संदीप सिंह ने बताया कि किस तरह उन्होंने गोली लगने के बाद भी अपने हॉकी करियर को बचा लिया

पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान को कहा गया था कि वो फिर कभी भी हॉकी नहीं उठा सकेंगे लेकिन उन्होंने शानदार वापसी की।

भारतीय हॉकी टीम के सबसे महान कप्तानों में से एक, संदीप सिंह (Sandeep Singh) ने अपने जूनियर करियर में जो प्रतिभा दिखाई थी, वैसी वो कभी भी सीनियर टीम में नहीं दिखा पाए।

सिर्फ 17 साल की उम्र में एथेंस 2004 ओलंपिक में खेलने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय हॉकी खिलाड़ी बनने के बाद संदीप सिंह ने एक साल बाद हुए जूनियर विश्व कप में सबसे ज्यादा गोल किए। ऐसे प्रदर्शन को देखने के बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि संदीप सिंह वास्तव में स्टारडम के रास्ते पर थे।

2006 में पंजाब के इस युवा खिलाड़ी को जर्मनी में उनके पहले विश्व कप के लिए बुलाया गया था, लेकिन आयोजन से कुछ ही दिन पहले उनकी जिंदगी ही बदल गई।

22 अगस्त को कालका शताब्दी से दिल्ली में अपने साथियों के साथ यात्रा करने के दौरान, संदीप सिंह को रेलवे सुरक्षा बल के जवान की पिस्तौल से एक गोली लग गई। गोली पेट के निचले हिस्से में लगी थी। जिसके बाद संदीप सिंह की दुनिया पूरी तरह बदल गई।

संदीप सिंह ने एक इंस्टाग्राम लाइव में पूर्व पहलवान संग्राम सिंह (Sangram Singh) से कहा, "अंबाला के स्थानीय अस्पताल में इलाज के लिए सुविधाएँ नहीं थीं और इसलिए मुझे चंडीगढ़ के एक बड़े अस्पताल में एंबुलेंस से ले जाया गया लेकिन ट्रैफिक ज्यादा होने की वजह से इसमें काफी समय लग गया था।"

“डॉक्टरों को गोली निकालने के लिए मेरी छाती से लेकर मेरे पेट तक एक बड़ा चीरा लगाना पड़ा। प्रक्रिया के दौरान बहुत सारी जटिलताएँ थीं और मैं 30 दिनों के बाद अपने होश में आया था।”

संदीप सिंह भारतीय हॉकी टीम के लिए खेलने वाले सर्वश्रेष्ठ ड्रैग-फ्लिकर में से एक थे
संदीप सिंह भारतीय हॉकी टीम के लिए खेलने वाले सर्वश्रेष्ठ ड्रैग-फ्लिकर में से एक थेसंदीप सिंह भारतीय हॉकी टीम के लिए खेलने वाले सर्वश्रेष्ठ ड्रैग-फ्लिकर में से एक थे

डॉक्टरों ने संदीप सिंह को बताया कि उन्हें धड़ से नीचे लकवा मार गया है और वह जीवन भर व्हीलचेयर तक ही सीमित रहेंगे, और ऐसा लगा कि वो फिर कभी हॉकी स्टिक नहीं उठा पाएंगे। ये तत्कालीन 20 वर्षीय खिलाड़ी के लिए बहुत बड़ा झटका था।

संदीप सिंह ने खुलासा किया, “मुझे जल्दी ठीक होने के लिए डॉक्टरों ने मुझे दर्द निवारक दवाओं का सेवन कम करने के लिए कहा था। इसलिए कई बार मुझे असहनीय दर्द के साथ जीना पड़ा।”

"कई बार, मैं दिन में सिर्फ़ एक घंटे सोता था क्योंकि मन में ऐसे कई सारे सवाल आते थे, जो मुझे सोने नहीं देते थे।"

संदीप ने की शानदार वापसी

हॉकी वो चीज थी, जिसे वो प्यार करते थे, इसलिए संदीप सिंह ने अपनी हॉकी स्टिक निकाली और उसे अपने आप को प्रेरित करने के लिए अपने आसपास रखा।

एक और बात थी जिसे मानते हैं कि वो उनके ठीक होने में मदद कर रही थी, वो थी उनकी मां की लगातार प्रार्थनाएँ।

उन्होंने कहा, "वह एक बड़ी प्रेरणा थीं और उन्होंने मेरे अंदर की नकारात्मकता पर काबू पाने में बहुत मदद की।"

पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान ने घटना से एक साल बाद चलना शुरू कर दिया। 2008 में टीम में अपना स्थान फिर से हासिल कर लिया लेकिन टीम के उस साल बीजिंग ओलंपिक के लिए जगह नहीं बना पाए। जिसके बाद उन्हें पता चल गया कि वापसी के लिए उन्हें क्या करना है।

संदीप सिंह ने अपनी पुरानी यादों को याद करते हुए कहा कि, "मेरा लक्ष्य भारत को ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने में मदद करना था और 2012 के लंदन ओलंपिक के लिए नई दिल्ली में आयोजित हमारे क्वालिफाइंग राउंड के दौरान, मैंने एक गेम में पांच गोल किए। मैं 145 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ा और एक टूर्नामेंट में एक भारतीय द्वारा किए गए धनराज पिल्लई (Dhanraj Pillay) के सबसे ज्यादा गोल करने के रिकॉर्ड भी तोड़ दिया।”

गोली लगने की घटना के बाद संदीप सिंह अपने कैरियर में मील का पत्थर भी हासिल किया, जब वो 2009 के सुल्तान अजलान शाह टूर्नामेंट में मैन ऑफ द टूर्नामेंट बने।

2016 में संन्यास लेने के बाद पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान अब हरियाणा राज्य में खेल मंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य अगली पीढ़ी के विकास में मदद करना है।

संदीप सिंह पर एक बायोपिक फिल्म बनी है, जिसका नाम सूरमा है, जो एक हॉकी खिलाड़ी के रोलरकोस्टर जीवन पर आधारित है।

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