प्रेरणा और एकजुटता की वजह से बलबीर सिंह सीनियर को ओलंपिक गेम्स से था लगाव

दिग्गज हॉकी खिलाड़ी का मानना था कि ओलंपिक जैसे खेल देशों को और लोगों को साथ लाएं है और इस खूबी को हमेशा जीवित रहना चाहिए।

इसमें कोई दोहराय नहीं है कि बलबीर सिंह दोसंज (Balbir Singh Dosanjh) हॉकी के खेल को और ओलंपिक गेम्स को भली भाती जानते थे। भारतीय मेंस हॉकी टीम की ओर से ओलंपिक गेम्स में लगातार तीन गोल्ड मेडल जीतने वाले बलबीर सिंह साल 1948, 1952, 1956 तक टीम का एक मुख्य हिस्सा रहे थे।

कुछ साल पहले बलबीर सिंह सीनियर ने ओलंपिक चैनल से बातचीत के दौरान कहा था कि “खेल से जुड़ी इज़्ज़त की मैं सराहना करता हूं। दूसरी ओर अलग-अलग देशों से युवा खिलाड़ियों की दोस्ती को भी सरहाता हूं।”

दो हफ्ते से अस्पताल में अपना जीवन व्यतीत करने वाले इस दिग्गज खिलाड़ी का सोमवार को निधन हो गया। इस शोक खबर से हॉकी और खेल जगत में निराशा फैल गई है और सभी इस खबर से विचलित हो उठे हैं।

इतना ही नहीं, बलबीर सिंह हमेशा से ही युवा खिलाड़ियों की प्रेरणा रहे हैं और उन्होंने समय समय पर हर पीढ़ी को अनुभव और कौशल से लैस किया है। उन्होंने आगे कहा “मैं एक ओलंपिक चैंपियन हूं और इसी वजह से मुझे स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी जैसी जगहों पर बच्चों से बात करने भेजा जाता है। अगर मैं ओलंपिक चैंपियन नहीं होता तो मुझे वहां भेजा नहीं जाता। इस वजह से मुझे लोगों को प्रेरित करने का मौका मिला और मैं जब भी वहां जाता हूं तो अपनी कहानियां उनके साथ बांटता हूं। उन्ही बच्चों में से कई इंटरनेशनल लेवल पर भी खेले हैं, इसका मतलब मेरी कहानियां उनके काम आई है।”

बलबीर सिंह सीनियर अपनी कोचिंग के दम पर हमेशा भारतीय मेंस हॉकी को पोडियम तक ले गए हैं।  फोटो क्रेडिट: बलबीर सिंह सीनियर/ट्विटर
बलबीर सिंह सीनियर अपनी कोचिंग के दम पर हमेशा भारतीय मेंस हॉकी को पोडियम तक ले गए हैं। फोटो क्रेडिट: बलबीर सिंह सीनियर/ट्विटरबलबीर सिंह सीनियर अपनी कोचिंग के दम पर हमेशा भारतीय मेंस हॉकी को पोडियम तक ले गए हैं। फोटो क्रेडिट: बलबीर सिंह सीनियर/ट्विटर

खेल ने जोड़े रखा

सिर्फ फील्ड पर ही नहीं, बल्कि फील्ड के बाहर भी इस दिग्गज ने खेल को बहुत कुछ दिया है। वह हमेशा से ही खेल के निर्माण को सरहाते थे और अपना योगदान देते थे। बलबीर सिंह सीनियर ने आगे अलफ़ाज़ साझा करते हुए कहा “मैं उस समय के लोगों को धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने ओलंपिक गेम्स बनाकर इंसानियत को एक खूबसूरत तोहफा दिया है। उस समय जंग होती थी और ऐसे में ओलंपिक के होने से अच्छा संकेत बाहर जाता था और वह था स्टॉप फाइटिंग, स्टार्ट प्लेइंग।”

इस ओलंपियन का मानना है कि ओलंपिक गेम्स की वजह से दुनिया एक दूसरे से जुड़ी है और लोगों में प्रेम भाव बढ़ा है। खिलाड़ी ने आगे फार्माया “जब मैं पहली बार लंदन आया तो वह केवल एक ही भारतीय रेस्टोरेंट था और अब हर गली में एक भारतीय रेस्टोरेंट मौजूद है और ब्रिटिश भी वहां जाकर खाते हैं।”

बलबीर सिंह दोसांज का यूं अलविदा कह देने से ज़रूर खेल जगत और भारत को नुकसान हुआ है और अब उनके प्रशंसकों को अपने इस हीरो के बिना ही जीना होगा।

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