सुमा शिरूर का ओलंपिक सफ़र रहा है बेमिसाल

2004 एथेंस एशियन क्वालिफ़िकेशन के दौरान भारतीय शूटर ने 400 में से 400 अंक बटोर रिकॉर्ड स्थापित कर ओलंपिक गेम्स में जगह बनाई थी।

लेखक जतिन ऋषि राज ·

सुमा शिरूर (Suma Shirur) को खेल की दुनिया में भले ही सबसे बड़ा पुरस्कार नहीं मिला हो लेकिन उनका ओलंपिक गेम्स तक पहुंचने का सफ़र क़ाबिल-ए-तारीफ़ रहा था। कर्नाटक की इस राइफल शूटर ने 2004 एशियन शूटिंग चैंपियनशिप के क्वालिफिकेशन राउंड में इतिहास रच अपने कारवाँ को आगे बढ़ाया था और प्रतियोगिता में उम्दा प्रदर्शन दिखाते हुए गोल्ड मेडल भी हासिल किया था।

उनके परिणामों और प्रदर्शन की बदौलत उन्हें उस साल के ओलंपिक गेम्स में स्थान प्राप्त हुआ। फर्स्टपोस्ट से बात करते हुए सुमा शिरूर ने कहा “मैंने 400 में से 400 अंक बटोर वर्ल्ड रिकॉर्ड स्थापित कर ओलंपिक में प्रवेश किया था। वह दौर मेरी ज़िंदगी का सबसे सुनहरा दौर था। ओलंपिक का सफ़र बहुत लंबा रहा है और मुझे उस स्तर तक पहुंचने में 10 साल लग गए। पूरे सफ़र ने ही मुझे अच्छा प्रदर्शन करने की ललक दे दी थी।”

सुमा शिरूर और अभिनव बिंद्रा (Abhinav Bindra) दोनों ही 2004 ओलंपिक गेम्स में पोडियम का हिस्सा बनने से चूक गए थे। ऐसे में उन्होने राज्यवर्धन सिंह राठौर ( Rajyavardhan Singh Rathore) द्वारा जीते हुए सिल्वर मेडल के बारे में बताते हुए कहा “मुझे याद है मैं और अभिनव अपने मुकाबले के बाद अपना दुख बांट रहे थे और राज्यवर्धन का मुकाबला भी देख रहे थे।”

कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीत चुकी सुमा शिरूर ने आगे बताया “फिर हमने देखा कि राठौर सिल्वर मेडल मुकाबले में पहुंच गए हैं और तब हमने अपना दुख भुलाकर उन्हें मुबारकबाद दी। एथेंस 2004 से वह पल अच्छा था।”

गोल्ड पर था बिंद्रा का हक़

हालांकि 2006 एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने के बाद सुमा शिरूर ने शूटिंग पर ब्रेक लगा दिया और इसके बाद दो साल आगे चल कर 2008 गेम्स में अभिनव बिंद्रा ने गोल्ड मेडल पर पाने नाम की मुहर लगाई थी।”

बिंद्रा को अपने लक्ष्य के लिए इसी जद्दोजहद को देख इनकी तारीफ में इस राइफल शूटर ने कहा “जो भी वह कर सकते थे उन्होंने वह सब किया। उन्होंने खुद को बेहतर करने के नए तरीके इजाद किए। उन्होंने अपनी एकाग्रता, दृढ़ता, इच्छाशक्ति का मोज़ाएहरा पेश किया जो कि अमूमन शूटरों में नहीं दिखाई देता। जब उन्होंने गोल्ड मेडल जीता तो मैंने भगवान का धन्यवाद दिया क्योंकि वे इससे योग्य थे।”

टोक्यो पर नज़र

उस दौर के बाद देश में शूटिंग की दशा बदला गई। युवा खिलाड़ियों को उनकी काबिलियत का अहसास हो गया था और वे भी ओलंपिक गेम्स में मेडल जीतने का सपना देखने लगे थे। यही कारण है कि टोक्यो 2020 के लिए अभी तक भारत की ओर से 15 खिलाड़ी क्वालिफाई कर चुके हैं। 

जूनियर इंडियन राइफल शूटिंग टीम की हाई परफॉर्मेंस स्पेशलिस्ट कोच ने बताया “पिछले दो सालों में टॉप रैंक पर रहकर कोटा स्थान जीतने के लिए काफी दबाव है। इससे खिलाड़ियों पर दबाव पड़ता है लेकिन वे इससे निपटना सीख गए हैं। मेरे ख्याल में उन्होंने इससे लड़ने की ट्रेनिंग की है।”

उस दौर के बाद देश में शूटिंग की दशा बदला गई। युवा खिलाड़ियों को उनकी काबिलियत का अहसास हो गया था और वे भी ओलंपिक गेम्स में मेडल जीतने का सपना देखने लगे थे। यही कारण है कि टोक्यो 2020 के लिए अभी तक भारत की ओर से 15 खिलाड़ी क्वालिफाई कर चुके हैं। 

जूनियर इंडियन राइफल शूटिंग टीम की हाई परफॉर्मेंस स्पेशलिस्ट कोच ने बताया “पिछले दो सालों में टॉप रैंक पर रहकर कोटा स्थान जीतने के लिए काफी दबाव है। इससे खिलाड़ियों पर दबाव पड़ता है लेकिन वे इससे निपटना सीख गए हैं। मेरे ख्याल में उन्होंने इससे लड़ने की ट्रेनिंग की है।”