भारतीय शूटर राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने 2004 एथेंस ओलंपिक में पदक जीतने के पीछे का खोला बड़ा राज़ 

भारत के लिए ओलंपिक गेम्स के शूटिंग में पहला सिल्वर मेडल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने ही अपने नाम किया था।

शूटिंग का जुनून दिल में रखना एक अच्छी बात है लेकिन चुनौती तब आती है जब आपके देश ने कभी भी उस खेल में ओलंपिक मेडल नहीं जीता हो। एथेंस 2014 में सिल्वर मेडल जीतने वाले राज्यवर्धन सिंह राठौड़ (Rajyavardhan Singh Rathore) का मानना है कि यह जीत उन्हें उनके आत्मविश्वास के बल पर मिली है।

‘मेडल ऑफ़ द ग्लोरी’ शो के दौरान राठौड़ ने कहा “उस समय हालात अलग थे। भारत ओलंपिक के शूटिंग खेल में मेडल नहीं जीत रहा था। उस समय भारत और ओलंपिक गेम्स का नाम साथ लिया जाए तो एक नकारात्मक माहौल बनता था। मैं उसे शपत तो नहीं कहूंगा लेकिन मुझमें दृढ़ निश्चय था कि मैं जब ओलंपिक जाऊंगा तो मेडल तो जीतूंगा ही। मैं वहां सिर्फ भाग लेने नहीं जाऊंगा।”

बहुत साल तक ओलंपिक गेम्स के स्तर को पकड़ने के लिए भारतीय शूटर जूझ रहे थे। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि ऐसा मंच जहां केवल दिग्गज स्पर्धा करते हैं, वहां जाने के लिए भारतीय खिलाड़ियों ने भी अपना ओहदा और ऊंचा किया और देखते ही देखते वे जीतने का माद्दा रखने लगे।

ओलंपिक गेम्स में भारतीय शूटिंग की जीत की नीव रखने वाले राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने माना कि एथेंस के लिए उन्होंने खुद को मानसिक तौर पर मज़बूत किया था।

दिग्गज ने आगे फरमाते हुए कहा एथेंस 2004 की तैयारी का हर एक दिन बहुत कठिन और परिश्रमी था। मैंने तैयारी भी इस हिसाब से की थी कि मेरा पहला ओलंपिक मुझे कहीं नर्वस न कर दे। मैं चाहता था कि जब मैं वहां पहुंचू तो मुझे घर जैसा माहौल मिले, हर हालातों से मैं वाकिफ रहूं। मैंने ओलंपिक शूटिंग रेंज की बहुत सारी तसवीरें और वीडियो ले लिए थे।”

शूटर ने कहा कि “मैं रोज़ सोने से पहले सोचता था कि मैं एरीना में हूं और कैमरा के सामने शूटिंग कर रहा हूं ताकी मैं जब वहां पहुंचूं तो मैं घबरा न जाऊं।”

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ पर था ओलंपिक गेम्स का दबाव

खेल जितना बड़ा होता है उतना ही कठिन भी। बड़े से बड़े मंच की एक बात सच है कि विजेता वही है जो बदलाव सहन कर सकता है। राज्यवर्धन सिंह राठौड़ शुरूआती दो राउंड में लय को खोजते दिखे और 13वीं रैंक पर जा खड़े हुए। इसका दबाव उहोने ज़रूर महसूस किया होगा।

हालांकि राठौड़ ने हार नहीं मानी थी और तीसरे राउंड में 46 अंक बटोर कर वे फाइनल में दाखिल हो गए। उन्होंने आगे अलफ़ाज़ साझा करते हुए कहा “ मैं उस समय विश्व नंबर 1 या 3 पर था। मैंने खुद को साबित किया था कि मैं विश्व के सर्वस्श्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक हूं। मैंने खुद को कहा था कि बाहर हो जाने की मेरे पास कोई वजह नहीं है और 13वीं रैंक पर खड़ा होने मुझे मुनासिब नहीं लगा था।”

अब बारी थी फाइनल राउंड की और भारतीय शूटर ने उम्दा प्रदर्शन दिखाते हुए सिल्वर मेडल हासिल किया। गौरतलब है कि एहमद अल मकतूम (Ahmed Al Maktoum) ने उस साल गोल्ड मेडल पर अपने नाम की मुहर लगाई थी।

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने आगे कहा “हालांकि मैं और अल मकतूम टक्कर के थे लेकिन मुझे यह कहना पड़ेगा कि उस दिन वे मुझसे काफी आगे थे। वह उस फाइनल के स्पष्ट विजेता थे।

इतना ही नहीं एथेंस 2004 ने  राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को भारत की ओर से पहला व्यक्तिगत सिल्वर मेडल विजेता बनाया। इनसे पहले ओलंपिक गेम्स में ही भारतीय व्यक्तिगत ब्रॉन्ज़ मेडल विजेता थे केडी जाधव (KD Jadhav), लिएंडर पेस (Leander Paes) और कर्णम मल्लेश्वरी (Karnam Malleswari)।

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