मैं तीरंदाज़ बनना चाहती थी लेकिन कुंजरानी देवी ने बदल दी कहानी: मीराबाई चानू

25 वर्षीय इस खिलाड़ी ने यह भी बताया कि कैसे वह रियो 2016 में अपने कठिन समय के बाद वापसी कर पाईं।

भारतीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू (Mirabai Chanu) मणिपुर से आने वाली देश की दूसरी खेल आइकन हैं, लेकिन 2007 में अगर चीजें अलग नहीं होती तो वह इस खेल में करियर नहीं बना पाती।

भारतीय वेटलिफ्टर ने आईओएस स्पोर्ट्स एंड एंटरटेनमेंट के इंस्टाग्राम पेज पर रैली रेसर गरिमा अवतार (Garima Avtar) के साथ लाइव चैट में बताया कि “मुझे हमेशा से एक बच्चे के रूप में पता था कि मैं एक स्पोर्ट्स पर्सन बनना चाहती थी लेकिन वास्तव में एक तीरंदाज बनना चाहती थी।”

भारतीय खिलाड़ी ने बताया कि “लेकिन उस दिन तीरंदाजी सेंटर बंद था जब मैं अपने इस सफ़र को शुरू करने के इरादे से गई थी। तभी मैंने संयोग से कुछ वेटलिफ्टरों को ट्रेनिंग करते देखा। 14 साल की उम्र में मैं उनकी ट्रेनिंग से प्रभावित हुई। इसके बाद मैं घर पर लंबे समय तक यही सोचती रही कि मुझे किस खेल में जाना चाहिए।”

इसके बाद मीरबाई ने इस खेल के इतिहास के बारे में पढ़ा।भारतीय वेटलिफ्टिंग  की दिग्गज कुंजारानी देवी (Kunjarani Devi) की कहानी पढ़ी, जिन्होंने बाद में मीराबाई चानू को प्रशिक्षित भी किया एक छोटे से शहर से राष्ट्रीय पहचान तक कुंजरानी देवी की अविश्वसनीय यात्रा से मीराबाई प्रभावित हुईं। मीराबाई चानू ने इसके बाद तय कर लिया था कि वह आगे क्या करना चाहती हैं।

हालांकि, यह यात्रा इतनी आसान भी नहीं थी। पहली परेशानी ये थी कि परिवार इसके खिलाफ था। उनकी माता खेल में होने वाले खर्चो को लेकर चिंता में थी, वहीं उनके पिता तो ऐसा करने के ही खिलाफ थे।

आखिरकार उन्होंने इस बाधा को पार करते हुए अपने परिवार को मना लिया लेकिन यात्रा और समय के मुद्दे ने उन्हें फिर परेशानी में घेर लिया। मीराबाई ने बताया कि “मुझे सुबह 5 बजे जिम में ट्रेनिंग के लिए जाना पड़ता था। इस दौरान मुझे करीब एक घंटा बस में यात्रा करनी पड़ती थी।”  

मीराबाई ने आगे कहा कि "इसके अलावा, उन्होंने मुझे दौड़ने के अलावा और गहन अभ्यास करवाए, जो मैंने पहले कभी नहीं किए थे इसलिए ऐसा करना काफी मुश्किल था, लेकिन मेरे कोच के प्रोत्साहन ने मुझे संभाला और साल 2009 में मैंने पहला राष्ट्रीय पदक जीता।

रियो 2016 की निराशा

भारतीय वेटलिफ्टर ने रियो में 2016 ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया था, लेकिन 22 वर्षीय ये खिलाड़ी मुकाबलें के दिन नर्वस हो गई और वह तीन प्रयासों में क्लीन एंड जर्क नहीं उठा पाई थी।

इस प्रदर्शन के बाद मीराबाई चानू के विश्वास को झटका लगा  और उन्होंने इसे वापस पाने के लिए अपने कोच की मदद मांगी। इस खिलाड़ी ने बताया कि कोच ने उनसे कहा कि “किसी दिन आप जीतते हैं और किसी दिन आपको हार का सामना करना पड़ता है इसलिए ज्यादा ना सोचते हुए अगले टूर्नामेंट पर ध्यान दें।”

भारतीय स्टार ने कहा कि "मैंने उनकी सलाह पर ध्यान दिया और सभी निराशाओं को पीछे छोड़ते हुए मैंने अपना लक्ष्य विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतना बनाया।”

इसके बाद उन्होंने 2017 में वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप के लिए अनाइम की यात्रा की और स्वर्ण पदक पर कब्जा किया। उस टूर्नामेंट में उन्होंने कुल 194 किग्रा उठाकर उस वक्त का वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़कर गोल्ड जीता। वह कर्णम मल्लेश्वरी (Karnam Malleswari) के बाद ऐसा करने वाली केवल दूसरी भारतीय वेटलिफ्टर बनीं।

इसके बाद अगले साल भी उन्होंने बड़ी सफलता हासिल करते हुए साल 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता। यह इस संस्करण में भारत की तरफ से पहला गोल्ड मेडल था। इसके बाद मीराबाई का प्रदर्शन शानदार ही रहा।

लॉकडाउन से निपटना

भारत में कुछ छूट के साथ तीसरे लॉकडाउन के समय में भी मीराबाई खुद को मजबूत रख रही हैं। लॉकडाउन में भी उन्होंने ट्रेनिंग में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मीराबाई ने बताया कि "मैं अभी भी एक सख्त दिनचर्या का पालन करती हूं, सुबह और शाम को व्यायाम करना मेरे रूटीन में शामिल है। मेरा ज्यादातर समय इसी में निकल जाता है। इसके अलावा मैं अपने घर को सजाने का भी काम कर रही हूं, मैंने अपने कमरे को एक सुंदर रूप देने की कोशिश की।”

25 वर्षीय यह खिलाड़ी इस समय अंतर्राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग महासंघ (IWF) की टोक्यो 2020 रैंकिंग में चौथे स्थान पर काबिज है, जो अगले साल होने वाले टोक्यो ओलंपिक की यात्रा के लिए सुरक्षित स्थान है।

पिछली बार दबाव में ये खिलाड़ी खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई थी लेकिन इस बार वह पहले से ज्यादा परिपक्व और तैयार हैं। इसके साथ ही ये साफ है कि मीराबाई का टारगेट ओलंपिक मेडल ही है, जिसे वह अपने घर जरूर लाना चाहेंगी।

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