भारतीय फुटबॉल के वह स्वर्णिम पल जिनको आप जानना ज़रूर चाहेंगे

भारत के ब्लू टाइगर्स दहाड़े 1956 ओलंपिक गेम्स में और रखी आने वाले समय के लिए फुटबॉल की नींव 

लेखक जतिन ऋषि राज ·

भारत में खेल के प्रति दीवानगी कोई नई बात नहीं है। ज़ाहिर सी बात है यहां कई तरह के खेल खेलें जाते हैं। लेकिन बात जब फुटबॉल की हो तो इस मामले में कहीं न कहीं भारत थोड़ा पीछे ज़रूर दिखाई देता है। मौजूदा समय में भारत अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में 103 पायदान पर काबिज़ है जो इस बात को बयां करने के लिए काफी है कि अभी भी भारत में फुटबॉल को लेकर काफी कुछ किए जाने की ज़रूरत है। लेकिन बहुत ही कम लोगों यह बात पता होगी कि भारतीय फुटबॉल टीम एक बार फीफा वर्ल्ड कप में क्वालीफाई करने में सफल रही थऐसा 1950 में ब्राज़ील में हो रहे वर्ल्ड कप के दौरान हुआ, लेकिन निराशाजनक बात यह रही कि आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने के कारण भारत को अपना नाम वापस लेना पड़ा। 1950 वर्ल्ड कप से पहले भारतीय फुटबॉल टीम आज़ादी के एक साल बाद 1948 लंदन ओलंपिक खेलों में भाग लिया और अपने पहले अंतरराष्ट्रीय मैच में भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन जीत न सका। यह मैच फ़्रांस के खिलाफ खेला गया और नतीजा 2-1 से भारत के हाथ से निकल गया। 89वें मिनट तक भारत ने फ्रांस को बांधे रखा लेकिन अंत में एक गोल से पीछे रहकर भारतीय टीम को हार को स्वीकार करनी पड़ी। इसके 4 साल बाद भारत ने हेलसिंकी गेम्स में हिस्सा लिया जहां यूगोस्लाविया के सामने उसे 10-1 से शिकस्त का सामना करना पड़ा। यहां तक भारतीय फुटबॉल की कहानी साधारण रही लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ, जिससे पूरे देश में हर्षोल्लास की लहर दौड़ उठी।

भारतीय फुटबॉल की नींव 

1956 वह सुनहरा साल बना जब भारत की फुटबॉल टीम ने ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई किया। 1956 मेलबर्न ओलंपिक गेम्स में भारतीय फुटबॉल टीम ने शानदार या फिर कहें कि हालातों के विपरीत बेहद उम्दा प्रदर्शन कर पूरी दुनिया का दिल जीत लिया। ओलंपिक 1956 में भारत ने चौथे पायदान पर कब्ज़ा किया और देश को फुटबॉल के प्रति प्रेरित किया|

1956 मेलबर्न ओलंपिक गेम्स में अपना पहला मैच खेलते हुए भारत ने हंगरी को मात दी।1954 वर्ल्ड कप रनर अप, हंगरी को इस हार पर यकीन करना मुश्किल था। उस समय के स्टार खिलाड़ी फेरेनक पुस्कस और सैंडर कोक्सिस जैसे दिग्गज खिलाड़ियों को हंगरियन रेवोलुशन के चलते 1956 मेलबर्न ओलंपिक गेम्स से अपना नाम वापस लेना पड़ा और यह बन गया भारत के लिए एक सुनहरा मौका।क्वार्टर फाइनल में भारत की भिड़त अपने घर पर खेल रही ऑस्ट्रेलिया से हुई। देश भर में ब्लू टाइगर्स के लिए दुआएं की जा रही थी। हालांकि ऑस्ट्रेलिया के साथ मुकाबला आसान न था क्योंकि वह भारत से बेहतर टीम थी।

बीस साल के भारतीय खिलाड़ी नेविल डिसूज़ा ने अपना पहला ओलंपिक खेलते हुए मेज़बान ऑस्ट्रेलिया टीम के खिलाफ शानदार खेल का मुज़ाहिरा पेश करते हुए हैट्रिक जड़ी और भारत को 4-2 से विजयी किया। यह युवा टीम मैदान पर ऐसे खेली कि मानों सालों की प्रतिष्ठा और अनुशान से भरी हो और इस जीत के साथ ही ओलंपिक खेलों के सेमीफाइनल में जगह बनाने वाला भारत पहला देश बन गया।

सेमीफाइनल में भारत का सामना यूगोस्लाविया से हुआ। इस मुकाबले में यूगोस्लाविया का पलड़ा भारी रहा और उसने इस मैच को 4-1 से अपने नाम किया। इस हार के बावजूद भारतीय टीम के पास अभी एक मौक़ा और था। यह मौक़ा था अपने देश के लिए ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने का। हालांकि बुल्गारिया ने भारत को 3-0 से मात देकर मेडल जीतने की रेस से बाहर किया लेकिन नेविल डिसूज़ा को उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया। ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ी को सम्मान मिलना यकीनन पूरे देश के लिए एक यादगार पल था।

दौर बढ़ा, खेल बढ़ा

1956 ओलंपिक खेलों के प्रदर्शन के कारण वह दौर भारतीय फुटबॉल का “स्वर्णिम पल” माना जाता है। इससे पहले नई दिल्ली में हुए 1951 एशियन गेम्स में भी भारतीय फुटबॉल टीम ने दमदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया था और इसके 11 सालों बाद 1962 जकार्ता में एशियन गेम्स में इस कारनामे को दोहराकर टीम ने इतिहास रचा।

भारतीय फुटबॉल टीम के इस सुनहरे सफ़र को अब बॉलीवुड कैमरे में कैद करने जा रहा है जिसकी शूटिंग इसी महीने से शुरू होगी। आपको बता दें अभिनेता अजय देवगन इस फिल्म में कोच सैयद अब्दुल रहीम का किरदार निभाते नज़र आएंगे।