कोच बनकर भारत को ओलंपिक पदक जितवाना है तैराक वीरधवल खड़े का मक़सद

2010 एशियन गेम्स के मेडल विजेता वीरधवल खड़े ने बीजिंग गेम्स से ओलंपिक डेब्यू किया था लेकिन लंदन और रियो गेम्स में जगह बनाने में असफल रहे थे। अब उनकी नज़र टोक्यो 2020 पर है।

खेल अभी बाकी है और खिलाड़ी की हिम्मत भी। भारतीय स्विमर वीरधवल खड़े (Virdhawal Khade) के करियर में अभी कुछ साल बाकी हैं लेकिन उन्होंने रिटायरमेंट के बाद की भी योजना बनाई हुई है। भारत के लिए स्विमिंग के सबसे युवा ओलंपियन का मानना है कि जब वह खेल छोड़ देंगे उसके बाद वह एक कोच की भूमिका निभाएंगे।

विंटर ओलंपियन शिव केशवन (Shiva Keshavan) से इन्स्टाग्राम लाइव चैट के दौरान इस 28 वर्षीय ने कहा “मैं ज़रूर कोचिंग की ओर जाऊंगा और फिलहाल मैं सभी प्रमाणीकरणों में लगा हुआ हूं। मैंने अमेरिकी कोचिंग कोर्स भी किया है और साथ ही हकीम (Hakimuddin Habibulla) के द्वारा ऑस्ट्रेलियन स्विमिंग कोचिंग कोर्स भी किया है। मैं खुद को अगले कुछ सालों में कोच बनते देखता हूं।”
ऐसा बहुत बार देखा गया है कि एथलीट रिटायर होने के बाद कोच की भूमिका अदा करते हैं तो ऐसे ही स्विमर वीरधवल खड़े ने भी अपने कौशल में और पंख लगाकर अपने कोचिंग के करियर को उड़ान देने की साझी है।

भारतीय स्विमर ने आगे अलफ़ाज़ साझा करते हुए कहा “मेरा मकसद किसी ओलंपियन को कोच करने का है और क्या पता मेरा कोई स्टूडेंट ही ओलंपिक मेडल ले आए।” गौरतलब है कि वीरधवल खड़े ने 16 साल की उम्र में बीजिंग गेम्स 2008 में क्वालिफाई किया था लेकिन उन्हें अपने इस कीर्तिमान का आभास तब तक नहीं था जब तक उन्होंने वहां जाकर उस माहौल को महसूस नहीं किया था।

तैराक ने आगे कहा “मैंने जब ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया था तो मुझे नहीं पता था कि मैंने क्या कर दिया है। मैं हमेशा सुनता था कि ओलंपिक एक सुनहेरा सपना है लेकिन में कोल्हापुर जैसी छोटी जगह से था और साथ ही मैं बहुत छोटा था तो इन सभी चीज़ों को समझ नहीं पा रहा था।”

वीरधवल खड़े ने दिखाई गेम्स में वीरता

“तो मैं बीजिंग में लैंड हुआ लेकिन मुझे पता नहीं था कि मैं किस लिए जा रहा हूं। मुझे उसका अर्थ और उसकी एहमियत तब तक नहीं पता थी जब तक मैं गेम्स विलेज में नहीं चला गया। वहां मैंने माइकल फ़ेल्प्स (Micheal Phelps), रोजर फेडरर (Roger Federer) और राफेल नडाल (Rafael Nadal) जैसे उच्चतम खिलाड़ियों को देखा और तब मुझे लगा कि हां, मैं यही से हूं।”

वीरधवल खड़े ने बताया “मुझे वहां भारत की अगुवाई करते हुए गर्व हो रहा था। वहां से मेरा मकसद हमेशा अच्छा करना बन गया था। जब आप उस स्तर पर जाते हैं तो हमेशा बेहतर होने की कोशिश करते हैं। मुझे लगा कि वहां से मेरी ज़िन्दगी बदल गई।”

भारतीय स्विमर वीरधवल खड़े ने अपने करियर में बहुत से उतार चढ़ाव दखें हैं, चाहे वह 2010 एशियन गेम्स (2010 Asian Games) में मेडल जीतना हो या फिर लंदन गेम्स 2012 (London 2012) और रियो 2016 (Rio 2016) में जगह न बना पाना हो। इस खिलाड़ी ने हमेशा अपने हौंसले को ऊपर रख कड़े प्रदर्शन के पथ को फॉलो किया है। सही मायनों में एक और ओलंपिक में शामिल होने की भूख ही इन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग करती है।

 “मुझे जीतना पसंद है और हारना बिलकुल अच्छा नहीं लगता। जब भी मैं कोई रेस हारता हूं तो मैं वापिस जाकर मेहनत करता हूं और अगली बार जीतने की कोशिश करता हूं। यही चीज़ मुझे आगे बढ़ाती है।”

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