पिता का समर्थन मिलने पर दिव्या काकरन ने कुश्ती में किया कमाल

पहलवानों के परिवार में जन्मी दिव्या इकलौती रेसलर बनीं जिसने इंटरनेशनल स्टेज पर अपनी कला का प्रदर्शन किया।

एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप 2017 में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने वाली दिव्या काकरन (Divya Kakran) ने आज तक अपना पहलवानी में दबदबा बनाया हुआ है। 68 किग्रा भार वर्ग में खेली दिव्या ने उस जीत के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

जीत की आदत ही एक एथलीट को आगे बढ़ने में मदद करती है। चाहे वह एशियन गेम्स (Asian Games) हो या कॉमनवेल्थ गेम्स या फिर वर्ल्ड चैंपियनशिप, दिव्या कभी भी भारत के लिए लड़ना भूलती नहीं हैं और जब लड़ती हैं तो मेडल पर ज़रूर कब्ज़ा करती हैं।

 पहलवान परिवार से ताल्लुक रखने वाली दिव्या काकरन के लिए रेसलिंग को पेशे के तौर पर चुनना ख़ासा मुश्किल नहीं था। अभिनेता बने रेसलर संग्राम सिंह (Sangram Singh) के इंस्टाग्राम लाइव सेशन के दौरान उन्होंने बताया, “मैंने रेसलिंग मां के पेट में ही शुरू कर दी थी।”

दिव्या ने आगे अलफ़ाज़ साझा करते हुए बताया, “पहलवानों के परिवार से आने की वजह से खेल में खुद को समर्पित करना आसान था। खेल में टिके रहना मुश्किल था। मेरे परिवार के बुज़ुर्ग भी नहीं चाहते थे कि एक लड़की अखाड़े में जाकर कुश्ती करे।”

समाज ने एक बार फिर अपना पंजा एक खिलाड़ी के सपनों के खिलाफ फैलाया था। दिव्या के दादा जो कि खुद एक पहलवान रह चुके हैं वह दिव्या के खेल के खिलाफ थे। कहते हैं न कि सपनों में जान हो तो उड़ान मिल ही जाती है। ऐसे में इस रेसलर के पिता सूरज ने अपनी बेटी का बखूबी साथ दिया और आज हम सभी उनकी सफलताओं से वाकिफ़ हैं।

पिता ने बेटी को दिखाई राह

अखाड़े की मिट्टी में अपने खेल को जिस पिता ने बड़ा किया था उसी पिता ने अपनों बेटी को भी यह खेल कौशल सिखाने की ठानी। वही थे जिन्होंने दिव्या को खेल से अवगत कराया और बहुत जल्द ही उनकी प्रतिभा को पहचान उन्हें आगे बढ़ाया।

घर में कम आमदनी के कारण दिव्या के पिता सूरज के लिए उनके लिए खेल की सामग्री इकट्ठा करना मुश्किल होता जा रहा था। हालांकि इन सभी चुनौतियों से यह पिता और उनकी बेटी कभी रुके नहीं और हमेशा अपने कदमों को आगे की ओर रखा।

2020 एशियन रेसलिंग चैंपियन में गोल्ड मेडल जीत चुकी दिव्या ने बातचीत को आगे बढ़ाते हुए कहा, “मुझे आज भी वो दिन याद है जब हम दूध और घी तक नहीं खरीद सकते थे, जो कि एक रेसलर के जीवन में बहुत जरूरी होता है।”

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मेरा साहस मेरी इज्जत मेरा सम्मान है पिता। मेरी ताकत मेरी पूँजी मेरी पहचान है पिता। घर की इक-इक ईट में शामिल उनका खून पसीना। सारे घर की रौनक उनसे सारे घर की शान पिता। मेरी शोहरत मेरा रूतबा मेरा है मान पिता। मुझको हिम्मत देने वाले मेरा हैं अभिमान पिता। सारे रिश्ते उनके दम से सारे नाते उनसे हैं। सारे घर के दिल की धड़कन सारे घर की जान पित। शायद रब ने देकर भेजा फल ये अच्छे कर्मों का। उसकी रहमत उसकी नेमत उसका है वरदान पिता।🙏

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दिव्या ने आगे कहा, “लेकिन मेरे पिता दृढ़ निश्चयी थे। उन्होंने मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलते देखने का सपना देखा था। जब भी मैं ट्रेनिंग करती हूं तो यह सुनिश्चित करती हूं कि मैं अपना सर्वश्रेष्ठ दूं।”

“हम अलग-अलग दंगल में हिस्सा लिया करते थे और जो भी जीत की रकम वहां से मिलती थी उसे हम अपनी डाइट में लगाते थे। एक समय ऐसा भी आया कि जब मेरे पिता ने गांव के लोगों से पैसे उधार लेने का सोचा।”

अगर आज यह भारतीय पहलवान पीछे मुड़कर देखती हैं तो उन्हें यकीन होता है कि शुरुआती चुनौतियां उन्होंने पार पा ली हैं, लेकिन काम अभी आधा ही हुआ है। इस इंडियन रेसलर ने आगे कहा, “अभी मेरा फोकस ओलंपिक गेम्स की तैयारियों पर है और मैं इसमें अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहती हूं। फिलहाल सेलेक्शन की प्रक्रिया कोरोना वायरस की वजह से रुकी हुई है लेकिन इसके दोबारा शुरू होने पर मैं सेलेक्ट होने लिए अपने बेस्ट दूंगी।”

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