राजमंड डेब्वेक भारत की शूटिंग में सफलता और उत्थान से नहीं हैं आश्चर्यचकित

स्लोवेनियाई दिग्गज ने भारतीय निशानेबाज़ी में आए बदलावों और उत्थान के लिए इससे जुड़े सभी सदस्यों को दिया श्रेय।

शूटिंग दिग्गज राजमंड डेब्वेक (Rajmond Debevec) बीते कुछ वर्षों में भारतीय शूटिंग में आई नई होनहार प्रतिभाओं को देखकर हैरान नहीं हैं। लंदन 2012 के कांस्य पदक विजेता गंगन नारंग (Gagan Narang) की अकादमी ‘गन फॉर ग्लोरी’ के पेज पर एक इंस्टाग्राम लाइव सत्र के दौरान बोलते हुए स्लोवेनियाई निशानेबाज़ ने इस बदलाव के पीछे भारतीय शूटिंग समुदाय द्वारा किए गए केंद्रित प्रयासों का श्रेय दिया है।

राजमंड डेब्वेक ने कहा, “मुझे लगता है कि ओलंपिक गोल्ड जीतने से ज्यादा कठिन भारतीय टीम के लिए निशानेबाज़ों का चुनाव करना है। आपके पास बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली निशानेबाज़ हैं। उनको फॉलो करना काफ़ी मुश्किल है। वे आने के फौरन बाद ही बेहतरीन स्कोर हासिल करने लगता हैं।”

"मैं इससे हैरान नहीं हूं। तुम्हारे यहां तुम्हारी अकादमी (गन फॉर ग्लोरी) जैसी कई और हैं। आप लोगों ने भारत में शूटिंग के खेल को विकसित करने में बहुत अधिक निवेश किया है और मुझे यकीन है कि आपके पास भविष्य में कई पदक होंगे।"

वहीं, गगन नारंग ने भी इस सीनियर प्रो खिलाड़ी के विचारों पर अपनी सहमति व्यक्त की। पूर्व भारतीय निशानेबाज़ का मानना था कि पिछली पीढ़ी के प्रदर्शन ने भी भारत में शूटिंग के खेल को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी।

उन्होंने कहा, “निशानेबाज़ों के पास आज एक बहुत बड़ा इतिहास है। मुझे लगता है कि अगर हमने इस खेल में हिस्सा नहीं लिया होता तो यह स्तर उतना ऊंचा नहीं होता जितना आज है। अब वे सिर्फ ओलंपिक में हिस्सा नहीं लेना चाहते हैं, वे ओलंपिक में जीत हासिल करना चाहते हैं। यही वह दृष्टिकोण है जिसमें समय के साथ बदलाव आया है।”

राजमंड डेब्वेक का ओलंपिक सपना

स्लोवेनिया के निशानेबाज़ डेब्वेक ने अब तक आठ ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया है, लेकिन उन्हें भी मेडल जीतने की खुशी पांचवें ओलंपिक में मिली थी। सिडनी 2000 में उन्होंने अपना पहला ओलंपिक पदक जीता।

57 वर्षीय ने बीजिंग 2008 में इसी इवेंट में कांस्य पदक जीतने से पहले 50 मीटर राइफल 3 पोजीशन में स्वर्ण पदक जीता था। राजमंड डेब्वेक ने तीसरा ओलंपिक पदक लंदन 2012 में जीता, यह 50 मीटर राइफल प्रोन में कांस्य पदक था।

उनके लिए शुरुआत में मिली हर एक हार से जूझना काफी मुश्किल रहा। लेकिन इस स्लोवेनियाई निशानेबाज़ की खेल के सबसे बड़े मंच पर पदक जीतने की भूख ने उन्हें आगे बढ़ने में काफी मदद की।

राजमंड डेब्वेक ने यूगोस्लाविया के पूर्व जिमनास्ट मिरोस्लाव सेरार को अपनी प्रेरणा माना और अपने हार के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा, "यह शायद मेरा व्यक्तित्व है। शुरुआत में जब मैंने अपने लिए एक लक्ष्य निर्धारित किया तो यह सिर्फ ओलंपिक में हिस्सा लेने के बारे में था। जो 1984 में संभव हुआ। इसके बाद मेरा लक्ष्य ओलंपिक में पदक जीतना बना। मैं हमेशा बहुत महत्वाकांक्षी रहा हूं। यही मेरा व्यक्तित्व था। मेरा एक लक्ष्य होता और मैं उसी को पूरा करता था। जब आप किसी पहाड़ पर चढ़ते हैं तो शिखर पर पहुंचने से पहले पीछे नहीं हटते हैं।”

हालांकि राजमंड डेब्वेक ने अपने करियर की शुरुआत यूगोस्लाविया के झंडे के नीचे खेलने से की थी, लेकिन उन्हें ओलंपिक सफलता स्लोवेनिया की आजादी की घोषणा के बाद मिली।

यूगोस्लाविया का एथलीट होने के बाद स्लोवेनिया के लिए ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेने का उनका बदलाव काफी भावनात्मक था। इसके साथ ही यह इस शूटिंग दिग्गज के लिए अनिश्चितताओं से भरा हुआ था।

राजमंड डेब्वेक ने सिडनी 2000 में अपना पहला ओलंपिक पदक जीता, यह 50 मीटर राइफ़ल 3 पोज़ीशन में गोल्ड मेडल था।
राजमंड डेब्वेक ने सिडनी 2000 में अपना पहला ओलंपिक पदक जीता, यह 50 मीटर राइफ़ल 3 पोज़ीशन में गोल्ड मेडल था।राजमंड डेब्वेक ने सिडनी 2000 में अपना पहला ओलंपिक पदक जीता, यह 50 मीटर राइफ़ल 3 पोज़ीशन में गोल्ड मेडल था।

उन्होंने कहा, “इस बदलाव का यह समय बहुत अनिश्चित था। हमें अन्य देशों से भी मान्यता मिली, लेकिन इस बात पर अभी अनिश्चितता बनी हुई थी कि IOC हमें मान्यता देगी या नहीं। लेकिन भाग्य हमारे साथ था और सबकुछ आसानी से हो गया। हम जल्द ही स्लोवेनिया के लिए शूटिंग कर रहे थे।”

उन्होंने आगे कहा, "वास्तव में मैंने स्लोवेनिया को स्वतंत्र घोषित किए जाने से पहले (1992 बार्सिलोना ओलंपिक के लिए) एक कोटा स्थान हासिल किया था। लेकिन आईओसी के एक नियम में कहा गया कि व्यक्तिगत निशानेबाज़ों द्वारा हासिल किए गए कोटा स्थान सिर्फ उन्हीं के लिए होंगे। यह मेरे पक्ष में था।’’

युद्ध और स्वतंत्रता की लड़ाई ने भले ही आने वाली पीढ़ियों पर एक गहरा प्रभाव छोड़ा, लेकिन राजमंड डेब्वेक सिर्फ सकारात्मक नज़रिया रखने के लिए उत्सुक रहे।

उन्होंने आगे कहा, “इसके (स्लोवाकिया की स्वतंत्रता) दूसरे पहलू को देखें तो मैं बाद में कई प्रतियोगिताओं में अपनी पूर्व यूगोस्लाविया टीम के साथियों से मिलता रहा और हमें कभी भी कोई समस्या नहीं हुई। हम दोस्त थे, हम दोस्त बने रहे और हम आज भी दोस्त बने हुए हैं।”

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