भारत के महान हॉकी खिलाड़ी और ओलंपिक पदक विजेता बलबीर सिंह खुल्लर का निधन

वह साल 1968 में मैक्सिको में हुए ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली टीम का भी हिस्सा थे।

लेखक लक्ष्य शर्मा ·

भारतीय हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह खुल्लर का शनिवार रात 77 साल की उम्र में पंजाब के जालंधर में उनके पैतृक संसारपुर गांव में निधन हो गया। बलबीर सिंह (Balbir Singh Kullar) ने भारत का प्रतिनिधित्व तब किया जब भारतीय हॉकी अपने स्वर्णिम दौर में था। उनके रहते हुए टीम ने ओलंपिक कांस्य (Olympics bronze ) और एशियन गेम्स (Asian Games) में गोल्ड मेडल जीता।

एशियन और ओलंपिक खेलों में सफलता

ये खिलाड़ी साल 1968 ओलंपिक गेम्स में उस टीम का हिस्सा थे, जिसने पूल स्टेज पर 7 में से 6 मैच जीते और शीर्ष पर रही। इसके बाद भारतीय टीम को सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 1-2 से हार का सामना करना पड़ा लेकिन वेस्ट जर्मनी को हराकर टीम ने कांस्य पदक जीता।

बलबीर सिंह खुल्लर उस टीम का भी हिस्सा थे, जिसकी कप्तानी शंकर लक्ष्मण कर रहे थे। इस टीम ने साल 1966 में बैंकॉक में हुए एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता था। फाइनल में उस टीम ने पाकिस्तान को 1-0 से हराया था।

उस मैच में दो और बलबीर सिंह खेल रहे थे और तीनों ने शानदार प्रदर्शन कर गोल करने में सफलता हासिल की। बलबीर सिंह खुल्लर (Balbir Singh Kular) ने सबसे पहले पास किया, इसके बाद बलबीर सिंह खुल्लर ने गेंद अपने पाले में ली और रेलवे के बलबीर सिंह को गेंद दी, जिसके बाद उन्होंने गोल कर दिया।

ये पहला मौका था जब भारतीय टीम ने लगातार दूसरी बार बड़े टूर्नामेंट में पाकिस्तान को शिकस्त दी थी। इससे पहले ये मौका साल 1964 के टोक्यो ओलंपिक में आया था, जब भारत ने पाक को 1-0 से मात दी थी।

पद्म श्री सम्मान

बलबीर सिंह खुल्लर का जन्म पंजाब के संसारपुर गांव में हुआ था। इस खिलाड़ी ने भारतीय हॉकी टीम के साथ अपना पहला बड़ा टूर्नामेंट साल 1963 में फ्रांस के ल्योन में खेला। दो मेडल्स के अलावा बलबीर सिंह खुल्लर को खेलों में अपने योगदान के लिए अर्जुन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है। इसके बाद साल 1999 में उन्हें देश के चौथे बड़े अवॉर्ड पद्म श्री अवॉर्ड का सम्मान दिया गया। वह अपने पीछे पत्नी, एक बेटा और 2 बेटी छोड़ गए।

जोगिंदर सिंह इस दुनिया में नहीं रहे

इस सप्ताह के अंत में पंजाब के एक और भारतीय दिग्गज जोगिंदर सिंह (Joginder Singh Saini) इस दुनिया में नहीं रहे। द्रोणाचार्य अवॉर्ड विजेता जोगिंदर सिंह ने अपनी आखिरी सांस पिछले रविवार को ली। उनकी उम्र 90 साल थी।

होशियारपुर के डॉक्टर परिवार से तालुक रखने वाले जोगिंदर साल 1954 में एथीलट कोच बनें और इसके बाद उन्होंने साल 1961 में एनआईएस (NIS) में ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी। ये खिलाड़ी साल 1970 में एमेच्योर एथलीट फेडरेशन ऑफ इंडिया (Amateur Athletics Federation of India) के मुख्य कोच बने।

जोगिंदर सिंह सैनी ने साल 2004 तक कोचिंग का काम किया। इसके बाद वह एथलीट फेडरेशन ऑफ इंडिया के सलाहकार बनें। अपने शुरुआती दिनों में जोगिंदर सिंह ने बाधा दौड़ में भाग लिया और हॉकी भी खेली लेकिन एथलेटिक्स उनका पहला प्यार बना रहा।

भारत के महान एथलीट गुरबचन सिंह रंधावा (Gurbachan Singh Randhawa) ने उन्हें प्रशिक्षित किया। गुरबचन सिंह रंधावा को साल 1997-98 में कोचिंग में हासिल की उपबल्धि के लिए द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।