जी (Pradip Kumar Banerjee) (जिनका पिछले महीने निधन हो गया था) जैसे खिलाड़ियों के साथ चुन्नी गोस्वामी भी टीम में शामिल थे। उम्मीद के मुताबिक भारतीय टीम ने रोम 1960 में अपना शानदार प्रदर्शन दिया और हंगरी, फ्रांस और पेरू जैसी टीमों से मुक़ाबला किया।

इसके दो साल बाद ही चुन्नी गोस्वामी के लिए एक अहम पल आया और उन्हें भारतीय फुटबॉल टीम की कप्तानी सौंपी गई। जिसके बाद उन्होंने जकार्ता में 1962 के एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीतकर अपना दूसरा खिताब जीता।

1964 में भी चुन्नी गोस्वामी नेशनल टीम के कप्तान रहे और उन्होंने टीम में अपना अहम योगदान दिया। जिसकी बदौलत एशिया की टीमों के लिए हुए महाद्वीपीय फुटबॉल चैंपियनशिप - AFC एशिया कप में भारतीय टीम दूसरे स्थान पर रही।

इस भारतीय फुटबॉल नायक ने 36 आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय मैचों में भारत का प्रतिनिधित्व किया, उनमें से 16 में कप्तानी की और 13 गोल दागे। उन्हें 1963 में अर्जुन पुरस्कार और 1983 में पद्म श्री (देश का चौथा सबसे बड़ा नागरिक पुरस्कार) से सम्मानित किया गया।