दिग्गज हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर की हालत नाज़ुक, लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम पर हैं पूर्व भारतीय कप्तान

पूर्व कप्तान को निमोनिया के डर के बाद भर्ती कराया गया था और वह लगातार वेंटिलेटर पर हैं।

लगभग दो सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रहने और कई कार्डियक अरेस्ट से जूझने के बाद, तीन बार के ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Sr ) चंडीगढ़ के एक अस्पताल में सेमी-कोमाटोज अवस्था में हैं।

बलबीर सिंह के करीबी कबीर सिंह ने उनकी स्थिति की जानकारी देते हुए कहा कि “उनके मस्तिष्क में खून का थक्का विकसित हो गया है। और साथ ही फेफड़ों में निमोनिया के ताजा लक्षण भी पाए गए हैं।”

उन्होंने ये भी कहा कि “उनका लगातार इलाज हो रहा है। इस समय वह वेंटिलेटर सपोर्ट पर बने हुए हैं और डॉक्टर उनकी स्थिति का लगातार आकलन कर रहे हैं।”

बलबीर सिंह सीनियर को 104 डिग्री बुखार होने के कारण 8 मई को अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। पारिवारिक डॉक्टर राजिंदर कालरा ने शुरुआत में उन्हें स्पंज बाथ देने की कोशिश की थी लेकिन जब स्थिति नहीं सुधरी तो उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दी।

इस दौरान किए गए टेस्ट से पता चला कि उनके कई अंग प्रभावित हुए थे और 95 वर्षीय इस खिलाड़ी को तीन कार्डियक अरेस्ट भी आए थे।

हालांकि पिछले सप्ताह उनके रक्तचाप और हृदय गति को लाइफ सपोर्ट के माध्यम से स्थिर कर दिया गया था लेकिन अब भी उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।

बलबीर सिंह सीनियर का कोरोना वायरस (COVID-19) टेस्ट भी किया गया था और वह निगेटिव आया था। पिछले दो वर्षों में यह चौथी बार है जब पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान और कोच को गंभीर हालत में आईसीयू में भर्ती कराया गया है।

सबसे गंभीर स्थिति पिछले साल जनवरी में आई थी, जब बलबीर सिंह सीनियर को ब्रोन्कियल निमोनिया से उबरने के लिए अस्पताल में तीन महीने से अधिक समय बिताना पड़ा था।

भारत के शानदार हॉकी खिलाड़ियों में से एक

1957 में भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित होने वाले पहले खिलाड़ी, बलबीर सिंह सीनियर को सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक माना जाता है। हमला करने वाले घेरे में प्रवेश करते समय उनकी अपरंपरागत और सीधी स्थिति अक्सर गोलकीपरों को चकमा देती थी, जिससे वह गोल करने में सफलता हासिल करते थे।

बलबीर सिंह सीनियर ने तीन ओलंपिक स्वर्णों के अलावा एक एशियाई खेलों का रजत जीता था और बाद में 1975 में अपनी एकमात्र विश्व कप जीत के लिए भारतीय हॉकी टीम के कोच बने।

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