बलबीर सिंह सीनियर - भारतीय हॉकी टीम की हर मुश्किल का समाधान था पास 

1982 में चीफ़ कोच बने बलबीर सिंह दोसांज ने उस साल भारतीय मेंस हॉकी टीम को दो सिल्वर और एक ब्रॉन्ज़ मेडल जितवाया था।

लेखक जतिन ऋषि राज ·

बलबीर सिंह दोसांज (Balbir Singh Dosanjh) ने एक एथलीट के तौर पर हॉकी टीम के साथ ओलंपिक पदक जीतने के सपने को तीन बार जिया है। खेल को अलविदा कहने के बाद भी बलबीर सिंह भारतीय मेंस हॉकी को किसी न किसी तरह अपना योगदान देते रहे।

कोच की भूमिका निभाते हुए इस रिटायर्ड खिलाड़ी ने 1971, 1975 वर्ल्ड कप (1971 and 1975 World Cup) में भारतीय हॉकी टीम को ब्रॉन्ज़ और गोल्ड मेडल दिलाने में अपना योगदान दिया। कुछ समय बाद मेंस हॉकी का ऐसा समय आया जब वे अच्छे परिणामों के लिए जूझ रहे थे। फेडरेशन ने एक बार फिर बलबीर सिंह पर दांव लगाया और एक बार फिर 1982 में उन्हें कोच बनाया।

इस सेवा को भी इस दिग्गज ने अपनाया और अपने कौशल से मेंस हॉकी टीम को एक बार फिर आगे बढ़ाया।

1982 दुबई टूर के दौरान पकिस्तान के खिलाफ टेस्ट मैच से पहले कोच बलबीर ने स्पोर्टस्टार को बताया, “क्या आप अपने बच्चों को केवल इसलिए छोड़ देंगे क्योंकि वे कमज़ोर हैं?

जहां बलबीर सिंह ने अपनी कोचिंग से भारतीय टीम को हमेशा पोडियम पर ले जा खड़ा किया है, लेकिन अब यह रिकॉर्ड खतरे में था।"

बलबीर सिंह सीनियर अपनी कोचिंग के दम पर हमेशा भारतीय मेंस हॉकी को पोडियम तक ले गए हैं। फोटो क्रेडिट: बलबीर सिंह सीनियर/ट्विटर

एकजुटता की मिसाल

महत्वपूर्ण समय पर गोल दागने वाले बलबीर सिंह का मानना था कि अगर एक टीम एकजुट होकर खेले तो सब कुछ मुमकिन है। कोच बनने के बाद इस दिग्गज ने खिलाड़ियों को एल्फाबेटिक आर्डर में बांटा और हर राज्य के खिलाड़ियों को एक दूसरे राज्य के खिलाड़ियों को जानने का मौका दिया। उनका मानना था कि अगर खिलाड़ी ऑफ द फील्ड एक दूसरे को जानते हैं तो उनका ताल मेल ऑन फील्ड बेहतर होता है। उन्होंने बातचीत करते हुए आगे कहा, “भगवान उनकी मदद करता है जो खुद की मदद करते हैं। वह हमेशा हमारे साथ हैं। मैं चाहता था कि लड़कों को हमेशा लगे कि वह सब एक हैं चाहे वह किसी भी धर्म के हों।”

पिछले मापदंडों को पीछे छोड़ते हुए बलबीर सिंह के नए नुस्ख़े काम आने लगे और उनकी इज्ज़त बढती चली गई। मण्यपंडा मुथन्ना सोमया (Maneyapanda Muthanna Somaya) ने स्पोर्टस्टार के कॉलम में लिखा, "बलबीर सिंह सीनियर अपनी सहजता को मैनेजमेंट में लाए और अपने व्यक्तिगत स्पर्श की वजह से जल्द ही खिलाड़ियों के साथ जुड़ गए। ड्रेसिंग रूम में वह सख्त निर्णय लेने से भी नहीं चूकते थे, चाहे सीनियर खिलाड़ियों को इस चीज़ का बुरा ही क्यों न लगे।” बलबीर ने हमेशा माना कि खेल से बड़ा कुछ नहीं है और उन्होंने इसे साबित भी किया।

बलबीर सिंह को 1982 चैंपियंस ट्रॉफी और एशियन गेम्स में सकारात्मक परिणामों का ज़ोम्मा दिया गया था। फोटो क्रेडिट: फेसबुक/बलबीर सिंह सीनियर  

मॉडर्न तकनीकों को अपनाते हुए सफलता खोजी

चैंपियंस ट्रॉफी और एशियन गेम्स 1982 (Champions Trophy and Asian Games) में भी भारतीय मेंस हॉकी को अच्छे परिणाम मिले लेकिन इस दौरान कोच बलबीर सिंह के सामने कुछ नई चुनौतियां भी आईं। ग्रास फील्ड की जगह एस्ट्रोटर्फ के आने से और पेनल्टी कॉर्नर के नियम में बदलावों की वजह से बलबीर को अपने कोचिंग के नुस्खों में बदलाव करना पड़ा।

हालांकि इस चीज़ का प्रभाव उन पर ज़्यादा नहीं पड़ा और उन्होंने ‘हार्ड वर्क’ जैसे अपने मूल मंत्र या यूं कहें कि नियम को हमेशा अपने साथ रखा।

सोमया ने आगे कहा, “अलग दौर से आए बलबीर को एस्ट्रोटर्फ पर खेली जाने वाली मॉडर्न डे हॉकी के बारे में ज़्यादा अनुभव नहीं था। उनके मज़बूत इरादों ने और अनुभव ने उनकी मदद की और वह अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तैयार हो गए।”

अब दौर बदल रहा था, कोचिंग तकनीक बदल रही थी और इसी विषय पर बलबीर ने कहा “चाहे वह हाफ-लाइन कोच हो या फुल-बैक कोच, वे खिलाड़ियों को खुद जाकर नहीं समझाएंगे। मैं चाहता हूं कि सारा ज्ञान खिलाड़ियों को एक साथ मिले। यह अच्छा है कि मेरी मदद के लिए ज़्यादा लोग हैं लेकिन लड़कों को अलग-अलग विचार नहीं जाने चाहिए। लाजवाब बलबीर की यह ट्रिक काम आई और 1982 चैंपियंस ट्रॉफी में भारत ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने में सफल रहा। इस प्रतियोगिता में भारतीय मेंस हॉकी टीम का यह प्रदर्शन अगले 36 सालों तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। इसके बाद 1982 एशियन गेम्स में भी भरतीय दल के हाथ सिल्वर मेडल आया लेकिन कोच बलबीर के लिए यह इतना काफी था। उन्होंने आगे कहा “उन्होंने टीम को दोबारा बनाया और हमे मेलबर्न जाकर एसंडा ट्रॉफी (Esanda Trophy) खेलने के लिए मना लिया, जहां वर्चुअल वर्ल्ड कप प्रतियोगिता के लिए सर्वश्रेष्ठ देश हिस्सा लेने वाले थे।”

जहां भारत न्यूज़ीलैंड, हॉलैंड और पकिस्तान जैसी मज़बूत टीमों को हराकर सिल्वर जीतने में सफल रहा। सोमया ने बताया कि “मेरे जैसों के लिए हॉकी में करियर को आगे ले जाने लिए आत्मविश्वास बढ़ गया था। बलबीर सिंह दोसांज ने भारतीय मेंस हॉकी टीम को 1982 में जो दो बड़ी उपलब्धियां दिलवाई उसकी बराबरी भारतीय टीम कई दशकों तक नहीं कर पाई।”