दिग्गज भारतीय फ़ुटबॉलर और ओलंपियन पीके बनर्जी का निधन

इस भारतीय दिग्गज फ़ुटबॉलर ने भारत को 1960 ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई कराने में अहम योगदान निभाया था और 1962 एशियन गेम्स में भारत को दिलाया था स्वर्ण पदक

शुक्रवार को भारत के सर्वकालिक फ़ुटबॉल खिलाड़ी पीके बनर्जी (PK Banarjee) ने आख़िरी सांस ली।

निमोनिया के कारण सांस समस्याओं से पीड़ित और पार्किंसंस रोग, मनोभ्रंश और हृदय की समस्या जैसी कई बीमारियों से जूझ रहे 83 वर्षीय प्रदीप कुमार बनर्जी का 20 मार्च को निधन हो गया, वह 2 मार्च से लाइफ़ सपोर्ट पर थे।

उन्होंने अपने पीछे दो बेटियों पउला और पूर्णा को छोड़ा है, जबकि उनके छोटे भाई प्रसून बनर्जी मौजूदा सांसद भी हैं।

पी के बनर्जी के निधन पर ऑल इंडिया फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन (AIFF) ने भी शोक जताया है, AIFF के अध्यक्ष प्रफ़ुल पटेल ने कहा, ‘’ये जानकर बेहद अफ़सोस हुआ कि भारत के एक दिग्गज फ़ुटबॉलर प्रदीप-दा हमारे बीच नहीं रहे। भारतीय फ़ुटबॉल में उनके योगदान को कभी नहीं भूला जा सकता है, मैं उन्हें श्रृधांजलि अर्पित करता हूं।‘’

“वह भारतीय फुटबॉल की स्वर्णिम पीढ़ी का पर्याय बने रहेंगे। प्रदीप-दा, आप हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे।”

इसी बीच पूर्व भारतीय कप्तान बाइचुंग भूटिया (Bhaichung Bhutia) ने भी अपने कोच को याद किया और कहा कि वह एक ऐसे शख़्स थे जो इस्ट बंगाल के कोच होते हुए भी कभी दबाव में नहीं रहा करते थे।

पीके बनर्जी 1960 ओलंपिक में भारतीय फ़ुटबॉल टीम के कप्तान थे। तस्वीर साभार: AIFF
पीके बनर्जी 1960 ओलंपिक में भारतीय फ़ुटबॉल टीम के कप्तान थे। तस्वीर साभार: AIFFपीके बनर्जी 1960 ओलंपिक में भारतीय फ़ुटबॉल टीम के कप्तान थे। तस्वीर साभार: AIFF

भूटिया ने प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया से बातचीत में कहा, ‘’प्रदीप दा कभी भी दबाव में नहीं आते थे, वह कभी भी किसी के ख़िलाफ़ भी कुछ बिना सोचे समझे नहीं बोला करते थे।‘’

भूटिया ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘’वह सिर्फ एक महान खिलाड़ी और कोच नहीं थे, मेरे लिए, वह एक महान इंसान भी थे। वह बेहद ख़ुशमिज़ाज इंसान थे, वह हमेशा ख़ुश रहते थे, मुस्कुराते थे, मानो हमेशा मस्ती से भरे होते थे। यही उनमें सबसे बड़ा गुण था, उनके आसपास रहना और उनकी कहानियों को सुनना बहुत मजेदार था। वह हमेशा शांत और रचनाशील थे। यहां तक ​​कि मैचों के दौरान भी कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई उनपर दबाव डाल सके।"

पीके बनर्जी एक स्टार खिलाड़ी

23 जून, 1936 को पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के बाहरी इलाके में जन्मे पीके बनर्जी का परिवार विभाजन से पहले जमशेदपुर आ गया था।

पूर्व भारतीय स्ट्राइकर के लिए 1960 के दशक का दौरान उनके खेल करियर का सबसे शानदार समय था, जब उन्होंने भारतीय फुटबॉल टीम को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ अभूतपूर्व सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पीके बनर्जी उस दौर में अपने शबाब पर थे, उन्होंने 1960 के ओलंपिक में टीम का नेतृत्व करने के दो साल बाद 1962 के एशियन गेम्स में भारतीय फुटबॉल टीम को स्वर्ण पदक दिलाया था।

कोलकाता के इस खिलाड़ी ने 19वें मिनट में एशियाड के फाइनल में टीम के लिए पहला स्कोर किया था, जबकि दक्षिण कोरिया पर 2-1 की इस जीत में जरनैल सिंह ने भारत की बढ़त को दोगुना किया था।

भारतीय फ़ुटबॉल के सुनहरे युग में भारतीय स्टार ने चूनी गोस्वामी और तुलसीदास बालाराम के साथ एक बेहतरीन स्ट्राइक तिकड़ी को भी देखा था, एक ऐसी तिकड़ी जिसे बाद में भारतीय फ़ुटबॉल की 'होली ट्रिनिटी' नाम से जाना गया।

भारतीय राष्ट्रीय टीम के साथ उनका एक और बेहतरीन लम्हां 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में आया था, जब भारत ने ऑस्ट्रेलिया को मात दी थी और चौथे स्थान पर रहा था।

उनके इन्हीं कारनामों को देखते हुए 1961 में गठित हुए अर्जुन पुरस्कार से उन्हें पहली बार नवाज़ा गया था।

इस भारतीय दिग्गज ने आख़िरकार 1967 में संन्यास ले लिया था, पीके बनर्जी ने देश के लिए कुल 84 अंतर्राष्ट्रीय मैचों में 65 गोल दागे।

पीके बनर्जी एक बेहतरीन कोच

रिटायरमेंट के बाद, पीके बनर्जी ने एक कोच के रूप में खेल के साथ अपना जुड़ाव जारी रखा, जहां उन्होंने भारतीय फुटबॉल के दो सबसे बड़े क्लबों - पूर्वी बंगाल और मोहन बागान में कार्यभार संभाला।

इस भारतीय महान फ़ुटबॉलर ने रेड और गोल्ड ब्रिगेड के साथ भी जुड़े और उन्हें पांच कलकत्ता फुटबॉल लीग (CFL) ख़िताब दिलाने में अहम भूमिका अदा की।

बाद में मोहन बागान के साथ पीके बनर्जी की अहमियत और क़ाबिलियत तब सभी के सामने आई जब उन्होंने 1977 में एक प्रदर्शनी मैच में अमेरिकी टीम न्यूयॉर्क कॉसमॉस को 2-2 से ड्रॉ पर रखा जिसमें कई दिग्गज खिलाड़ी भी शामिल थे।

उस वर्ष भी मोहन बागान ने घर में तीन ख़िताबी जीत दर्ज की थी - IFA शील्ड, रोवर्स कप और डूरंड कप।

पीके बनर्जी के कोचिंग कारनामे केवल घरेलू सर्किट तक ही सीमित नहीं थे। इस पूर्व स्ट्राइकर को जीएम बाशा के साथ 1970 एशियन गेम्स के लिए भारतीय टीम का संयुक्त कोच भी बनाया गया था।

दोनों ने सुनिश्चित किया कि टीम बैंकॉक से स्वर्ण पदक जीतकर घर लौटे। बाद में, बनर्जी ने 1971 में सिंगापुर पेस्टा सुकन कप में भारत को संयुक्त विजेता बनाने में भी अहम योगदान दिया था।

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